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दिल्ली

ज़ी राजस्थान के पूर्व रीजनल हेड आशीष दवे के खिलाफ दर्ज FIR रद्द, पुलिस को मिली सुप्रीम फटकार

“क्या यह जेम्स बॉन्ड है—पहले गोली, बाद में सोचना?”: ज़ी मीडिया शिकायत पर जल्दबाज़ी में FIR दर्ज करने पर सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान पुलिस को फटकार

खंडपीठ ने FIR दर्ज करने के तरीके पर “हैरानी” जताते हुए कहा कि आरोप केवल एक “कहानी” जैसे हैं। जस्टिस मेहता ने कहा, “हम इस बात से स्तब्ध हैं कि FIR कैसे दर्ज की गई। जांच अधिकारी को पहले जांच करनी चाहिए थी, आरोपों की पुष्टि करनी चाहिए थी, उसके बाद FIR दर्ज होती। ललिता कुमारी मामला सब पर लागू होता है। FIR में जबरन वसूली या पद के दुरुपयोग का कोई ठोस आरोप ही नहीं हैयह सब एक काल्पनिक कहानी जैसा है।

जस्टिस विक्रम नाथ ने भी कहा कि आरोप अत्यंत अस्पष्ट और सामान्य प्रकृति के हैं।

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने ज़ी राजस्थान के पूर्व रीजनल हेड आशीष दवे के खिलाफ दर्ज ब्लैकमेलिंग और रंगदारी के मामले में एफआईआर को रद्द कर दिया है। अदालत ने इस मामले में राजस्थान पुलिस की कार्रवाई पर कड़ी नाराज़गी जताई और एफआईआर दर्ज करने के तरीके पर सवाल उठाए।

न्यायमूर्ति विक्रम नाथ और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि एफआईआर दर्ज करने से पहले जांच अधिकारी को आरोपों की प्रारंभिक जांच करनी चाहिए थी। अदालत ने टिप्पणी की कि एफआईआर में ठोस आरोपों का अभाव था और यह स्पष्ट नहीं था कि किस विशेष कृत्य के आधार पर तत्काल मामला दर्ज किया गया।

पीठ ने कहा कि वह इस बात से “आश्चर्यचकित” है कि किस प्रकार बिना स्पष्ट आरोपों के एफआईआर दर्ज कर ली गई। अदालत ने यह भी पूछा कि यदि कोई सामान्य नागरिक ऐसी शिकायत लेकर आता, तो क्या पुलिस उसी तरह तुरंत मामला दर्ज करती। न्यायालय ने संकेत दिया कि शिकायतकर्ता एक प्रभावशाली मीडिया संस्था होने के कारण पुलिस ने जल्दबाज़ी दिखाई।

यह मामला तब सामने आया था जब ज़ी मीडिया प्रबंधन ने जयपुर के अशोक नगर थाने में अपने तत्कालीन रीजनल हेड आशीष दवे और अन्य के खिलाफ धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और कदाचार के आरोपों में शिकायत दर्ज कराई थी। चैनल को कथित तौर पर कुछ शिकायतें मिली थीं, जिसके बाद आंतरिक जांच की गई। जांच के दौरान एक कर्मचारी पर सीसीटीवी में कथित रूप से लॉकर से ₹5 लाख लेकर भागने का आरोप सामने आया था।

इन घटनाक्रमों के बाद चैनल प्रबंधन ने दवे और अन्य से इस्तीफा मांगा था। दवे ने अग्रिम जमानत के लिए जिला एवं सत्र न्यायालय में आवेदन किया था, जिसे खारिज कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने राजस्थान हाई कोर्ट का रुख किया था। हाई कोर्ट ने पुलिस को छह सप्ताह में जांच पूरी करने का निर्देश दिया था, लेकिन एफआईआर रद्द करने से इनकार कर दिया था।

अंततः दवे ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी, जहां शीर्ष अदालत ने एफआईआर को निरस्त करते हुए कहा कि बिना ठोस आधार के आपराधिक प्रक्रिया शुरू नहीं की जा सकती। अदालत की टिप्पणियों को पुलिस कार्यप्रणाली और शिकायतों की प्रारंभिक जांच के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

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