वेतन मांगने पर बाहर कर दिए गए सहाराकर्मी का एक खुला पत्र उपेंद्र राय के नाम

प्रतिष्ठार्थ
श्री उपेंद्र राय,
एडिटर इन चीफ
सहारा मीडिया
नोएडा

विषय- आपकी कथनी और करनी में अंतर के संर्दभ में

महोदय

मैं सहारा राष्ट्रीय सहारा देहरादून से विगत आठ साल से जुड़ा एक कर्मचारी हूं। इस दौर में मैंने देखा जो मौज सहारा के अफसर और उनके चमचे लेते रहे हैं, वह किसी की नहीं है। हम कुछ लोग खच्चर की तरह सहारा के लिए काम करते रहे और बाकी मौज लेते रहे। महोदय, यह सही है कि पहले सहारा में नौकरी को सरकारी माना जाता था और एक तारीख को वेतन एकाउंट में आ जाता था। विगत डेढ़ साल से सहारा में वेतन भुगतान संबंधी समस्या है। तर्क दिया जा रहा है कि कंपनी संकट में है तो कृपया आप हमें बता दें कि जब कंपनी संकट में नहीं थी तो प्रबंधन ने कितनी बार हमारी सेलरी बढ़ाई?

इसके अलावा कुछ सवाल हैं जिनके उत्तर आपको देने चाहिए ताकि सहारा में कार्यरत लोगों का मनोबल बढ़े। ये सवाल निम्न हैं…

-आपने प्रेरणा सम्मेलन किया। बसपा सुप्रीमो मायावती की तर्ज पर आप अकेले डायस पर बैठे और जमकर भाषण दिया। इसमें आपने जरा भी जिक्र नहीं किया कि किस तरह से कर्मचारियों का जीवन यापन हो रहा है और पिछले बकाया वेतन का भुगतान होगा कब?

-आपने अपने भाषण जिसे आप प्रेरणा कहते हैं, में टीवी सीरियल सम्राट अशोक का जिक्र किया, उसमें आपने कई बातों का उल्लेख किया, लेकिन एक भी बात ऐसी नहीं बतायी कि सम्राट अशोक ने अपनी जनता के लिए अपनी जान हथेली पर रख दी थी। पर आपने क्या ऐसा किया? उल्टे जब हम सेलरी के संकट से जूझ रहे थे तो आपने अपनी मां के निधन को ऐतिहासिक बना दिया। ऐसे प्रचार किया जैसे वो जगत जननी हों। वेतन के लिए पैसे नहीं, लेकिन मां के निधन पर अखबारों में लाखों रुपये का वेतन फूंक दिया गया। यह पैसा कहां से आया?

-महोदय, क्या मां और मां में अंतर होता है? देहरादून में तैनात एक कर्मचारी की मां बीमार थीं तो वह पैसों के अभाव में डाक्टर से सलाह के लिए सरकारी अस्पताल में घंटों अपनी मां को लेकर लाइन में लगा रहा। देहरादून के एक कर्मचारी की 11वीं कक्षा में पढ़ रही बेटी ने स्कूल में दम इसलिए तोड़ दिया कि उसका पिता पैसों के अभाव में इलाज नहीं करा सका। वह कर्मचारी खुद भी दिल का मरीज है और उसकी ओपन हार्ट सर्जरी भी हो चुकी है। महोदय, देहरादून के पटेल नगर में जहां राष्ट्रीय सहारा का आफिस है, वहां स्थित एक पेट्रोल पंप पर सहारा से निकाला गया एक कर्मचारी महज 50 रुपये रोजाना के हिसाब से नौकरी कर रहा है क्योंकि उसके पास बच्चे की फीस देने के लिए पैसे नहीं हैं। वह 1991 से सहारा में कार्यरत था। उसे महज इसलिए निकाल दिया गया कि वह वेतन मांग रहा था। सहारा अपने को विश्व का सबसे बड़ा परिवार कहता है, क्या परिवार ऐसा होता है?

-सहारा में कार्यरत सब जानते हैं कि आपने सहारा में अपनी खोई कुर्सी हासिल करने के लिए कर्मचारियों के एक गुट को भड़काया। नोएडा व अन्य स्थानों पर हड़ताल करवायी। फिर जेल में बंद सहाराश्री को भ्रमित कर नया पद व रुतबा भी हासिल कर लिया। हड़ताल का नेतृत्व करने वाले को संपादक बना दिया और जो बेचारे अपने वेतन की मांग कर रहे थे, उन्हें यूनियनिस्ट कहकर नौकरी से निकलवा दिया। यह कैसा इंसाफ है?

-आपके झूठ का पुलिंदा नोटिस बोर्ड पर चिपका हुआ है। आपने मार्च माह में दस तारीख तक वेतन देने की बात कही, लेकिन वेतन मिला 21 मार्च को। इसी तरह से उसी पत्र में कहा गया था अप्रैल में वेतन पहले सप्ताह में दे दिया जाएगा लेकिन अब तक नहीं मिला। आखिर कब मिलेगा वेतन?

-जिन लोगों को आपने कथित यूनियन (अपना वेतन मांगना यूनियनबाजी हो गया] के आधार पर नौकरी से हटा दिया, उन्हें भी आज तक पैसा नहीं दिया। क्यों?

-सेफ एक्जिट प्लान के तहत नौकरी छोड़ने वालों, कांट्रेक्ट समाप्त होने वाले कर्मचारियों व जो पहले ही नौकरी से इस्तीफा दे चुके हैं, उन्हें भी आपने अब तक हिसाब नहीं दिया। क्यों?

-महोदय, यदि वेतन संकट को छोड़ भी दिया जाए तो सहारा के अफसर आज भी मौज कर रहे हैं। यदि सहारा के अफसरों की संपत्ति सार्वजनिक करने की बात हो तो पता लगेगा कि सहारा को जितना भुगतान करना है उसका आधा तो अफसरों ने हड़पा है। कर्मचारी तो पहले भी कई साल में इंक्रीमेंट पाते थे और आज तो वेतन के भी लाले हैं। तो आप बताएं सजा कर्मचारियों को ही क्यों?

-महोदय, मैं आपको यह भी याद दिलाना चाहता हूं कि आप सहारा में मात्र एक स्टिंगर ही थे। आपकी लाइजनिंग का कोई जवाब नहीं है। यह आपकी योग्यता है कि आप इतने बड़े पद पर जा पहुंचे। लेकिन उन कर्मचारियों का क्या जो रात तीन बजे तक अखबार छापने का काम करते हैं और बदले में धेला भी नहीं मिल रहा?

-महोदय, आप यह बताने का कष्ट जरूर करें कि आपकी कथनी और करनी में अंतर क्यों है। सब जानते हैं कि आपने निजी स्वार्थ के लिए इतनी बड़ी जिम्मेदारी ली है। इसकी आड़ में आपने महज अपना फायदा सोचा, सहारा का नहीं। यदि सोचा होता तो सहारा मीडिया को और बेहतर बनाते, न कि पतन के रास्ते पर ले जाते।

आपसे विनम्र अनुरोध है कि यदि आपकी अंतरआत्मा आपको जरा भी कचोटती हो तो आप उन कर्मचारियों का दर्द महसूस करें जो सहारा से जुड़े हुए हैं। 

ये तो आप जानते ही होंगे कि मुझे भी अपना वेतन मांगने पर बाहर का रास्ता दिखाया गया.

भवदीय
सुनील परमार
देहरादून
9897593345
sun_parmar@rediffmail.com

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Comments on “वेतन मांगने पर बाहर कर दिए गए सहाराकर्मी का एक खुला पत्र उपेंद्र राय के नाम

  • ज्ञान says:

    सहारा की सच्चाई … फिल्ड रिपोर्टर का दर्द … आदरणीय श्रधेय उपेन्द्र राय जी … माननीय सी इ ओ … सहारा प्रकासन समूह नॉएडा … आदरणीय उपेन्द्र जी सदर नमस्कार ,पत्र का मजमून काफी शिकायतों से भरा है पर सत्य की कसौटी पर लिखा गया है जो सबके दिलों की बात है हकीकत है इसमें कोई फ़साना नहीं है ,मीटिंग में सभी बातें नहीं कही जा सकती है लिहाज़ा इस हकीकत को पत्र के जरिये आपसब तक संप्रेषित कर रहा हूँ ,हो सकता है पत्र के कुछ मजमून आपको गुस्सा दिलाये या फिर चैनल के लिहाज़ से आपके पद के लिहाज़ से अच्छी ना हो पर है सभी तथ्य पर खरे है, हर मीटिंग में यह बात उठती है की फिल्ड रेपोटरो को आई कार्ड दिया जा रहा है पर यह कभी हकीकत नहीं बन सका कई बार फोटो भी मंगाए गए लेकिन कभी कार्ड के दर्शन नहीं हो पाए … ठीक उसी तर्ज़ पर जैसे फ़ोनों के लिए दर्ज़नो बार फोटो मंगाए गए पर कभी फ़ोनों में इसका इस्तेमाल नहीं किया गया स्टाफ़रो को छोड़कर ,सहारा समूह में कहा तो जाता है की आपलोग लोगो लेकर घूमते हो आप हमारा बिल्ला लेकर घूमते हो यानी अप्रत्यछ रूप से कहा जाता है की आप तहसीलदार हो पर हकीकत है की कुछ अपवादों को छोड़कर सहारा समूह में फ्राड पत्रकारों की संख्या बहुत कम है ,सहारा में कभी भी फिल्ड के पत्रकार को आगे आने का मौका नहीं दिया जाता ,उसे मज़बूत करने की कवायद कभी भी नहीं की जाती है ,जो अपने वजूद पर खरा उतरकर चैनल या पत्र का नाम रोशन करने में सफल होता दिखाई देता है लोग उसे हासिये पर भेजने का पुख्ता इंतज़ाम कर डालते है ,अन्य दो टकिये चैनल इसीलिए आगे बढ़ रहे है समाज में सरकार में प्रशासन में राजनीती में उनका दबदबा बढ़ रहा है ,दुसरे यहाँ इमानदार की कभी इज्जत नहीं की जाती है ,दलालों चाटुकारों ,हरामखोरो को आगे बढाया जाता है ,और उन्ही को सभी महत्वपूर्ण जगहों पर काबिज़ किया जाता है ,क्युकी फिल्ड से लेकर ऑफिस तक उनकी अभी भी तूती बोल रही है ,इमानदार कभी अपने हेड को अपने छेत्र में महँगी शराब की बोतलें नहीं दे सकता है ,महंगे उपहार और मनुहार नहीं दे सकता है ,लेकिन वह ज़हां है वह आपको सलाम करनेवालों की संख्या में दस गुना अधिक बल मिलेगा आपके समूह का नाम होगा पर अपलोगो को नाम तो चाहिए नहीं ,पैसे चाहिए माल चाहिए इसीमे चैनल अखबार की लुटिया डूबी है ,पहले कहा जाता था की खबर चली है ,सहारा में है तब ठीक नहीं है नही तो खबर फाल्स हो सकती है ,ऐसी विस्वसनीयता वाले समूह का वजूद है की आज आधे से ज्यादा जगहों पर इनकी उपस्थिती नहीं है ,क्यों ? यह सब भी दलाली के कारन हुवा है ,डेस्क पर बैठे लोगो को यह पता नहीं FIR और सन्हा में क्या अंतर है ,क्या वह आदमी डेस्क पर बैठने के काबील है ,लेकिन पैरवी पुत्रो के कारन पूरा डेस्क ही सडा हुवा है ,एक बार कोई स्टोरी भेजता है तो कहा जाता है की इसमें विसेसग्य की बाईट नहीं है इसलिए यह स्टोरी नहीं चलेगी कल आप विसेसग्य के साथ भेजो बेचारा फिल्ड रेपोटर आदेश का पालन कर स्टोरी भेजता है स्टोरी चलती है पर उसमे विसेसग्य की बाईट नहीं होती ,कैसा लगेगा जब वह ४० किलोमीटर चलकर वह बाईक से उस बाईट को आदेश के अनुसार लाता है और नहीं चलता ? उनके हालत से डेस्क पर बैठे लोगो को कोई फर्क नहीं पड़ता है ,दस स्टोरी चलेगी तो पैसा 5 का आयेगा ,मानवीयता के दृष्टीकोण से वैसे लोगो को दोजख में भी जगह नहीं मिलेगी ,उनके बाल बच्चो को लकवा मार जायेगा ,पत्नी की किडनी फेल हो जाएगी जो इन फिल्ड रेपोटरो का पैसा अपने मन मुताबिक अवैध ढंग से काट डालते है ,क्युकी उन्हें सिर्फ दूसरो की जेब काटने की सलाहियत है बाकी काम में डब्बा है , सारे चैनल कहाँ से कहाँ चले गए पर हमारे सहारा में व्हाट्स अप पर न्यूज़ नहीं लिया जा सकता है ,मेल कीजिये FTP कीजिये अरे भाई कम्पितिसन का जमाना है फिर फिल्ड से न्यूज़ कैसे जायेगा ? और फिर आजतक ETV से अपनी तुलना करने लगते है ,अभीतक हमारे यहाँ बिल बनते है जबकि यह बात आउट डेटेड हो चुकी है ,बिल भेजो तब पैसा आयेगा क्या माज़रा है ज़बकी अपने मन से पैसा भेजते हो ? फिर चेक आयेगा, 20 दिन चेक ब्यूरो में पड़ा रहेगा, कोई बोलेवाला नहीं ,जबकि सभी चैनलों में पैसा सीधे एकौंट में आता है ,बिल बनने का लफडा क्यों ? यहाँ से स्टोरी भेजो और आई डी लो यह आई डी क्या है भाई ? इसके लिए सात सात बार फोन करना पड़ता है ,क्यों ? कोई एकौंतीब्लिटी है क्या ? छोटे से छोटे अखबार चैनल में मीटिंग होती है खाना खिलाया जाता है ,आने जाने का बिल दिया जाता है पर यहाँ का हाल देखिये – समोसा खिलाकर मीटिंग ,क्या है यह आने जाने का कोई हिसाब नहीं ,रांची ब्यूरो का हाल देखिये जब भी ब्यूरो बदला ऑफिस बदल गए धीरे धीरे ऑफिस का भवन इम्फिरियर होता गया और किराया बढ़ता गया क्यों ? क्युकी उसमे कमिसन जुड़ता गया दलाली का प्रतिसत ऊपर जाता रहा ,तब ऑफिस तो खराब होगा ही ,लेकिन कोई चैनल हेड ने आजतक इसपर सवाल नहीं उठाया क्यों ? क्युकी उनका हिस्सा भी इसमें बंधा होता है ,बोलेंगे क्यों ? यही से इतने बड़े चैनल की अवनति शुरू हो गयी ,जहाँ भी मीटिंग इटिंग शुरू हुई दलाली की रकम बांध दी गयी और पत्रकारों के हेड, कोई रिख्सावाले का नहीं ,को इसका पता नहीं क्यों क्या वह प्रेसवाले का हेड बन्ने की सलाहियत रखता है ? या फिर मैनेज हो गया तब भी वह चैनल हेड रहने के काबील नहीं ,उसे इन सब बातो से ऊपर टाईट रहना है तभी चैनल भी टाईट रहेगा पर यहाँ क्या यह सब है ,चिंदी चोर रेपोटरो को न्यूज़ करने के लिए गाडी क्यों ? क्या सभी चैनेल में ऐसा ही है क्या ? नहीं फिर यहाँ क्यों ? क्युकी सभी में दलाली की रकम शामिल है ,स्ताफरो के लोए इतनी सुविधा और फिल्ड रेपोतर के लिए एक आई कार्ड तक नहीं ,बल्कि उसके कमाए पैसे भी ये स्टाफर काट लेते है ,यही से फिल्ड रेपोटरो का हाय चैनेल को लगने लगा ,सहारा श्री को भी यही हाय लगा है , अब आठ मार्च २०१६ पटना मीटिंग को देखिये एक आदमी को ऑन स्पोर्ट प्रमोसन मिला सुमित कुमार को क्यों ? इसलिए की उसने तरफदारी में जान लगा दिया ,यही होता है सहारा में किसी आदमी को पत्रकारिता के लिए यह गौरव नही पाया ,पूरे झारखण्ड बिहार में कोई तो होगा पर उसे नहीं मिलेगा ,अब आपही बताईये की इस प्रेरणा में क्या है पत्रकारिता के लिए समर्पित होने के लिए या चमचागिरी के लिए ,आपने भाषण में कहा की इमानदारी से काम कीजिये , किस काम के लिए पत्रकारिता या कुछ और ? यहाँ सदा से यही होता रहा है ,दलाली सभी कार्यो से लेकर इमानदारी पर भारी पड़ता रहा है , कभी FTP खराब तो कभी मेल नहीं मिलता है ,यहाँ के अकर्मण्य लोग फिल्ड रेपोटरो का शोसन करते है ,फिल्ड रेपोतर को स्ट्रिंगर कहते है जबकि फिल्ड में काम करनेवाले ज्यादातर लोग ज्यादा अनुभवी है ,आपलोग भी दबाव बनाते है की आपका ब्यूरो चीफ ही आपका बोस है वही आलवेज़ राईट है ,पर यह गलत है ,व्यवसाय या मेनेजमेंट के छेत्र में बोस इस आलवेज़ राईट होता है पत्रकारिता में नहीं ,क्युकी पत्रकारिता में सीनियर ,बोस ,अधिकारी होता रहेगा तब कभी भी न्यूज़ नही बनेगा ,क्युकी रेपोतर में हीन भावना घर कर जायेगी ,ऐसे में क्या वह राष्ट्रपति प्रधान मंत्री के खिलाफ न्यूज़ बना सकेगा ? जिले के डी एम् को सर सर कहते नहीं थकेगा ,फिर आपका वजूद कहाँ जायेगा ? जहाँ पहुच चूका है ,साहबजी अपने फिल्ड रेपोटरो को मज़बूत बनाईये आपका चैनल आसमान की बुलंदियां छुवेगा ,कोई माय का लाल टच नहीं कर सकता ,पर आपलोग फिल्ड के लोगो को मज़बूत बनने से डरते है और इसी दर ने सभी को रुसवा कर दिया ,अभी ही देखिये पहले सभी जिले में चैनल को चालू करवाना चाहिए था ,फिर रेपोटरो का कार्ड इशु होना चाहिए था फिर मीटिंग होनी चाहिए थी ,पर कोई कोरम पूरा नहीं किया गया ,आपलोग वही बात ,कि अहम् ब्रमाष्मी की तर्ज़ पर की हमसे ज्यादा किसकी बुद्धि है ? पर मीटिंग रख दिया ,हर आदमी आपके सामने बोल नहीं सकता है जबकि मेरे इस पत्र में सबकी राय शामिल है ,आपलोग पत्र से भी अपनी राय मंगवा सकते थे पर ऐसा करना अपलोगो ने कभी भी मुनासीब नहीं समझा ,इसीलिए जिस चैनेल के पास भारत का सबसे उम्दा मशीनरी उपलब्ध है वह सबसे इम्फिरियर है ,क्यु ?
    विशेष आपका शुभेच्छु
    ज्ञान
    झारखण्ड
    reporterkhufia@gmail.com

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  • कोन्फ़िदेन्तिअल लैटर है … भाई आप सिर्फ सहारा मीडिया की ही बात क्यों करते है यहाँ पूरा का पूरा सहारा ग्रुप लीजिये जैसा की आज ही कई पेपर में सहारा के गुण गान किया है की इतनी संम्पति है इतने सब कुछ होते हुए भी आज सहारा के एम्प्लाइज बेचारे इ रिक्शा चलने को मजबूर है उनका क्या हो गा जिनको आज १६ महीनो से सैलरी नहीं मिल पा रही हा और ज्यादा तर पेपर इन न्यूज़ को छपने की हिम्मत नहीं कर प् रहे है कुकी डर है यहाँ सहारा की गुंडा गर्दी की जिस वजहे से सारे एम्प्लाइज बेचारे अन्दर ही अन्दर घुट रहे है यहाँ बहुतो के पास बहुत कुछ है मगर कहे किस से कुकी हरेक डिपार्टमेंट तो बिकने को तैयार है हमारे पास ही इतने जानकारी है की सबको हक़ मिल सके मगर बोलने की हिम्मत नहीं हो रही है कु की जरा से चिंगारी से कुछ नहीं होने वाला कुकी यहाँ पे जो सीनियर है वही इतने सक्षम, है की ऐसे चिंगारी को तुरंत पानी से बुझा देगे मगर कोई हमारा साथ दे तो हम सच बहार ला सकते है यहाँ हरेक एम्प्लोयी कैसे चटपटा रहा है उसके ऊपर से सिनिओर ने इतना पाबंदी की बहार जाने के लिए भी उन्ही से इजाजत लेनी होती है जो हमें बहार जाने से रोकते है उन्ही की मन मानी चल रही है और सेनिऊर लोग इस का फायदा उठा रहे है और प्लाट पे प्लाट खरीदे जा रहे है बस एक बार जरा यहाँ सहारा के स्निओर से यह पुछा जय की इतनी पर्सनल सप्पति कहा से लाये उन के पास कोई जवाब नाही है आज भी भेड और गरादिये वाली कहानी है इन भेड़ से जहा कहो गे वह हाक दो जैस भी गलत सही जो चाहो काम करा लो उसका फायदा स्निओर उठा रहे है उनके पास इतनी सम्पति है की अपनी अपनी कही न कही सेटिंग कर ली है उनको देखावे के सैलरी नहीं भी मिले तो भी उनके पेट इतने भर चुके है की कोई परवा नहीं और अन्दर हे अन्दर उनको लिफाफे के माध्यम से सैलरी मिल रही है जो की बाकियों को हेक हुए है क्या विडम्बना है कोई कुछ करने की इस्तिथि में नहीं लग रहा है आप से या उम्मीद जताई जा रही है की शायद कुछ छपे भाई माफ़ी चहेता हु मुझे हिंदी टाइपिंग नहीं आती गूगल ट्रांसलेटर का सहारा लेना पड़ा है

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  • भारत says:

    उपेन्द्र सर, जो सामूहिक निर्णय होता है वह सर्वमान्य होता है. संस्थान से सम्बंधित वरिष्ठों की संस्तुति पर जब आपका मुहर लगता है तो वह सामूहिक निर्णय होता है . सहारा कंपनी के शब्दों में वह प्रॉपर चैनल होता है. लेकिन सबको ताक पर रखकर अकेले निर्णय लिया जाता है तो वैसा निर्णय संस्थान को भला करने वाला निर्णय नहीं होता है. आपको हम सब सहराकर्मी सम्मान करते है. आपने बहुत हद तक सहारा को पटरी पर लाने की कोशिश की है. लेकिन एक सवाल कचोट रहा है कि आखिर पटना के उस ब्यूरो रिपोर्टर के सर में कौन से हीरे जड़े हैं कि सैकड़ो योग्य कर्मियों को दरकिनार करते हुए उसका १८ हजार वेतन बढ़ा दिए गए . आपने पटना यूनिट से जुडे सभी संपादकों की रिपोर्ट देखी है कि वह किस तरह का पत्रकार है. पटना में जितने स्थानीय संपादक आये सबने उस सिफारसी व झूठे पत्रकार को धिक्कार किया. सर, सभी संपादक आपके सामने है . कृपया पता तो कर लीजिये. आप माने या न माने उसे बढ़ावा देना गो हत्या के पाप के सामान है.सर, आप कृपया मौजूदा स्थानीय संपादक या यूनिट हेड से एक बार राय लेकर देख ले. यदि इनमे विश्वास नहीं है तो पिछले किसी स्थानीय संपादक से बात कर ले. आप बताईये जब सामूहिक रूप से सभी सहराकर्मियों को प्रोनात्ति देने का आपने जो नीतिगत फैसला लिया तो कितना उत्साह का संचार हो गया था. सर, हम लोग इस निर्णय को भी पचा लेंगे , किन्तु जो deserving है उसका अवश्य ख्याल रखे. अब आपसे यही आशा है.

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  • Parmaar ji, abhi tak Sahara Akhbar waley Supreme Court kyon nahi gaye? yadi nahi gaye, to ek mauka aur hai, Lucknow Labour Office me “Recovery ka case” daayar kiya ki nahi? yadi nahi, to mauka na gawayen. Foot Dalo aur Raaj karo, ye neeti Bharat me Angrejon ne sikha ker chal diye. Lekin workers ab bhi kyon nahi “EK” ho rahey….! aur mil jul kar eksath Sahara per case kyon nahin kar rahey…? Jab apni hi Nao me chhed ho, to fir Kosh kisse rahey hain?
    Yashvant ji ne hum sabon kaa Theka le rakkha hai kya? Khali likhne aur padhne se kaam nahin bantaa. Kuchh karna padta hai Paaney ke liye.
    Regards

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  • आज का अर्जुन says:

    गजब सर…… जो भी सवाल किये हैं सब वाजिब है पर पत्थर से सवाल करने से किया फायदा ? किया वो जवाब देगा ? क्या पत्थर को मूरत मान लेने से उसमे हलचल होगी। … नहीं ? इसलिए सवाल वाजिब तरीके से करो अगर इस पत्थर में हलचल करनी है तो कोर्ट के जरिये सवाल करो। सहारा के गेट पर सवाल करो। परमार सर आप तो एक साफ़ छवि के निष्ठावान कर्मचारी थे और हैं आप अमर उजाला में भी रहे. आपको अभी हाल की सहारा देहरादून की एक घटना बताता हूँ। सफाई कर्मचारी ने इन पत्थरों को हिला के जवाब माँगा था। सहारा ऑफिस में आकर उसने खूब गलिया दी. सहारा के मैनेजमेंट को गलिया दी. वहां बैठे चमचो को चिल्ला के अपना पैसा माँगा। ……. भाईसाहब शाम तक नॉएडा ऑफिस से उसका चेक बन कर आ गया। . एक 4th क्लास का कर्मी इनको सबके सामने गाली दे के अपना मेहताना ले सकता है. तो इस बात को समझना चाहिए की ये किस भाषा को समझने वाले हैं। …

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  • vivek mohan says:

    सहारा ग्रुप में जितने भी बड़े अफसर हैं उनमें से अधिकांश नाकाबिल और अनप्रफोशनल हैं। योग्यता से कहीं अधिक चाटुकारिता, भाई-भतीजावाद के साथ ही अपने से बड़े अधिकारियों को खुश करने के लिए गरम गोश्त का प्रबंध करना उनके लिए सफलता की कुंजी रहा है। उपेंद्रराय नीरा राडिया दलाली प्रकरण में सूत्रधार रहे हैं। जब दलाल और अय्याश लोग टाॅप पर होंगे तो खमियाजा निचले स्टाफ को ही भुगतना होगा। सहारा में अफसरों की पूरी फौज को बदला जाना चाहिए, तभी सुधार होगा। नहीं तो सहारा एक डूबता जहाज है।

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  • vivek mohan says:

    सहारा ग्रुप में जितने भी बड़े अफसर हैं उनमें से अधिकांश नाकाबिल और अनप्रफोशनल हैं। योग्यता से कहीं अधिक चाटुकारिता, भाई-भतीजावाद के साथ ही अपने से बड़े अधिकारियों को खुश करने के लिए गरम गोश्त का प्रबंध करना उनके लिए सफलता की कुंजी रहा है। उपेंद्रराय नीरा राडिया दलाली प्रकरण में सूत्रधार रहे हैं। जब दलाल और अय्याश लोग टाॅप पर होंगे तो खमियाजा निचले स्टाफ को ही भुगतना होगा। सहारा में अफसरों की पूरी फौज को बदला जाना चाहिए, तभी सुधार होगा। नहीं तो सहारा एक डूबता जहाज है।

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  • sir, isme naya kya hai.

    mera pf bhi to sahara ne nahi diya. bolte hain ki outstanding hai islie nahi denge. ye 6 years purani baat hai. chori to jane kab se chal rahi hai.

    Vivek

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