वीरेन डंगवाल स्मरण : वीरेन कविता को इतना पवित्र मानता है कि अक्सर उसे लिखता ही नहीं है…

Pankaj Chaturvedi : उत्सवधर्मिता तुम्हें रास नहीं आती थी। तुम अपनी डायरी के पहले पन्ने पर ‘धम्मपद’ में संरक्षित बुद्ध का यह वचन लिखते थे : ”को नु हासो किमानन्दो, निच्चं पज्जलिते सति”—-यानी कैसी हँसी, कैसा आनन्द, जब सब कुछ निरन्तर जल रहा है। इसलिए जो तुम्हारा मस्ती-भरा अंदाज़ दिखता था, वह तुम थे नहीं! वह एक आवरण था, जिसमें तुम अपने अंतस की आभा छिपाये थे। जैसा कि ‘प्रसाद’ कहते हैं—-”एक परदा यह झीना नील छिपाये है जिसमें सुख गात।” असद ज़ैदी ने ठीक लिखा है कि उनकी नहूसत और तुम्हारी चपलता दरअसल एक ही धातु से निर्मित थी।

अचरज नहीं कि संवेदनात्मक या बौद्धिक रूप से किसी का शिथिल पड़ना या बेज़ार होना तुम्हें पसंद नहीं था। उसे तुम अपने ख़ास टोन में मंद की बजाए ‘मंदा’ कहते : ”यह मंदा हो गया है, यार!” जैसे दीपक की लौ धीमी हुई हो। इसी तरह लेखकों का सालाना सम्मिलन करानेवाली एक संस्था के आयोजक से तुमने कहा था : ‘यह अच्छी गतिविधि है। पर मुझे शक है कि आप लोग खाने-पीने के लिए इकट्ठा होते हैं! उसमें विचार का तत्त्व कम है।’

तुम्हारी कविता में जो मूर्तिभंजन की कला है, वह जीवन से आती है; जहाँ तुम मठों की उच्छृंखलता पर चोट करने का जोखिम उठाते और एक कृत्रिम प्रभामंडल में लिपटा हुआ किसी को रहने नहीं देते थे। इसके लिए शराब के नशे को तुमने कभी-कभी बहाने के तौर पर इस्तेमाल किया। मसलन स्त्रियों से निकटता की अपनी कोशिशों के लिए विख्यात एक आलोचक से तुमने कहा था : ”मज़ा कर रहे हो भाईसाहब!” और फिर इससे ख़ुश हो रहे उनके दोस्त से भी यही। लाज़िम था कि वह इनकार करते। उस समय उनके हाथ में एक ‘टूथपिक’ थी। तुमने कहा : ”नहीं भाईसाहब, जिस तरह आप दाँत खोद रहे, उससे तो लगता है कि मज़ा आप भी कर रहे हो!”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 45)

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औपचारिकता, अनुशासन और अकादमिक जड़ता तुम्हारे वश की नहीं थी। ‘रचना के लिए एक महान् आलस्य चाहिए’—-यह ज्ञानरंजन का कथन है और इसका सत्यापन मैंने तुम्हारी ज़िन्दगी में देखा। तुम्हारे प्रिय कवि-मित्र मंगलेश डबराल ने अपनी डायरी में यह अनूठी बात दर्ज की थी कि वीरेन कविता को इतना पवित्र मानता है कि अक्सर उसे लिखता ही नहीं है। लेकिन तुम्हारा यह एहसास कविता तक महदूद नहीं था। तुमने डॉक्टरेट के लिए शायद ‘शमशेर, मुक्तिबोध और साही की कविता में मिथक-चेतना’ पर शोध किया था। एक बड़े प्रकाशक तुम्हारा वह प्रबन्ध छापने को तैयार थे। मगर तुम्हें मुझे दिखा लेना मुनासिब लगा। मैंने पढ़ने के बाद कहा : ‘काम मूल्यवान् है, पर भाषा थोड़ी कठिन है। आप इसमें प्रवाह और पारदर्शिता लाने के लिए फिर से लिखिये!’

तुम बहुत परेशान होकर बोले : ”दोबारा तो हमसे न हो पायेगा!” तब से इस मसले पर हमारी बात तो नहीं हो सकी, पर इतना जानता हूँ कि तुमने उसे प्रकाशित नहीं कराया। काम में अगर कोई क़सर हो, तो उसे सामने लाकर पाठक की चेतना पर अतिरिक्त दबाव डालना तुम्हें एक क़िस्म की हिमाक़त लगती थी। मगर इस वजह से काम को स्थगित रखना या टालते जाना भी तुम्हारी नज़र में आदर्श स्थिति नहीं थी, न तुमने कभी उसका महिमामंडन किया। एक बार तुमने मुट्ठी बंद की और खोली और फिर बोले : ”ज़िन्दगी इसी तरह कब हाथ से रेत की मानिंद फिसल गयी, जान नहीं पाये।” कभी-कभी तुम कहते थे :”जो ग़लती हमसे हुई, वह तुम न करना! बकवास नहीं, काम करना प्यारे!”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 44)

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बेचैनी यथास्थिति की बर्फ़ तोड़ती है और सुंदरता प्रवाह में है। बर्टोल्ट ब्रेष्ट एक कविता में कहते हैं कि ‘जिस जगह से मैं आ रहा, वह मुझे पसंद नहीं और जहाँ मैं जा रहा, वह जगह भी मुझे पसंद नहीं। फिर ऐसा क्यों है कि सड़क के किनारे बैठा मैं, बस के बदले जाते पहिये को बड़ी बेचैनी से देख रहा हूँ !’

एक बार तुम्हारे एक कवि-मित्र जब तुमसे मिलने आये, अनूठी घटना घटी। तुम्हारे दफ़्तर जाते वक़्त वह बोले : ‘मैं भी साथ चलूँगा, यहाँ घर पर रहकर क्या करूँगा ?’ दफ़्तर पहुँचकर जब तुम गाड़ी से उतरे, उन्होंने कहा : ‘मैं यहीं रहूँगा, दफ़्तर में मेरा क्या काम?’

और वह गाड़ी में ही रहे, उस दिन शाम को दो-तीन घंटे जितना भी समय तुम्हें दफ़्तर में देना पड़ा हो। मेरे लिए वह हँसने की नहीं, बल्कि एक बड़ी बात थी। जैसे वह कविता थी ब्रेष्ट की! तुम भी एक जगह रह नहीं सकते थे। एक सफ़र में कुछ तकलीफ़ मिलने पर मैंने खिन्न होकर तुमसे कहा : ‘अब मैं कहीं आऊँ-जाऊँगा नहीं।’ तुम मेरा दिल नहीं दुखाना चाहते थे, फिर भी मुझसे सहमत न थे: ”अभी यह प्रतिज्ञा मत करो, कुछ वर्ष बाद कर लेना!” आज तुम्हारी कविता पढ़ता हूँ, तो समझता हूँ कि तुम क्या कहना चाहते थे : ”जो सुन्दर था / गतिमान भी था वही / पकड़ा न गया। —-पकड़ा गया मैं / जकड़ा गया।”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 37)

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तुम्हारे सामने अभिमान व्यर्थ हो जाता था। एक बार मैंने ज़रा गर्व से तुम्हें बताया कि जब मैं पढ़ता था, मुझसे वरिष्ठ एक छात्र गुरु जी की ख़ुशामद किया करते थे। मगर मैंने नहीं की। तुम बहुत शान्ति से बोले : ”तुम्हें उसकी ज़रूरत नहीं थी।”

(वीरेन डंगवाल स्मरण : 46)

हिंदी के प्रतिभाशाली कवि और आलोचक पंकज चतुर्वेदी फेसबुक पर लगातार ‘वीरेन डंगवाल स्मरण’ लिख रहे हैं. अब तक 46 कड़ियां प्रकाशित कर चुके हैं. पंकज के ही एफबी वॉल से कुछ नई कड़ियां उठाकर यहां प्रकाशित की गई हैं: पंकज से फेसबुक के जरिए संपर्क इस लिंक पर क्लिक करके किया जा सकता है: Facebook.com/pankaj.chaturvedi.5621

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