यादवगेट में फंस रहे कुछ बड़े टीवी चैनल और पत्रकार, पीएमओ को रिपोर्ट भेजी गई

दलाली करते थे नोयडा-लखनऊ के कई मीडियाकर्मी

नई दिल्ली:  नोयडा के निलंबित चीफ इंजीनियर यादव सिंह ने ठेकेदारी में कमीशनखोरी और कालेधन को सफेद करने के लिए कागज़ी कंपनियों का संजाल बिछाकर उसमें मीडिया को भी शामिल कर लिया था। इस राज का पर्दाफाश कर रही है, यादव सिंह से बरामद डायरी। यादव सिंह से तीन चैनलों के नाम सीधे जुड़ रहे हैं। एक में तो उनकी पत्नी निदेशक भी है। डायरी में मिले सफेदपोशों, नौकरशाहों और पत्रकारों के नामों को लेकर सीबीआई काफी संजीदा है और उसकी रिपोर्ट सीधे पीएमओ को भेजी जा रही है। इस सिलसिले में यादव सिंह और उसके परिवार से कई परिवार से कई बार पूछताछ हो चुकी है। समाज को सच का आईना दिखाने का दम भरने वाले ये पत्रकार अपने लिए मकान-दुकान लेने के अलावा ठेका दिलाने को भी काम करते थे और उसके लिए मोटी करम वसूलते थे।

पत्रकारिता की आड़ में दलाली और भवन भूखंड लेने की बात कोई नई नहीं है। सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री रहते हुए नकदी व भवन-भूखंड देकर पत्रकारों को उपकृत करते थे। मुलायम की दरियादिली तब सुर्खियां बनी थी। सांसद रिश्वतकांड से लेकर टू जी तक नामचीन पत्रकारों की कारस्तानी किसी से छिपी नहीं है। मौजूदा दौर में शायद ही ऐसा कोई घपला घोटाला हो जिसमें पत्रकारों की प्रत्यक्ष भूमिका निकलकर न आती हो। यादवगेट में भी कई बड़े चैनलों और नोयडा व लखनऊ के पत्रकारों के नाम आ रहे हैं। नबंर वन चैनल का दावा करने वाले चैनल से जुड़ी कंपनी पर भूखंड की कीमत कम दिखाकर राजस्व चोरी करने का आरोप है। दूसरे एक बड़े चैनल के पत्रकार चर्चा में है। इस चैनल पर ब्लैकमेलिंग को लेकर पहले से मामला चल रहा है। इसके एक स्टेट हेड पर अपने रसूख का इस्तेमाल कर यादव सिंह से लाभ लेने की बात सामने आई है।

इनका नाम बाक़ायदा यादव सिंह की डायरी में दर्ज है। इनकी लखनऊ में अच्छी धमक है और वहां से राजनेताओं और नौकरशाहों से फोन कराकर प्राधिकरण के अधिकारियों से लाभ लेते रहते हैं। इससे संबंधित दस्तावेज सन स्टार के पास मौजूद हैं और दस्तावेज कभी झूठ नहीं बोलते। इसका खुलासा आगे के अंकों में करेंगे। इनके अलावा यादव की डायरी में नोयडा के ऐसे कई पत्रकारों के नाम हैं, जिनकी पत्रकारिता प्राधिकरण के इर्द-गिर्द चलती है। इसमें एक परिवार से दो लोग भी हैं। इन लोगों ने प्राधिकरण से भवन भूखंड के अलावा शेड लिया और प्राधिकरण की बदौलत करोड़पति बन गये। कुछ पत्रकार तो ऐसे हैं जो ग्रुप बनाकर दबाव डालते थे। प्राधिकरण से ठेका दिलवाते थे और बाद में कमीशन में मिले पैसे को बांट लेते थे। कुछ की नजदीकी पूर्व मुख्यमंत्री के भाई से थी, जिनकी एक ज़माने में तूती बोलती थी। ये जनाब आजकल गुमनामी में आनंद ले रहे हैं। जांच एजेंसियां यादव सिंह और उसकी डायरी से मिली जानकारी को अपने तरीके से सत्यापित करने में जुटी हैं, इस वजह से कई पत्रकारों के चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई हैं।

राष्ट्रीय हिंदी दैनिक सन स्टार में प्रकाशित विद्याशंकर तिवारी की रिपोर्ट.

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