व्यभिचारी सत्ता ने बिहार में मीडिया पर सेंसरशिप थोपा

लंगोट ढीली सिस्टम की और बंदिशें मीडिया पर… पाकिस्तान में सरकारी मीडिया से सेंसरशिप हटाए जाने की खबर के ठीक एक दिन बाद खबर मिली कि भारत के बिहार में मीडिया पर सेंसरशिप लगा दी गई है। बिहार के मुजफ्फरपुर के एक शेल्टर होम में 29 लड़कियों के साथ रेप हुआ था। बार-बार इन लड़कियों को रसूखदारों के पास भेजा गया और बार-बार इनकी अस्मत लूटी गई। इस मामले का खुलासा जिस मीडिया ने किया अब उसी मीडिया को इस मामले में किसी भी तरह की रिपोर्टिंग से रोक दिया गया है। तो आखिर मीडिया को मुजफ्फपुर कुकांड की रिपोर्टिंग से रोका क्यों गया?

इस सवाल का जवाब ढूंढने के लिए खुद को पटना हाईकोर्ट के उस आदेश तक मत सीमित रखिए जिस आदेश का हवाला देकर सेंसरशिप लागू की गई है। इस सेंसरशिप को ठीक से समझने के लिए उस तस्वीर को याद कीजिए जो तस्वीर ब्रजेश ठाकुर की गिरफ्तारी के बाद सामने आई थी। पुलिस हिरासत में ब्रजेश ठाकुर का मुस्कुराता चेहरा तब सबने देखा था। ये वही ब्रजेश ठाकुर है जो सेवा संकल्प एवं विकास समिति नाम से एक एनजीओ चलाता है और उसी एनजीओ के शेल्टर होम में वो लड़कियां रह रहीं थीं जिन्हें रोज किसी न किसी के बिस्तर पर पहुंचाया जाता था। तो वही ब्रजेश ठाकुर गिरफ्तारी के बाद हंसता-मुस्कुराता मीडिया का सामने आया। हंसता-मुस्कुराता कोर्ट रूम में पहुंचा और हंसते-मुस्कुराते ही जेल के बजाय अस्पताल पहुंच गया। तो मतलब साफ है कि ब्रजेश को ना तो कानून का डर था और ना ही रेप को धंधा बनाने का कोई अफसोस। मतलब, ब्रजेश ये जानता था कि जिस मीडिया ने उसके बलात्कारी धंधे का खुलासा किया है उस मीडिया पर नकेल कैसे कसी जाएगी।

मतलब, ब्रजेश को पूरा भरोसा था कि सिस्टम उसकी मर्जी से काम करेगा और वो उसी तरह हंसता-मुस्कुराता उन बेटियों के सामने एक दिन फिर खड़ा होगा जिनकी अस्मत का वो सौदा करता रहा है। मतलब, ब्रजेश को पता था कि उसके रसूख के सामने न तो समाज की नैतिकता टिकेगी और ना ही पुलिसिया जांच के चोंचले। और हुआ भी वही। 29 लड़कियों का लगातार रेप करवाने वाले ब्रजेश के रसूख के सामने सीबीआई की एक न चली और मामले की जांच कर रहे जेपी मिश्रा का तबादला करना पड़ा। ये तबादला सीबीआई मुख्यालय से हुआ। और तब हुआ जब जेपी मिश्रा के हाथ सफेदपोशों तक पहुंचने लगे थे। इतना ही नहीं सीबीआई ने पटना हाईकोर्ट में मामले की स्टेटस रिपोर्ट भी नहीं सौंपी। तो जाहिर है ब्रजेश ठाकुर और ब्रजेश ठाकुर जैसे लोग 29 लड़कियों का रेप करवा कर हाथ में हथकड़ी पहने सिस्टम की खिल्ली ही उड़ाएंगे।

अब बात सेंसरशिप की। जिस कांड का खुलासा ही मीडिया ने किया अब उसी मीडिया को रिपोर्टिंग से रोकने का मतलब है क्या ? दरअसल, सीबीआई जांच में जो तथ्य सामने आ रहे हैं उन तथ्यों का खुलासा मीडिया के ज़रिए पहले ही हो चुका है। बिहार के कई बड़े अधिकारी और राजनेता मुजफ्फरपुर के उस शेल्टर होम में मौज-मस्ती के लिए जाते रहे हैं और वहां से लड़कियों को पटना बुलवाते रहे हैं। परत दर परत खुलते कुकांड से हाकिम से लेकर हुक्काम तक सहम गए हैं। खुद की कॉलर तो बचानी ही है अपने हाकिम को भी बचाना है।

गुरुवार को बिहार के समाज कल्याण विभाग ने राज्य के महाधिवक्ता के एक पत्र को आधार बनाकर मामले की मीडिया रिपोर्टिंग पर प्रतिबंध लगा दिया। गुरुवार को ही पटना हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकार ने कोर्ट से कहा था कि मीडिया रिपोर्टिंग की वजह से सूचनाएं लीक हो रहीं हैं और जांच प्रभावित हो रही है। हाईकोर्ट ने साफ कहा था कि वैसी सूचनाओं के प्रसारण-प्रकाशन से मीडिया को बचना चाहिए जिनसे जांच प्रभावित होती हो। हाईकोर्ट की इस टिप्पणी में कहीं भी मामले की रिपोर्टिंग पर पूरी तरह से रोक का जिक्र नहीं है। लेकिन डरी ब्यूरोक्रेसी और सहमी सरकार ने हाईकोर्ट से एक कदम आगे जाकर मामले की मीडिया रिपोर्टिंग को पूरी तरह से प्रतिबंधित कर दिया। मीडिया सेंसरशिप की हड़बड़ी में सरकार ये भी भूल गई कि ऐसा कोई भी आदेश सूचना प्रसारण विभाग से ही जारी हो सकता है समाज कल्याण विभाग से नहीं। समाज कल्याण विभाग इसके लिए सूचना प्रसारण विभाग को चिट्ठी भेज सकता है। लेकिन ब्रजेश की मुस्कुराहट पर लहालोट अधिकारियों ने प्रक्रिया में समय गंवाना मुनासिब नहीं समझा और समाज कल्याण विभाग से ही मीडिया सेंसरशिप लागू करवा दिया।

तो फिर ब्रजेश ठाकुर मुस्कुराए क्यों नहीं ? जिसकी मुस्कुराहट के लिए सीबीआई के एसएसपी स्तर के अधिकारी का तबादला हो सकता है, जिसकी मुस्कुराहट के लिए हाईकोर्ट की तमाम सख्ती के बावजूद कोर्ट में स्टेटस रिपोर्ट नहीं पेश किया जाए और जिसकी मुस्कुराहट के लिए मीडिया को आपातकाल में धकेल दिया जाए वो भला मुस्कुराए नहीं तो क्या करे।

सिस्टम की खिल्ली उड़ाता ब्रजेश किसी की भी कलई खोल उसे नंगा करने की ताकत रखता है। ब्रजेश की इस ताकत का अंदाजा उन्हें भी है जिन्हे सीबीआई को संभालना है, उन्हें भी है जिन्हें बिहार की हुकूमत संभालनी है और उन्हें भी है जिन्हे बिहार का प्रशासनिक अमला संभालना है। तो फिर फिक्र ब्रजेश ठाकुर की ही करनी होगी। क्योंकि, कानून, न्याय, बेटियां, अस्मत और समाज की फिक्र में तो इनकी खुद की गरदन ही फंस जाएगी। तो जाहिर है ब्रजेश ठाकुर इस सिस्टम की खिल्ली ही उडाएगा।

लेखक असित नाथ तिवारी चर्चित टीवी एंकर हैं.

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