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सुख-दुख

अरे मैं तो समझ ही नहीं सका कि आप विविध भारती वाले यूनुस खा़न हैं!

यूनुस ख़ान-

हुत बदहवास सुबह थी। यात्रा की आपाधापी में बीती रात नींद नहीं हुई थी। फ़्लाइट पहुंचते ही टैक्‍सी बुक की। तीन बार कैंसिल हुई।

आजकल मुंबई में ऐसा बहुत होता है।

आखिरकार संजय शेडगे आए। टैक्‍सी लेकर। उन्‍होंने विविध भारती लगा रखा था। स्‍थानीय केंद्र से मराठी गीत बज रहे थे।

आशा ताई की आवाज़ गूंज रही थी। मैंने संजय को परखने के लिए एक जुमला दाग़ दिया, अरे ये क्‍या, कोई धूम-धड़ाम चैनल नहीं सुन रहे हैं आप।

संजय तैश में आ गये। ‘आपको पता नहीं है सर, यही है सबसे अच्‍छा चैनल। मैं तो सारा दिन बस यही सुनता हूं’।

मैंने कहा, ‘पर बाक़ी बहुत टैक्सियों में तो वो नये गाने बजते रहते हैं’। ये फिर परखने की कोशिश थी।

संजय बोले, ‘अरे सर, बजते होंगे, पर मैं विविध भारती का हूं और हमेशा ही रहूंगा’।

इसके बाद उन्‍होंने तमाम कार्यक्रमों के नाम बताए। ये भी बताया कि इन गानों के ज़रिए उनका दिन सुकून से कट जाता है। फिर संजय ने बताया कि वो घाटकोपर में पले बढ़े हैं, वैसे मूल निवासी हैं सातारा के। मैंने चुटकी ली–वहां तो बड़ा मज़ा आता है। फ्लाइट टेक-ऑफ़ होते और लैंड होते देखते रहो।

बस….यादों का पिटारा खुल गया।

संजय ने बताया कि किस तरह दोपहर को वो अपने साथियों के साथ किशोरावस्‍था में टेकड़ी पर चले जाते थे। और हवाई जहाज़ उड़ते और उतरते देखते रहते थे। उन्‍होंने बताया, तब टीवी नहीं था ना साहब, दुनिया जल्‍दी सोती थी। हमको सात बजे से पहले घर लौटना पड़ता था, पिताजी के डर से।

संजय से मैंने पूछा फिल्‍मों के बारे में। उन्‍होंने बताया कि तब घाटकोपर में तीन बड़े थियेटर थे। श्रेयस, राजहंस और ओडियन। अब क्‍या बतायें सर। ओडियन को तो मल्‍टीप्‍लेक्‍स बना दिया गया है। इसलिए वो मज़ा नहीं आता। इन टॉकीजों में हमने मधुमति भी देखी। और ज़ंजीर भी।

उन्‍होंने बताया कि अमिताभ की फिल्‍में वो पहले दिन पहला शो देखते थे। ज़ंजीर और दीवार उनकी फ़ेवरेट फिल्‍में हैं।

सफ़र में मज़ा आ रहा था। संजय शेडगे और मैं अमिताभ के डायलॉग एक-दूसरे को सुना रहे थे।

संजय से मैंने कहा, आपने कभी रेडियो का स्‍टूडियो देखा है। ये भी पूछा कि कभी कोई रेडियो वाला आपकी टैक्‍सी में बैठा है।

संजय बोले, अरे साहब हमारी ऐसी किस्‍मत कहां।

मैंने उन्‍हें रास्‍ते में विविध भारती की इमारत दिखायी। बताया कि आप जो रेडियो सुन रहे हैं वो यहीं से प्रसारित होता है। बड़े खुश हुए।

तब तक घर आ गया। संजय को मैंने तयशुदा रकम दी। कुछ इनाम भी।

तब तक उन्‍होंने सवाल दाग़ा–वैसे साहब आप क्‍या करते हैं।

मैं एक पल ख़ामोश रहा– फिर लगा, बता देना चाहिए।

मैंने कहा, मैं विविध भारती में एनाउंसर हूं।

एकदम वो ख़बरदार हो गये, अरे अरे मैं तो समझ ही नहीं सका कि आप विविध भारती वाले यूनुस खा़न हैं। कभी सोचा भी नहीं था कि आप हमारी टैक्‍सी में आयेंगे।

संजय ने बताया कि उनके जुड़वां बच्‍चे हैं और वो उन्‍हें स्‍टूडियो दिखलाना चाहते हैं। जाते-जाते उन्‍होंने ये सेल्‍फ़ी भी ली।

इस शहर में हर शख्‍़स एक किरदार है।

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