
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
यह जो बादाम वाली घटना बिलासपुर में हुई है, यदि ऐसी कोई घटना उत्तर प्रदेश में होती तो यहां के सरकारी विभागों में भ्रष्टाचार के दलदल में गले तक धंसे अफसरों और कर्मियों में से किसी एक को भी शर्म नहीं आती। लेकिन ऐसी घटनाएं देश में कहीं भी इसी तरह होती रहीं तो क्या पता किसी इक्का दुक्का भ्रष्ट अफसर को कभी न कभी तो शर्म आ ही जाए।
युवक द्वारा बादाम अफसर की टेबल पर फेंक कर सोशल मीडिया में रील वायरल करा देने के महज एक दिन बाद भ्रष्ट अफसर की याददाश्त वापस आ गई। जो फाइल एक साल से गुम थी, वह एक दिन में मिल गई।
जाहिर है, बादाम खाने की तो जरूरत ही नहीं पड़ी, देखकर ही याददाश्त वापस आ गई। यह अलग बात है कि अफसर मैडम ने याददाश्त वापस लाने के लिए युवक को थैंक्यू कहने की बजाय हाय तौबा मचानी शुरू कर दी है। क्यों न मचाएं भला, इसी मेमरी लॉस के चलते करोड़ों की धन संपदा बन रही थी। ऐसे ही अगर हर कोई बादाम दिखाकर उनकी याददाश्त वापस दिलाता रहा तो एक भी फाइल से उन्हें गाड़ी, बंगला, सोना, जमीन, ऐशो आराम खरीदने का योगदान नहीं मिल पाएगा।
आयुर्वेद के हिसाब से बादाम से याददाश्त तेज होती है और सौंफ आंवला मिश्री के मिश्रण से आंखें. बिलासपुर की घटना से प्रेरित होकर सोच रहा हूं कि एक किलो बादाम के साथ यह मिश्रण भी एक्स लीडा ( UPSIDA) के परियोजना अधिकारी बृजेश कश्यप को दे आऊं. उन्हें नियम कानून भूलने के साथ साथ कम दिखाई भी देता है.
सरोजिनी नगर में जमकर अवैध प्लॉटिंग चल रही है, वह कश्यप को नजर ही नहीं आता. मैं RTI, IGRS या जनसुनवाई में सवाल चाहे कोई पूछूं, उनका जवाब पिछले साल दो साल से एक दो लाइन में अंड का बंड होता है. मतलब ऐसा जवाब जिसमें सवाल कोई पूछा गया होगा, जवाब एक दो लाइन का copy पेस्ट होगा और वह भी उस सवाल का तो छोड़ो दुनिया के किसी सवाल का उत्तर उसमें नहीं होगा.
मजे की बात यह है कि शासन में कश्यप की इस मनमर्जी की चाहे कोई जितनी शिकायत कर ले, कानपुर मुख्यालय से लेकर लखनऊ में बैठे उसके आका सब कश्यप का वही कॉपी पेस्ट जवाब लगाकर जनसुनवाई तंत्र में की गई हर शिकायत का निस्तारण कर देते हैं. अब जाहिर है, बादाम के साथ साथ मिश्रण अगर देना होगा तो एक दो किलो से तो काम चलेगा नहीं. कश्यप से शुरू करके ऊपर लगभग हर अफसर को यह दोनों भेंट पहुंचानी पड़ जाएगी.
लेकिन मेरा यह मानना है कि बिलासपुर में बादाम ने असर दिखाया हो या न दिखाया हो लेकिन उसकी रील से शर्म खाकर ऊपर के अफसर जरूर कार्यवाही पर मजबूर हो गए होंगे. लेकिन उत्तर प्रदेश में शर्म नीचे से लेकर ऊपर तक किसी को नहीं आएगी, इस पर मैं किसी से भी शर्त लगा सकता हूं.
यहां तो कोर्ट जाकर ही बाकायदा मुकदमा लड़कर ही किसी भ्रष्ट अफसर या विभाग का सामना किया जा सकता है. यूपी में चुनाव होने वाले हैं और जनता भ्रष्टाचार और निरंकुश अफसरशाही से परेशान होगी तो नतीजा सामने आ ही जाएगा. बाकी लोकतंत्र में और क्या उम्मीद की भी जा सकती है…
अश्विनी कुमार श्रीवास्तव पत्रकार और उद्यमी हैं। लखनऊ में रियल एस्टेट फील्ड में सक्रिय हैं।


