जमीन वापसी तो ठीक है, छत्तीसगढ़ में टाटा का प्लांट लगा क्यों नहीं

टाटा स्टील के प्लांट के लिए अधिगृहित जमीन आदिवासी किसानों को लौटाने का छत्तीसगढ़ सरकार का फैसला राजनीति दृष्टि से बहुत ही सधा हुआ है। अब लगता है कि यह काम भाजपा भी कर सकती थी। लेकिन जैसा कि जीएसटी पर उसके तेवर से लग रहा है, तीन राज्यों का चुनाव हारने से पहले उसे यकीन ही नहीं था कि ऐसा भी हो सकता है। हालांकि, ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि ये तीन राज्य भाजपा ने जानबूझकर हारे हैं ताकि ईवीएम पर भरोसा बना रहे। और मुख्य चुनाव के समय उसका उपयोग हो सके। लेकिन वह भी अटकल है और अभी मुद्दा नहीं है। असली मुद्दा किसानों की अधिगृहित जमीन वापस करने का है। खासकर तब जब किसान केंद्र सरकार ने नाराज हैं और परेशान चल रहे हैं।

यह काम मीडिया का भी था कि जब रोजगार का संकट चल रहा है तो आपको बताया जाता कि एक कारखाना जो लगना था वह क्यों नहीं लगा? क्या आपको किसी ने बताया? अभी भी मुद्दा राजनीति ही है – कारखाना क्यों नहीं लगा यह विषय गौण है। वैसे ही जैसे गांधी जयंती पर और फिर दिसंबर के शुरू में दिल्ली में किसानों की रैली से किसानों की नाराजगी साफ थी पर मुद्दा नहीं था। केंद्र सरकार ने किसानों को खुश करने के लिए कुछ नहीं किया। मीडिया को दिल्ली में ट्रैफिक जाम की चिन्ता ज्यादा रही। सरकार ने किसानों की शिकायत सुनने की कोई कोशिश नहीं की और तेवर में जरा ढिलाई नहीं दिखी। जबकि छत्तीसगढ़ का मामला किसानों को खुश करने का अच्छा मौका था। कांग्रेस ने घोषणा पत्र में कह रखा था और कांग्रेस सत्ता में आई तो ऐसा होगा। यह अनुमान भी था। ऐसे में भाजपा सरकार ने किसानों को जमीन वापस करने की घोषणा की होती तो उसे कांग्रेस की अब की घोषणा के मुकाबले ज्यादा राजनीतिक लाभ मिलता और इसके लिए उसे कुछ खास करना भी नहीं था।

इसके लिए आपको भूमि अधि‍ग्रहण में उचि‍त मुआवजा एवं पारदर्शि‍ता का अधि‍कार, सुधार तथा पुनर्वास अधि‍नि‍यम, 2013 की याद दिलाता हूं। यह कानून यूपीए सरकार के आखिरी दिनों में प्रस्तावित हुआ था। इसे 29 दिसंबर 2014 को केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी मिली थी। उधर दिल्ली के पास भट्टा परसोल में जमीन अधिग्रहण के खिलाफ लंबे समय से चल रहे किसानों के आंदोलन में राहुल गांधी ने सक्रियता से भागीदारी की थी। दूसरी ओर, अधिग्रहण कानून में मई 2015 तक संशोधन किए जाते रहे। हालांकि, इसके बावजूद इस अधिनियम में यह प्रावधान है कि भूमि का उपयोग पांच साल तक नहीं हुआ तो (कुछ स्थितियों को छोड़कर) जमीन किसानों को वापस कर दी जाएगी।

इसी के तहत कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में कहा था कि वह इस भूमि को किसानों को वापस कर देगी क्योंकि टाटा की परियोजना टल गई है और अधिग्रहण 2005 में शुरू हुआ था और 2016 में परियोजना से हाथ खींचने की कंपनी की घोषणा के समय भी चल रहा था। उस समय हुए करार के अनुसार यहां 19500 करोड़ रुपए की लागत से टाटा स्टील का प्लांट लगाया जाना था। इसके लिए 10 गांवों की 1765 हेक्टेयर भूमि का अधिग्रहण किया गया था जो 1707 आदिवासी किसानों की थी। कंपनी को 2000 हेक्टेयर भूमि की आवश्यकता थी और वह आदिवासियों से सीधे जमीन नहीं खरीद सकती थी।

टाटा स्टील की छत्तीसगढ़ परियोजना के उस समय के प्रमुख आनंद सिन्हा ने अगस्त 2016 में कहा था कि भूमि आवंटन में देरी के कारण कंपनी ने इस परियोजना को छोड़ देने का निर्णय किया है। उस समय छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम के प्रबंध निदेशक सुनील मिश्रा ने कहा था कि भूमि अधिग्रहण का काम तब भी जारी था। दूसरी ओर, इस प्लांट के लिए आवंटित लौह अयस्क की खान वाली 2500 हेक्टेयर भूमि का आवंटन राज्य सरकार ने 2008 में रद्द कर दिया था क्योंकि कंपनी निर्धारित समय में काम शुरू नहीं कर पाई। नियमानुसार कंपनी को दोबारा यह आवंटन नहीं किया जा सकता था और इसके लिए फिर नीलामी में भाग लेना होता। ऐसे में राज्य सरकार चाहती तो यह जमीन किसानों को वापस करके श्रेय ले सकती थी पर उसने मौका हाथ से निकल जाने दिया। बताया जाता है कि अधिग्रहण छत्तीसगढ़ राज्य औद्योगिक विकास निगम ने किया था और राज्य सरकार की योजना भूमि बैंक बनाने की थी

प्लांट लगाने के लिए करार पर दस्तखत के बाज जून 2005 में जारी टाटा स्टील की प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया था कि सभी वैधानिक क्लियरेंस मिलने के बाद 48 से 60 महीने में प्लांट के पहले चरण की स्थापना हो जाने की संभावना है। डेढ़ साल बाद 12 दिसंबर 2006 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति में कंपनी ने बताया था कि छत्तीसगढ़ राज्य के दूर-दराज के ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने के लिए जगदलपुर रेलवे स्टेशन पर लाइफलाइन एक्सप्रेस का उद्घाटन किया गया था। यह टाटा स्टील के सहयोग से चलने वाला मोबाइल अस्पताल है। स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण देने और रोजगार पाने योग्य बनाने के लिए भी कंपनी ने काम किए थे।

कंपनी ने सितंबर 2016 में संकेत दिए कि कई तरह की समस्याओं जैसे स्थानीय लोगों का विरोध, इलाके में नक्सलियों की उपस्थिति आदि की वजह से कंपनी ने इसे आगे नहीं बढ़ाने का निर्णय किया है। इसमें जमीन का आवंटन नहीं होना और खान का आवंटन रद्द हो जाना भी मुद्दा रहा होगा पर इसका विवरण अभी उपलब्ध नहीं हुआ। किसानों की जमीन लौटाना तो राजनीतिक मामला है पर 2005 में करार के बावजूद 2016 तक प्लांट नहीं लगना और टाटा का इससे हाथ खींच लेना सरकारी नालायकी भी तो है। कुल मिलाकर, सरकार की नालायकी से प्लांट नहीं लगा और जमीन लौटाने का राजनीतिक लाभ भी वह नहीं ले पाई।

जमशेदपुर में पला-बढ़ा होने के कारण टाटा समूह के बारे में मेरी राय अलग है और अमूमन मैं टाटा से संबंधित मामलों पर प्रतिक्रिया बहुत सोच समझ कर करता हूं। इसलिए टाटा स्टील के लिए अधिग्रहित जमीन किसानों को वापस करने के छत्तीसगढ़ सरकार के फैसले पर टिप्पणी करने से पहले टाटा समूह की प्रतिक्रिया जानना चाहता था। पता चला कि इसपर समूह की कोई प्रतिक्रिया नहीं है। यानी जिनसे संपर्क किया गया उन्हें कुछ नहीं कहना है। टाटा समूह से प्रतिक्रिया लेना भी आसान नहीं है पर वह भी अलग विषय है।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क anuvaad@hotmail.com



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