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उत्तर प्रदेश

मीडिया पर इस बंदिश के बाद यूपी में सेंसरशिप के दिन आए!

ज्ञानेश तिवारी-

यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का हुक्म है कि इस गुलिस्ताँ में बस इक रंग के ही फूल होंगे। कुछ अफ़सर होंगे जो ये तय करेंगे कि गुलिस्ताँ किस तरह बनना है कल का। यक़ीनन फूल तो यक-रंगीं होंगे, मगर ये रंग होगा कितना गहरा-कितना हल्का, ये अफ़सर तय करेंगे… मीडिया पर इस बंदिश के बाद भी अगर आपके मन में शंका है कि सेंसरशिप अभी नहीं आई है, तो आप नादान हैं।

सौमित्र रॉय- यूपी में मीडिया सेंसरशिप लागू हो गई है। यह आपातकाल है। आफतकाल भी। हम सब सेंसरशिप के दायरे में हैं। आप वही लिखिए, वही बोलिए, जो सत्ता के अनुकूल हो।खिलाफ़त यानी आफ़त। सत्ता इस कदर डरी हुई है कि किसी भी हद को पार कर जाए।

संजय एम सिंह- जो मीडिया खुद ही साष्टांग है उसके लिए इस आदेश की जरूरत ही नहीं। खामखां एक कागज बर्बाद कर दिया।

Shabahat Vijeta- पत्रकारों के नेता अगर ईमानदार हों, वह अपने बजाय अपने कैडर का ध्यान रखने वाले हों तो किसी सरकार की औकात नहीं है अपने नियम लादने की। मगर पत्रकार नेता गुटबाजी में लगे हैं। सब अपने हित साध रहे हैं। वास्तव में यही जिम्मेदार हैं।

एमटी प्रखर- संजय प्रसाद का यह आदेश उन्ही के मेज पर धराशायी होगा। लिखने वाले पत्रकार लिखते रहेगे उनके इस आदेश का कोई मतलब नहीं है। सरकार में लूट मची है यह ब्यूरोक्रेट को नहीं दिखाई दे रहा है।

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