जानिए उन ड्रग्स के बारे में जिन्हें खाकर सैनिक न सोते और न थकते…

युद्ध और ड्रग्स। पढ़े होंगे खूब, आर्यों और उनके प्रिय पेय सोमरस का जिक्र। सोमरस एक मादक द्रव्य, पिये और मस्तिष्क पर उन्माद का ज्वर। कई जगह जिक्र मिलता है कि इसके सेवन से लोगों में घोड़ो की ताकत आ जाती थी। तो इस द्रव्य का पान करके आर्य कूदते थे रणभूमि में और दुश्मनों को अश्वबल से रौंद डाला करते थे। इसी तरह वाइकिंग योद्धाओं के बारे में कहा जाता है कि वे जब लड़ते हैं, सब बर्बाद करते जाते हैं। हर योद्धा खून के प्यासे लोमड़ी की तरह होता है। दरअसल वाइकिंग लड़ाके विशेष मशरूम का सेवन करते थे। बाबर वाला प्रसंग भी काफी चर्चित है। बाबर की सेना भांग पीकर लडती थी। एक दम मस्त होकर। इब्राहिम लोदी की हार में बाबर के भांग का भी अहम् योगदान था। रोमन साम्राज्य की सेना में अफ़ीम का बहुत प्रचलन था। यूनान में पुजारी लोग राजाओं और उनकी सेना को विजयी होने के लिए प्रसाद के रूप में मादक पदार्थ ही दिया करते थे। मतलब बस यही कि युद्धों में ड्रग्स का इस्तेमाल कोई नयी बात नहीं है।

समय के साथ इसका स्वरूप बदला। बदले स्वरूप की चर्चा बाद में। पहले यह जानें कि युद्धों में इस कदर ड्रग्स का इस्तेमाल होता क्यों है? युद्ध का सबसे बड़ा नियम है कि इसका कोई तय नियम नहीं होता है। जिस विधि आप जीत सकें, वही सही नियम है। इस नियम का पालन नहीं करने पर हश्र पृथ्वीराज चौहान हो जाता है। हाँ, एक चीज तय है कि जीतना है और इसके लिए सामने जो भी आये उसे मौत देनी है। ड्रग्स करता यह है कि दिमाग को छुट्टी दे देता है। छुट्टी पर गया दिमाग फिर शरीर का दर्द भी भूल जाता है। आदमी जख्मी होकर भी बेख़ौफ़ लड़ता है। बाद में युद्ध भी कारोबार हो गया। कारोबार का भी एक तय नियम कि कीमत चाहे जो हो, मुनाफा अधिक से अधिक रहना चाहिए। बदले समय में हथियार और ड्रग्स सबसे मुनाफे की चीज बने और इन दोनों की खपत के लिए युद्ध आवश्यक। अब तीन अलग युद्धों का जिक्र। पहले द्वितीय विश्व युद्ध, फिर वियतनाम युद्ध और अंत में अभी का पश्चिम एशिया।

द्वितीय विश्वयुद्ध में पहली बार व्यापक पैमाने पर ड्रग्स का इस्तेमाल हुआ। सभी पक्षों ने खूब किया। जर्मनी में हिटलर के तानाशाह बनने से पहले बाजार में ड्रग्स एकदम सहजता से उपलब्ध थे। हिटलर ने सत्ता संभालते ही इसपर प्रतिबन्ध लगा दिया। कुछ ही साल बाद उसने इसका भयानक उत्पादन भी शुरू कराया। 1937 में जर्मनी ने Pervitin का पेटेंट कराया। इसके अलावा एक चॉकलेट हिल्डरब्रैंड। जुलाई 1940, युद्धों के इतिहास का बड़ा महीना। संख्या में कम जर्मन सेना ने फ्रांस को एकदम चीर कर धर दिया था। हिटलर ने वर्साय के महल में अपनी ताजपोशी कराकर वर्साय की संधि का बदला लिया था। एक ब्रिटिश सेनापति ने बाद में लिखा था कि जर्मन सेना टिड्डियों के झूंड की तरह बढ़ते चले जाती थी, राह में जो पड़ा सब मटियामेट करते हुए, रात में भी मीलों तय कर लेती थी, मानो जर्मनों को नींद भी नहीं आती है। दरअसल सिर्फ इस एक महीने में फ़्रांस के मोर्चे पर जर्मन सेना को तीन मिलीग्राम के 3.5 करोड़ pervitin टैबलेट की आपूर्ति की गयी थी। इस ड्रग के प्रभाव में सेना को नींद नहीं आती थी और वह बिना रुके 50-50 घंटे तक मार्च कर लेती थी। मित्र राष्ट्रों की सेना भी पीछे नहीं थी। ये Benzedrine Sulphate का इस्तेमाल करती थी। ब्रिटिश सेना को सख्त निर्देश था कि हर सैनिक 5-6 घंटे में एक टैबलेट जरूर ले। मित्र राष्ट्रों की सेना ने 7.2 करोड़ टैबलेट का इस्तेमाल किया था।

वियतनाम युद्ध ड्रग्स के इस्तेमाल के लिए ख़ासा चर्चित हुआ है। अल जज़ीरा के अनुसार अमेरिकी सेना ने Amphetamine का भरपूर इस्तेमाल किया था। करीब 22.5 करोड़ टैबलेट की खपत हुई थी। गांजे का आंकड़ा इससे इतर। इस युद्ध में अमेरिका के 58 हजार सैनिक मरे थे। इस युद्ध से लौटने के बाद 70 हजार से अधिक सैनिकों ने आत्महत्या की थी। कारण बस यही कि वे ड्रग एडिक्ट हो चुके थे। लौटे तो कई तरह के मानसिक अवसाद के शिकार। ये आत्महत्यायें इन्हीं का परिणाम। आज की तारिख में अमेरिका में ‘पोस्ट ट्रौमिक स्ट्रेस सिंड्रोम’ के मरीजों में दो लाख से अधिक लोग विभिन्न युद्धों से लौटकर आये सैनिक हैं।

अब पश्चिम एशिया। पश्चिम एशिया में चाहे इस्लामिक स्टेट हो या अल कायदा का नुसरा फ्रंट या हाउती या शिया मालिशिया, सबके बीच Captagon बहुत लोकप्रिय है। हथियार लूटने के बराबर ख़ुशी Captagon लूटने की भी मनाते हैं ये लोग। बीबीसी की एक डॉक्यूमेंट्री है सीरिया’ज वार ड्रग। इसमें एक लड़ाका कह रहा है, जब मैं Captagon ले लेता हूँ, कोई डर नहीं होता। इसके बाद तो आप सो भी नहीं सकते, आँखें बंद ही नहीं होंगी।

आंकड़े कहते हैं कि अब ड्रग्स की खपत में दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र मने पूरा दक्षिण अमेरिका और उत्तरी अमेरिका में अमेरिका और कनाडा को छोड़कर शेष देश, से बहुत आगे निकल चुका है पश्चिम एशिया। सवाल पहले भी था कि दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में ड्रग्स का इतना प्रचलन कैसे? मैक्सिको, बोलीविया, ब्राजील, ऐसे कई देश है जहां ड्रग डीलर इतने शक्तिशाली कि सेना सरीखी गिरोह रखते हैं। कहाँ से मिलता है इनको इतना संसाधन? इसी तरह सवाल यह है कि पश्चिम एशिया के देशों में कहाँ से पहुँच रहा है इतना ड्रग्स? आसान उत्तर है। दक्षिणी प्रशांत में उन शक्तिशाली गिरोहों को जो हथियार और ड्रग्स दोनों मुहैया करा रहा था, वही यह काम पश्चिम एशिया में भी कर रहा है।

(रायटर, अल जज़ीरा और बीबीसी के साथ में कुछ किताबों और कई वेबसाइटों का आभार।)

लेखक सुभाष सिंह सुमन पत्रकार हैं. उनका यह लिखा उनके एफबी वॉल से लिया गया है.

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