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क्या भारत में सबसे ज्यादा ‘रोजगार’ पैदा करने का माध्यम बन गया है YouTube?

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नई दिल्ली। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर वरिष्ठ पत्रकार पंकज पचौरी के एक पोस्ट ने नई बहस छेड़ दी है। पोस्ट में दावा किया गया है कि भारत में निजी क्षेत्र में सबसे ज्यादा रोजगार अब YouTube दे रहा है—टाटा कंसल्टेंसी सर्विसेज, रिलायंस और इंफोसिस जैसी दिग्गज कंपनियों से भी आगे।

पोस्ट के साथ साझा ग्राफिक्स के मुताबिक, YouTube के “क्रिएटिव इकोसिस्टम” ने भारत में 9.3 लाख (930K) फुल-टाइम इक्विवेलेंट (FTE) नौकरियों को सपोर्ट किया है। यह आंकड़ा ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स के एक अध्ययन के हवाले से बताया गया है।

पारंपरिक कंपनियां बनाम डिजिटल इकोसिस्टम

ग्राफिक में देश की बड़ी कंपनियों के कर्मचारी संख्या का भी उल्लेख है:

  • TCS – लगभग 6 लाख से अधिक कर्मचारी
  • Reliance Industries – करीब 3.9 लाख
  • Infosys – लगभग 3.1 लाख

दावे के अनुसार, सीधे कर्मचारियों की संख्या में भले आईटी कंपनियां आगे दिखें, लेकिन YouTube का “इकोसिस्टम मॉडल” — जिसमें कंटेंट क्रिएटर, वीडियो एडिटर, कैमरामैन, डिजिटल मार्केटिंग प्रोफेशनल, म्यूजिक प्रोड्यूसर और अन्य सहायक सेवाएं शामिल हैं — कुल मिलाकर 9 लाख से अधिक रोजगार को सपोर्ट करता है।

क्या है ‘इकोसिस्टम जॉब’ का मतलब?

यहां एक महत्वपूर्ण फर्क है। TCS या Infosys अपने कर्मचारियों को सीधे नियुक्त करती हैं। YouTube स्वयं इतनी बड़ी संख्या में लोगों को सीधे नौकरी नहीं देता, बल्कि अपने प्लेटफॉर्म के जरिए कमाई करने वाले क्रिएटर्स और उनसे जुड़े रोजगार को “सपोर्टेड जॉब्स” के रूप में गिना जाता है।

यानी यह प्रत्यक्ष रोजगार (direct employment) नहीं, बल्कि प्लेटफॉर्म आधारित अप्रत्यक्ष और आंशिक रोजगार (indirect / FTE equivalent) का आकलन है।

भारतीय रेल का संदर्भ

पोस्ट में कहा गया है कि कुल रोजगार के मामले में केवल Indian Railways ही YouTube/Alphabet से आगे है। भारतीय रेल दुनिया के सबसे बड़े नियोक्ताओं में से एक है, जहां 12 लाख से अधिक कर्मचारी कार्यरत हैं।

सियासी और वैचारिक बहस

इस दावे को कुछ लोग “डिजिटल इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” की सफलता के तौर पर पेश कर रहे हैं। वहीं आलोचकों का तर्क है कि प्लेटफॉर्म आधारित रोजगार अस्थिर (gig-based) और एल्गोरिदम पर निर्भर होता है।

एक धड़ा इसे “नियो-लिबरल मॉडल” की विडंबना बता रहा है—जहां स्थायी औद्योगिक नौकरियों की बजाय लोग वीडियो कंटेंट, रील्स और डिजिटल क्रिएशन पर निर्भर हो रहे हैं।


कमाल है!
भारत में प्राइवेट सेक्टर में सबसे ज़्यादा नौकरी यूट्यूब दे रहा है. केवल भारतीय रेल ही यूट्यूब, गूगल और अनेक प्रोडक्ट्स को पीछे छोड़ रही है.
नियो लिबरल कबाड़(ल) वीडियो ही बनाता रह गया है -प्रकाश के रे

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