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साहित्य

पाब्लो नेरुदा से कृष्ण कल्पित तक: यौन शोषण के आरोपी लेखकों और उनकी रचनाओं को अलग करके देखना संभव नहीं है!

सुदीप्ति-

यौन शोषण, रचना और रचनाकार का द्वंद्व और पीड़ित की पहचान पर मेरे विचार:

लोग कहते हैं कोई अपराधी (खास तौर पर यौन-शोषण का आरोपी) अगर रचनाकार है तो उसकी रचना और उसके मनुष्य को अलग करके देखो लेकिन मुझसे यह संभव नहीं हो पाता है।

शायद यह अलग तरह का कौशल होता है कि आप रचना को और मनुष्य को बाँटकर देख पाते हैं और रचना की खूबसूरती को सराहते हैं जबकि रचनाकार उतना ही बदनीयत, घृणित और आपराधिक प्रवृत्ति का होता है।

कुछ साल पहले मदन गोपाल सिंह जी से मेरी लाइव बातचीत हो रही थी। उस बातचीत के दौरान मुझे पता चला कि पाब्लो नेरुदा ने स्वयं यह स्वीकार किया है कि उन्होंने अपने घर में काम करने वाले स्त्री का रेप किया। मदन जी उस वक़्त नागार्जुन के संदर्भ में बता रहे थे क्योंकि उन्हीं दिनों गुनगुन थानवी ने अपने बचपन में हुए यौन-शोषण के बारे बताया था। मदन जी ने साफ कहा कि इसके बाद से इस बात जानने/पढ़ने के बाद उन्हें अब नेरुदा की कविताई में कोई दिलचस्पी नहीं होती और जिस तरह की बातें नागार्जुन पर उठी हैं उसके बाद नागार्जुन से भी उसी तरह के भी वितृष्णा हो गई है।

उसने ऐसा साफ साफ सुनना अपने विचारों की धुंध हटाने वाला भी रहा। ऐसे बहुत सारे मामलों में अमूमन लोग विक्टिम ब्लेमिंग से लेकर उन पर गहरा अविश्वास जताते रहते हैं। वास्तव में, एक लंबे ट्रॉमा से जूझकर इन सारी बातों को स्वीकार करने के लिए भी और समाज की नजर में आगे हमेशा के लिए इसी तरह से पहचाने जाने/ चिन्हित किए जाने से डरने के बावजूद अगर कोई आगे आकर अपने शोषण के बारे में बोलता है तो सबसे पहले तो उसका सच स्वीकार किया जाना बहुत जरूरी होता है। सच स्वीकार करने के क्रम में यह बेहद महत्वपूर्ण कदम है कि उसके शोषक से आपकी दूरी दिखे, आप झूठ मूठ की संवेदना दिखाते हुए रचनाओं की बात करते रहें तो फिर क्या साथ और स्वीकार?

हाल में शिवांगी के साथ नई धारा रेजिडेंसी में जो घटना घटी उसके बारे में शुरुआती बातों में यही सामने आया कि वह अपने साथ हुई इस घटना के बारे में सार्वजनिक रूप से कुछ कहना नहीं चाहती हैं, अपनी पहचान नहीं उजागर करना चाहती हैं। जो लोग भी पहले इसके बारे में सांकेतिक रूप से लिख रहे थे वह यही कह रहे थे कि पीड़िता इस बारे में सार्वजनिक बात नहीं करना चाहती।

मैं इस बात को पूरी तरह से समझते हुए उसके सामने नहीं आने को स्वीकार कर रही थी क्योंकि मुझे पता है आज के बाद कई सालों तक जब भी शिवांगी का नाम आएगा उसकी कविताओं, उसकी रचना, उसकी महत्वाकांक्षा, उसके काम इन सब पर बात होने से पहले एक पीड़िता के रूप में उसकी पहचान पर बात होगी।

बहुत सारी स्त्रियाँ अपनी इस सार्वजनिक पहचान को नहीं बनने देना चाहती हैं और वह सही भी करती हैं।

अव्वल तो हमारा समाज इतना भी परिपक्व नहीं हुआ है कि एक स्त्री के साथ में बैठकर खाना खाने, शराब पीने और देर रात तक बातचीत या चर्चा में शामिल होने को स्वच्छ तरीके से स्वीकार कर सके (अक्सर ऐसी बातों के आधार पर पीड़ित को ही दोषी ठहरा दिया जाता है) तो उसमें पीड़ित के साथ समानुभूति की प्रवृत्ति कहाँ से होगी?

ऐसी स्थिति को जान समझकर भी जब कोई स्त्री पीड़ित के रूप में अपनी पहचान की स्वीकृति के लिए आती है तो बहुत साहस के साथ आती है। सालों के बाद स्त्री ने सात साल की बच्ची वाले अपने अनुभव जब साझा किया तो सोचिए कितनी हिम्मत की होगी। आगे कितने सात सालों उसी छाप के साथ जीना पड़ेगा जिससे लड़ते हुए वह अपने अंधेरों से टकरा रही है। इसीलिए इन सभी बिंदुओं के बाद भी अगर कोई पीड़ित स्त्री आगे बढ़कर अपनी बात रखती है तो सबसे पहले उसे सुना जाना चाहिए। उसके सच को स्वीकार किया जाना चाहिए।

आप रचनाकार और रचना को अलग मानकर पढ़ने की बात मत करें क्योंकि ऐसे अपराधिक रचनाकार की जैसी जीवंत रचनाएं पीड़ितों के दिलों दिमाग पर करते हैं उसे मनुष्यता जख्मी होती है। इसको समझने के लिए किसी रचना को समझने से अधिक संवेदनशीलता की जरूरत है।


ओम थानवी-

मैं इस बात से सहमत नहीं कि रचना को रचनाकार के अपराध या आरोपों आदि की छाया में देखना चाहिए। इतिहास और अनुभव बताता है कि बुरे लोगों ने — अपराधियों-आरोपितों ने — अच्छी कृतियाँ दी हैं। (इस बात को कृपया कृष्ण कल्पित के संदर्भ में नहीं देखें; 45 साल संपादक के नाते मैंने जितना साहित्य छापा या पढ़ा है, उस समझ से कह सकता हूँ कि कल्पित का लिखा इस चर्चा के क़ाबिल तक नहीं।)

साहित्य के मूल्यांकन की अपनी कसौटी होती है। रचनाकार के जीवन के बारे में लोग वैसे भी कब और कितना जानते हैं? जो रचनाकार इर्द-गिर्द हों या अपने दौर के हों, उनके बारे में हम थोड़ा-बहुत जान लेते हैं। लेकिन जो साहित्य हमें विरासत में मिला या आने वाली पीढ़ियों को मिलेगा, सब के रचने वालों का व्यक्तित्व या चरित्र कौन जान सका या जान पाएगा? कबीर या शेक्सपियर को हम उनके लिखे से जानते-मानते हैं, या उनके चालचलन से?

रचना को विचार के आधार पर भी माना या दुत्कारा गया है। वह भी संगत नहीं जान पड़ता। हमारे यहाँ अज्ञेय या निर्मल वर्मा ऐसी उपेक्षा के बड़े उदाहरण हैं। लेखक संगठन अक्सर यही राजनीति करते हैं। बाहर शायद इतना नहीं होता। पाब्लो नेरुदा जैसे वामपंथी विचार के लेखक भी बड़े हुए, एज़रा पाउंड जैसे फ़ासिस्ट विचार रखने वाले भी। जेल काट आए (याद करें ज्याँ जेने) लेखक भी महान हो गए। रूस में जिन्हें जीते-जी प्रताड़ना या क़ैद मिली, वे भी महान साहित्यकार निकले।

हमारे यहाँ तो लेखक अब जाति के आधार पर मान्य-अमान्य होने लगे।

अच्छा या बड़ा लेखक जाति, विचार, चरित्र, आचरण के बावजूद अच्छा या बड़ा होता है। कम-से-कम इस तरह के आधारों पर उसे त्याज्य या उपेक्षणीय नहीं माना जा सकता।

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