Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

साहित्य

दिल्ली के IGNCA में ‘महिलाएं, काम और शांति’ पुस्तक का लोकार्पण 24 फरवरी को!

अशांति के दौर में शांति की बात: ‘महिलाएं, काम और शांति’ पुस्तक का लोकार्पण व चर्चा

नई दिल्ली। Indira Gandhi National Centre for the Arts (IGNCA) के कलानिधि विभाग द्वारा 24 फरवरी 2026 को पुस्तक ‘महिलाएं, काम और शांति’ का लोकार्पण एवं परिचर्चा आयोजित की जाएगी। यह पुस्तक प्रसिद्ध चिंतक इला भट्ट के चुनिंदा व्याख्यानों का संकलन है, जिसका हिंदी अनुवाद वरिष्ठ पत्रकार और लेखिका सुश्री नीलम गुप्ता ने किया है। पुस्तक का प्रकाशन नवजीवन साहित्य द्वारा किया गया है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता IGNCA न्यास के अध्यक्ष श्री रामबहादुर राय करेंगे। परिचर्चा में वक्ता के रूप में भारतीय पत्रकार एवं सामाजिक कार्यकर्ता सुश्री रजनी बक्शी, गुजरात विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति श्री सुदर्शन आयंगर, IGNCA के विभागाध्यक्ष (कलानिधि) एवं डीन प्रो. (डॉ.) रमेश चंद्र गौड़, प्रसिद्ध सामाजिक उद्यमी एवं सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमती रेणाना झाबवाला, तथा अनुवादक सुश्री नीलम गुप्ता शामिल होंगी।

यह आयोजन 24 फरवरी 2026 को सायं 4:00 बजे, उर्मि सम्मेलन कक्ष, चतुर्थ तल, IGNCA परिसर, जनपथ, नई दिल्ली में आयोजित होगा।

आयोजकों के अनुसार, यह पुस्तक महिलाओं के श्रम, सामाजिक न्याय और शांति के मुद्दों पर महत्वपूर्ण विमर्श प्रस्तुत करती है। कार्यक्रम में विद्वानों, शोधार्थियों और कला-संस्कृति के क्षेत्र से जुड़े लोगों की भागीदारी अपेक्षित है।

अब कुछ किताब के बारे में जानें!

आज जब युद्धों और विध्वंस से दुनिया में त्राहिमाम-त्राहिमाम मचा है और देशों की अर्थव्यवस्थाएं उलट-पुलट हो रही हैं, चारों ओर अशांति, अराजकता और असुरक्षा का वातावरण है। यह संकट केवल लोगों को ही नहीं, बल्कि देशों को भी अपनी गिरफ्त में ले रहा है। ऐसे समय में एक पुस्तक शांति, सुरक्षित और समृद्ध भविष्य की बात करती है, जो समाज, समुदाय, देश, राष्ट्र और विश्व—सभी को साथ लेकर चलने की राह सुझाती है। यह पुस्तक है ‘महिलाएं, काम और शांति’।

सेल्फ एंप्लॉयड वूमेन एसोसिएशन (सेवा) की संस्थापक इला भट्ट शुरू से ही पूंजी-आधारित उस अर्थव्यवस्था के खिलाफ रहीं, जो असंगठित क्षेत्र के रेहड़ी-पटरी पर काम करने वाले या पापड़-बड़ी बनाने वाले गरीब कामगारों को हाशिये पर डाल देती है और उन्हें मुख्यधारा की अर्थव्यवस्था से बाहर कर देती है। प्रशासन भी अक्सर इस प्रवृत्ति का साथ देता है। दस्तावेजों के अभाव में नियम-कानून उन्हें नागरिक मानने से भी इनकार कर देते हैं।

इसके विपरीत इला भट्ट ने समुदाय-आधारित अर्थव्यवस्था का विचार प्रस्तुत किया और सेवा के माध्यम से उसे व्यवहार में सिद्ध भी किया। आज 25 लाख से अधिक महिलाएं सेवा की सदस्य हैं, जो गरीबी से बाहर निकलकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर परिवारों और समुदायों का संचालन कर रही हैं। महिलाओं की भागीदारी और प्रतिनिधित्व को वे स्थिर और शांतिपूर्ण समुदायों के निर्माण की प्रक्रिया का अभिन्न अंग मानती हैं।

आज जब पश्चिमी देशों की आर्थिक नजरें दक्षिण एशिया पर टिकी हैं, तब इला भट्ट के विचार और भी प्रासंगिक हो उठते हैं। ऑस्ट्रेलिया में 2009 में दिए गए अपने एक भाषण में उन्होंने कहा था, “दक्षिण एशिया महज एक आर्थिक ब्लॉक नहीं है, यह एक प्राचीन सभ्यता है।” उनके अनुसार वैश्वीकरण, सुधार और शासन—सभी अहिंसक होने चाहिए। वे कहती हैं, “मेरी खोज इस बात के लिए है कि एक समुदाय किस तरह अपने को और अपने भागीदारों को पहचानता और गढ़ता है, ताकि वह दूसरों के साथ बराबरी की हैसियत से चल सके।”

अमेरिका, चीन और रूस की वैश्विक प्रतिस्पर्धा तथा दुनिया भर में मची उथल-पुथल के संदर्भ में उनके विचारों को आज नए सिरे से देखा जा सकता है। वे पूंजी-आधारित वैश्विक विकास को विनाशकारी मानती हैं। उनका मानना है कि इसी विकास मॉडल ने जलवायु परिवर्तन जैसी दीर्घकालिक समस्याओं को जन्म दिया। वे कहती हैं कि प्रकृति स्वयं एक अर्थव्यवस्था है। इसी सोच के आधार पर वे ‘संपोषक अर्थव्यवस्था’ (इकोनॉमी ऑफ नर्चरेंस) का प्रतिपादन करती हैं और ‘100 मील सिद्धांत’ के जरिए स्थानीयता, विविधता, स्वायत्तता, परंपरागत कौशल और अनुभवजन्य ज्ञान को सुरक्षित रखने पर जोर देती हैं।

आज जब बीज और खेती बहुराष्ट्रीय कंपनियों के नियंत्रण में हैं, तब उनका 100 मील सिद्धांत समुदायों को आत्मनिर्भर बनने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने की दिशा में प्रेरित करता है।

‘Women, Work and Peace’ शीर्षक से मूल रूप से अंग्रेजी में प्रकाशित यह पुस्तक इला भट्ट के सेवा के 50 वर्षों के दौरान देश-विदेश में दिए गए 27 चयनित भाषणों का संग्रह है। इससे उनके काम, विचार और अवधारणाओं की समझ विकसित होती है और यह स्पष्ट होता है कि इन विचारों के जरिए भविष्य की चुनौतियों का सामना कैसे किया जा सकता है। पुस्तक का संकलन मार्गी शास्त्री ने किया है। पत्रकार नीलम गुप्ता ने इसका हिंदी अनुवाद किया है। यह पुस्तक नवजीवन, अहमदाबाद द्वारा प्रकाशित है।

आना न भूलें!

पुस्तक का लोकार्पण एवं चर्चा 24 फरवरी, 2026 को शाम 4:00 बजे इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के उमंग सम्मेलन कक्ष, चौथी मंजिल, जनपथ, नई दिल्ली में आयोजित होगा। निकटतम मेट्रो स्टेशन जनपथ (गेट संख्या 1) है।

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन