नई दिल्ली। पत्रकार उपेंद्र राय के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) की जांच में कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं। जांच एजेंसियों ने राय और उनके सहयोगियों के ठिकानों पर छापेमारी के दौरान कई गोपनीय दस्तावेज जब्त किए हैं, जिनमें वरिष्ठ अधिकारियों के कॉल डाटा रिकॉर्ड, गोपनीय सरकारी पत्राचार और संदिग्ध लेनदेन से जुड़े दस्तावेज शामिल हैं।
गोपनीय दस्तावेजों का खुलासा
छापेमारी के दौरान जांच एजेंसियों ने 2015 में मांस निर्यातक मोइन कुरैशी और अन्य के खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की शिकायत, आयकर विभाग के मूल्यांकन आदेश, और लगभग 140 कंपनियों के संदिग्ध लेनदेन रिपोर्ट (STR) जब्त की हैं। इन दस्तावेजों से काले धन और मनी लॉन्ड्रिंग से जुड़े कई मामले उजागर होने की संभावना है।
वरिष्ठ अधिकारियों और पत्रकारों से जुड़े रिकॉर्ड
जांच में उन दस्तावेजों का पता चला है, जो प्रवर्तन निदेशालय के एक वरिष्ठ अधिकारी, एक आईएएस अधिकारी और एक हिंदी पोर्टल के मालिक पत्रकार के कॉल डाटा रिकॉर्ड से जुड़े हैं। इन रिकॉर्ड्स के बारे में अनुमान है कि इन्हें राय ने पहले एकत्र किया था।
कई संपत्तियों और लग्जरी कारों का भी खुलासा
जांच में राय और उनके परिवार के नाम पर दिल्ली, नोएडा, लखनऊ और अन्य शहरों में स्थित फ्लैट, 14 बैंक खाते, और ऑडी, मर्सिडीज जैसी 8 लग्जरी कारों का पता चला है। ED इन संपत्तियों को मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (PMLA) के तहत जब्त कर सकती है।
नकली हवाई अड्डा प्रवेश पास का मामला
राय पर नकली हवाई अड्डा प्रवेश पास (Aerodrome Entry Pass) का उपयोग कर संवेदनशील क्षेत्रों में प्रवेश करने का भी आरोप है। उनके पास से नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो (BCAS) के तीन आईडी कार्ड भी बरामद हुए हैं, जो जांच के दायरे में हैं।
न्यायिक हिरासत में राय
फिलहाल उपेंद्र राय न्यायिक हिरासत में हैं। उन्हें CBI ने एक मुंबई के व्यवसायी से कथित उगाही और आयकर विभाग के मामले में हेरफेर करने के आरोप में गिरफ्तार किया था।
आगे की जांच जारी
जांच एजेंसियों ने राय और उनके सहयोगियों के मोबाइल फोन और हार्ड ड्राइव को फॉरेंसिक जांच के लिए भेजा है। एजेंसियों को उम्मीद है कि इससे राय के सरकारी अधिकारियों और राजनेताओं के साथ संबंधों का खुलासा हो सकता है।
ED और CBI, राय के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम के तहत मामले की जांच कर रही हैं। इस प्रकरण ने पत्रकारिता और सत्ता के बीच गहरे संबंधों पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
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