उपेंद्र राय की दमदार तरीके से हुई सहारा समूह में वापसी, पढ़ें सर्कुलर

ह्वाट्सअप पर तेजी से फारवर्ड हो रहे एक सर्कुलर में उपेंद्र राय की दमदार तरीके से सहारा समूह के मीडिया वेंचर में वापसी का जिक्र किया गया है. सहारा से जुड़े उच्च पदस्थ लोगों ने सहाराश्री सुब्रत राय के हस्ताक्षर से जारी इस सर्कुलर को प्रामाणिक बताया है. सर्कुलर में उपेंद्र राय का पद सीनियर एडवाइजर का बताया गया है लेकिन उनकी प्रोफाइल सीईओ और एडिटर इन चीफ वाली ही है. उन्हें प्रिंट और इलेक्ट्रानिक दोनों मीडिया के संपादकीय, वित्तीय, एचआर आदि समस्त विभागों का अधिकार दिया गया है.

सर्कुलर में कहा गया है कि गौतम सरकार अपने पद पर बने रहेंगे और वे अब उपेंद्र राय को रिपोर्ट करेंगे. सुमित राय मीडिया बिजनेस के गार्जियन बने रहेंगे और उन्हें उपेंद्र राय रिपोर्ट करेंगे. नीचे दिए गए सर्कुलर में आप अन्य सारी जानकारियां भी पढ़ सकते हैं.

नवरात्र से ठीक एक रोज पहले उपेंद्र राय की सहारा समूह में दमदार वापसी के बाद उन लोगों को सदमा लगा है जिन्होंने उनके करियर के अंत की घोषणा कर दी थी. कुछ बड़े नेताओं और अफसरों की साजिश के तहत तिहाड़ जेल में डाले गए और एक के बाद एक कई फर्जी केस झेलने वाले उपेंद्र राय को पहले कई जांचों के बाद अदालतों ने क्लीन चिट दी, अब सुब्रत राय ने भरोसा जता करके पूरे मीडिया वेंचर की कमान सौंप दी है.

ज्ञात हो कि जिला ग़ाजीपुर निवासी उपेंद्र राय ने सहारा से ही अपने करियर की शुरुआत की थी, एकदम निचले पायदान से. वे अपनी मेहनत, प्रतिभा और कई क्षमताओं के दम पर एक रोज सहारा मीडिया के ग्रुप एडिटर व सीईओ बन गए. बीच में वे तबके स्टार न्यूज (अब एबीपी न्यूज) के मुंबई आफिस में बतौर सीनियर रिपोर्टर कार्यरत रहे और कई बड़ी खबरें ब्रेक की.

पिछले साल भर से ज्यादा समय से उपेंद्र राय का जीवन झंझावातों से भरा रहा. कुछ बड़े अफसरों और नेताओं की साजिश के बाद सीबीआई द्वारा अचानक से गिरफ्तार कर जेल में डाले गए उपेंद्र राय को किसी एक मामले में सजा मिलती तो जेल गेट से बाहर निकलते ही उन्हें दूसरी केंद्रीय एजेंसी ईडी वाले अरेस्ट कर जेल में डाल देते. उपेंद्र राय के करीबियों और परिजनों को केंद्रीय एजेंसियों द्वारा लगातार प्रताड़ित किया जाता रहा. कुछ बड़े अंग्रेजी अखबारों में केंद्रीय एजेंसियों के अफसर लोग उपेंद्र राय के खिलाफ एक से बढ़कर एक भड़कीली खबरें प्लांट करा कर छपवाते.

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पूरा माहौल ऐसा हो गया था कि बिना कोई कुकर्म किए उपेंद्र राय देश के सबसे बड़े विलेन घोषित करा दिए गए. ये तिकड़मी नौकरशाहों और नेताओं द्वारा अपनी ताकत के बेजा इस्तेमाल की हद थी. बावजूद इसके कि पूरा सत्ता सिस्टम आपके खिलाफ हो, अगर प्रकृति-सुपर पावर की इनविजिबिल फोर्सेज आप पर मेहरबान हैं, सकारात्मक उर्जा वर्तुल आपके इर्दगिर्द है तो आप पूरे सिस्टम-सत्ता को परास्त कर ठेंगा दिखाते हुए फिर से दुनिया के रंगमंच पर एक हीरो की तरह अवतरित हो जाते हैं.

उपेंद्र राय कुछ ऐसे ही किरदार बन गए हैं. उनका उत्थान, पतन और फिर उत्थान एक फिल्मी कहानी सरीखी है.

ओशो के महान प्रशंसक और फालोवर उपेंद्र राय ने अपनी जिजीविषा व सकारात्मकता के जरिए खुद को टूटकर बिखरने से बचाते हुए पुन: संयोजित कर लिया है. कल तक जो लोग उनका खात्मा मानकर मुंह फेर चुके थे, अब से वे भी उन्हें इस नई व बड़ी पारी के लिए शुभकामना देने लगेंगे. यही सतरंगी जीवन है जिसके सैकड़ों शेड्स हैं.

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Comments on “उपेंद्र राय की दमदार तरीके से हुई सहारा समूह में वापसी, पढ़ें सर्कुलर

  • Tarkeshwar rai says:

    सत्य की जीत तो होनी ही थी। बड़े भाई को मुबारकबाद।

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  • Ajazur Rahman says:

    मैं गवाह रहा हूं… सबसे पहले तो माननीय सुब्रत राय सहारा श्री जी को उनके वैचारिक श्रेष्ठता के लिए धन्यवाद कहना चाहूंगा और उस भावना को सलाम करूंगा जिसके तहत उन्होंने एक निजी कॉर्पोरेट हाउस होने के बावजूद भारतीय संविधान के एक-एक मूल्य और आदर्शों को समूचे सहारा कैंपस का मूल आदर्श और मुल्य सखती से लागू करते हुए सभी ‘कर्मयोगियों’ से उसका पान भी करवाया है। कई बार लिख चुका हूं और एक बार फिर लिख रहा हूं कि हम अपने एक छोटे से कमरे में भी अपनी पसंद की तस्वीरें, पेंटिंग और दूसरी सामान सजाते हैं। लेकिन सहारा के कैबिन में भी आप अपनी स्वेच्छा से अपनी पसंद की कोई भी पेंटिंग लगाने के लिए स्वतंत्र हैं, नमाज़ पढ़ने के लिए ‘जा-ए-नमाज़ और बधना (खास लोटा)’ रख कर सामूहिक तौर पर रोज़ा-नमाज़, इफ्तार तरावीह सबकुछ कर सकते हैं। हालांकि, नोएडा सहारा के मेन गेट पर ही बने मंदिर से धूप की ख़ूशबू दिन भर आती रहती है। किसी व्यक्तित्व, उसकी सोच और विचारों का अंदाज़ा लगाने के लिए इतना ही काफी है।
    मैं गवाह रहा हूं, आदर्णीय श्री उपेन्द्र राय की सोच, उनके विचार और कार्यशैली का भी…श्री उपेन्द्र राय जितने युवा दिखते हैं उससे कहीं ज़्यादा युवा हैं उनके विचार… ईमानदारी तो जैसे उनकी प्रकृति है।
    एक बार का वाक़्या है, आलमी सहारा उर्दू की ज़िम्मेदारी मेरे पास थी और नेशनल कॉउन्सिल फॉर प्रोमोशन ऑफ उर्दू लैग्विज ने अपने क्रमचारियों के लिए एक कार्यशाला का आयोजन किया था जिसमें टीवी चैनल्स के स्टूडियो, न्यूज़रूम और पीसीआर का भ्रमण भी शामिल था। इसके लिए एक्सपर्ट के रूप में एक नाम मेरा भी था। लिहाज़ा, एनसीपीयूएल की टीम जब सहारा कैंपस आई तो उसने मुझे एक लिफाफा मेरे नाम का मुझे थमाया। फुर्सत मिलने पर जब मैंने उसे खोल कर देखा तो उसमें कुछ कैश पैसे थे। मैं डर गया और फौरन उसकी जानकारी अपने मीडिया हेड श्री उपेन्द्र राय को फोन पर दी। मैं जितना घबराया हुआ था उससे भी कहीं अधिक तिव्रता से एक मीडिया हेड के तौर पर श्री उपेन्द्र राय ने मुझे सुझाव दिया कि ‘आप तुरन्त उसे सहारा सहायता कोष में आज ही तारीख़ में जमा कराकर रसीद प्राप्त कर लें’ मैं सब काम छोड़ कर सबसे पहले ठीक वैसे ही किया।
    इसके अलावा अनगिनत नाम ऐसे सिर्फ मैं जानता हूं जिनको जब कहीं कोई मदद नहीं मिली तो श्री उपेन्द्र राय ने उनके इलाज, नौकरी और परिवार के जीविकोपार्जन की व्यवस्था कराई है।
    मैं श्री उपेन्द्र राय को उनकी 35-36 साल की उम्र से जानता हूं। आश्चर्य होता है कि इतना सौम्य, शालीन, शांत और मानवीय श्रेष्ठता के मुल्यों और आदर्शों के सभी नीति और व्यवहार का तलीनता से उपयोग करने वाले एक भारतीय युवा से आज के संसार में कोई समाज और उसकी व्यवस्था और कितनी उम्मीदें कर सकता है। ऐसे में जब वह युवा ना तो किसी बड़े रानीतिक या उद्योगपति घराने का राजकुमार है ना ही किसी राजतंत्र का प्रतिनिधि।
    मैं सबसे बड़ा प्रशंसक उनके पत्रकारिता की समझ का भी हूं। 2009 में पहली और दूसरी मीटींग में ही मैंने अपनी सोच के उस ढर्रे को त्याग दिया, जिसे बरसों की शैक्षणिक तपस्या और उसके अनुभवों से अपनाया था। खासकर उर्दू पत्रकारिता की बात करें तो भारतीय संदर्भ में किसी निजी उर्दू दैनिक की लोकप्रियता का मानदंड यह है कि जुमा के ख़ुतबे में ईमाम मिमबर पर खड़ा होकर उसका संपादकीय पढ़कर सुनाए।
    लेकिन, जब यही विचार यूं ही श्री उपेन्द्र राय से साझा कीं तो उनका त्वरित सवाल था कि फिर तो उसमें परोसी जाने वाली सूचना ज़्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। क्या इतने लोकप्रिय उर्दू दैनिक में परोसी जाने वाली सूचाओं को क्रॉस चेक करने का कोई तरीका है।
    श्री उपेन्द्र राय के निर्देश ने भारत में उर्दू पत्रकारिता का मेरा नज़रिया ही बदल डाला और अब मैं राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय खबरें, कला, विज्ञान, संस्कृति, समाज से लेकर ह्यूमनइंट्रेस्ट की ख़बरों के साथ-साथ संपाकीय और संपादक को लिखे गए प्रकाशित पत्रों तक की स्कैनिंग को अपना फर्ज़ समझ लिया। इससे पैदा हुए हर सवाल को जब देशज आधुनिकता की कसौटी पर आंकने की कोशिश की तो जो अनुभव हुआ अद्भुत है।

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