
राजशेखर त्रिपाठी-
जेलेंस्की-ट्रंप विवाद पर कुछ लोगों का न स्टैंड समझ में आ रहा है न उनकी भाषा। पूर्व स्टैंड अप कॉमेडियन को वो जोकर बता रहे हैं। गनीमत है कि डिक्टेटर जैसी फिल्म बनाने वाला चार्ली चैप्लिन राजनीति में नहीं आया…लेकिन शीत युद्ध में ‘स्टार-वॉर’ तक जाकर लौट आए रोनाल्ड रेगन क्या थे, हॉलीवुड एक्टर ही तो। फिर जेलेंस्की ही जोकर कैसे रह गया!
जेलेंस्की ने क्या जोकरई की मेरी समझ से परे है! ड्रामा तो जेलेंस्की की अमेरिका यात्रा से पहले ही शुरू हो गया था। क्या जेलेंस्की वो नहीं देख-सुन रहा था? क्या उसे अंदाज़ा नहीं था कि ‘सनकी ट्रंपवा’ की लीडर शिप में अमेरिका का स्टांस बदल गया है? ट्रंप ने जिस अंदाज़ में जेलेंस्की की अगवानी की क्या एक राष्ट्राध्यक्ष का स्वागत ऐसे ही होता है? (देख लीजिए ये ड्रेस्ड अप हैं! कह कर आप जेलेंस्की का स्वागत कर रहे थे या अपमान ? आप ने जंग लड़ने के लिए पैसे दिए और कह रहे हैं कि उससे हजार डॉलर का सूट नहीं खरीद पाए!) ये युद्ध में मदद थी या इंडिया में PWD का ठेका।

होस्टिलिटी तो पहले कदम से ही साफ दिख रही थी! राष्ट्राध्यक्षों की बात-चीत (टेबल टॉक) बंद कमरे में होती है। क्या इस ‘बेसिक डिप्लोमेटिक नॉर्म’ का पालन हुआ? मुझे तो ये दिख रहा था कि ‘ट्रंपवा और वेंसवा’ मेहमान को घर बुला कर ‘बुली’ कर रहे हैं। किसी देश के नेता को आप सार्वजनिक तौर पर स्टुपिड कैसे कह सकते हैं ? कमज़ोर से कमज़ोर मुल्क को ऐसे नहीं कहा जा सकता कि तुम्हारी लड़ने की औकात ही नहीं! जंग हौसले से और स्वाभिमान के लिए लड़ी जाती है। ट्रंप ये हिंदी चैनल टाइप क्लेश किसे दिखा रहा था?
इस पूरे ड्रामे को देख कर मेरे दिमाग़ में ये पिक्चर तो साफ हो गयी कि ट्रंप के पीछे सचमुच ‘रास’ पुटिन है। (पहली बार ही आरोप लगा था ट्रंप के पीछे पुतिन है) ट्रंप अपने इस शातिर स्पॉन्सर को दिखाने के लिए ही टीवी पर लाइव गुंडई कर रहा था। जेलेंस्की अगर पलट कर जवाब न देता तो अपने देशवासियों को क्या मुंह दिखाता ? आखिर नैशनल प्राइड, इमोशन और सेंटीमेंट भी कोई चीज़ है कि नहीं ? …आज तमाम यूक्रेन ज्यादा एकजुट होकर मजबूती से उसके पीछे खड़ा है। बल्कि लगभग आधे से ज्यादा यूरोप भी! वो मान रहे हैं कि ट्रंप पीड़ित के साथ नहीं जबरा के साथ मिल गया है।
जेलेंस्की तो फिर भी टी शर्ट पहन कर ओवल पहुंचा था। वो मिशन पर है, उसने साफ कह दिया है। सेना लड़ रही है। वो सिपाहियों की कैजुअल ड्रेस फौजी बैज (Trident – त्रिशूल) के साथ पहन रहा है। अमेरिकी गोदी मीडिया से उसने दो टूक कह दिया, जंग खत्म होगी तो सूट भी पहनूंगा।
जरा सोचिए! क्या गरीब शोषित भारतीयों का प्रतिनिधि गांधी भी जोकर था जो धोती पहन कर लंदन चला गया? बेवड़े बुड्ढे चर्चिल ने गांधी को नंगा फकीर कहा! क्या गांधी इससे अपमानित हुए या भारतीय शर्म से गड़ गए? गांधी इस अपमान से दुनिया के सामने और तप कर निखरे! सारी दुनिया में गांधी की मूर्ति उसी तन पर ‘लिपटी-दुपटी’ धोती में ही पूजी जाती है। आइंस्टीन इसी हाड़ मांस के पुतले के आगे नतमस्तक था। खैर जेलेंस्की गांधी भी नहीं है।
जिन्हें लगता है कि युद्ध में कूद कर जेलेंस्की ने भूल की वो यूक्रेन का बैकग्राउंड नहीं जानते। यूक्रेन सामरिक तौर पर सोवियत रूस का सबसे अहम पार्ट था। ‘रास’ पुटिन उसे दोबारा हासिल करना चाहता है। मत भूलिए कि जैसे ट्रंप मेक अमेरिका ग्रेट अगेन का सपना दिखा रहा है, ‘रास’ पुटिन भी ‘सोवियत डेज़’ की ग्लोरी के सपने दिखाता है। मगर उसे ‘ग्लोरी’ और ‘ग्रैंडनेस’ चाहिए साम्यवाद नहीं। कमला हैरिस ने अपनी डिबेट में कहा था ट्रंप जिस पुटिन को दोस्त समझ रहे हैं वो इन्हें एक लंच में चबा जाएगा।
इस जंग से पहले भी पुटिन यूक्रेन का एक हिस्सा दबा चुका था। जेलेंस्की को पता था वो आगे भी ये षड़यंत्र जारी रखेगा इसीलिए वो NATO का पार्ट बनना चाहता था। अब NATO ही नष्ट होने के कगार पर पहुंच जाएगा और उसका लीडर अमेरिका ही रूस से हाथ मिला लेगा ये किसने सोचा था? शुरू में तो हम भी यूक्रेन से सहानुभूति ही रख रहे थे। पॉ-पॉ वार रुकवा चुके थे। अब भारत के एक वर्ग को क्या हो गया है पता नहीं! इसमें हमेशा ताकतवर के साथ दिखने वाले भक्त भी हैं और ‘SO CALLED’ लिबरल जियो पॉलिटिक्स एक्सपर्ट भी।
जो लोग यहां निक्सन – इंदिरा तकरार का हवाला दे रहे हैं वो इंदिरा जी की करीबी दोस्त पुपुल जयकर की किताब पढ़ लें। निक्सन ठर्की था और इंदिरा जी के साथ डांस करने के लिए तय समय से ज्यादा वध्यक्त तक दावत में रुका रहा। इंदिरा ने भाव नहीं दिया तो अपनी क्लोज सर्किल में उन्हें ‘बिच’ तक कह गया। उसने बांग्लादेश मुक्ति संग्राम से पहले इंदिरा जी को बुलाकर पौन घंटे इंतज़ार कराया। इसका बदला इंदिरा जी ने भी इंतज़ार करवा के ही लिया। मगर ये सब सीधे टीवी पर नहीं हुआ बल्कि बाद में संस्मरणों और अखबारों में सामने आया। क्योंकि डिप्लोमेसी ‘डिमॉन्स्ट्रेशन’ की चीज़ नहीं महसूस कराने की चीज़ होती है।
जंग आप चाहे जितन लड़ लें, बातचीत के लिए टेबल पर आना ही होगा। जेलेंस्की इसीलिए अमेरिका गया, मगर ट्रंपवा बिचौलिया बन के ‘रास’ पुटिन का एंजेडा ही आगे बढ़ा रहा है।दुनिया दो ध्रुवीय है तो इसमें शक्ति संतुलन जैसे फायदे भी हैं। अगर रूस – अमेरिका एक तरफ हो गए और योरप के दमदार मुल्क एक तरफ तो सोचिए क्या होगा? मस्क की गार्जियनता में अब ट्रंप NATO छोड़ने और UNO से निकलने की बात कर रहा है। अब आप ही सोचिए विश्वयुद्ध का जुआ कौन खेल रहा है ? सर्वशक्तिमान सनकी ट्रंप या गरीब जेलेंस्की ?
और अंत में :-
‘जेलेंस्की – ट्रंप विवाद’ की तुलना मोदी की मुलाकात से करना फिजूल है। मोदी अंततः गुजराती हैं। वो प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते-मगर ट्रंप के साथ बैठना ही पड़ा,तो बैठे…और यही बहुत था। कम बोले और कठिन सवाल डग कर गए। ये उनकी ‘इंस्टैंट सेंस’ थी। वर्ना उनकी वापसी के बाद वो जो-जो बोला उनके सामने भी बोल सकता था। चाहे USAID का मसला हो या EVM का। विदेश मंत्री जयशंकर को कहना ही पड़ा कि अमेरिकी प्रशासन से जो बाते आ रही हैं वो परेशान करने वाली हैं।
विजय सिंह ठकुराय-
दो दिन पहले व्हाइट हाउस में हुई तनातनी आप सबने देखी। उससे पहले दो हफ़्तों के दरम्यान कुछ घटनाएं ऐसी हुईं, जो आपको जाननी चाहिए। इस दरम्यान जेडी वेन्स और स्काट वेसेन्ट ने जेलेन्स्की से मुलाकात कर ‘मिनरल डील” के दो मसौदे दिए थे। इन मसौदों की कुछ शर्ते यह थीं कि यूक्रेन को दी गयी 120 अरब डॉलर की मदद के बदले यूक्रेन 500 अरब डॉलर अदा करे। और भविष्य में मदद के रूप में खर्च होने वाले हर डॉलर के बदले दो डॉलर का रिटर्न।
इस समझौते की भरपाई में यूक्रेन की दस पीढियां खप जाती। और मदद के बदले भविष्य में ऐसी लूट की मांग होगी, यह भी पूर्वकाल में अमेरिका ने मदद करते समय बताया नहीं था। किसी भी स्वाभिमानी व्यक्ति को यह पसंद नहीं आता। जेलेन्स्की नामक इस पप्पू को भी पसंद नहीं आया। इसने डील से साफ मना कर दिया।
खैर, इस पप्पू के झुकने से इंकार करने पर ट्रंप प्रशासन ने नया दांव खेला। इस बार कहा कि – उधार की भरपाई छोड़ देते हैं। खनिजों के बेचने से जो फायदा होगा, उसे 50-50 बांट लेंगे।
इस तरह जेलेन्स्की को मूर्ख बना कर डील साइन करने के लिए अमेरिका बुलाया गया।
पर इस बार मसौदे में “संप्रभुता की रक्षा और सुरक्षा की गारंटी” सिरे से गायब। जेलेन्स्की ने पूछा कि हमारी सुरक्षा की गारंटी कहाँ है? तो उसे बताया गया कि – इसके बारे में बाद की बैठकों में तय करेंगे। पहले डील साइन करिये।
बाद में इसी प्रेस कांफ्रेंस में किसी ने सुरक्षा की गारंटी का सवाल पूछा तो ट्रंप महोदय कहते हैं कि – “जिंदा होने की क्या गारंटी है, हो सकता है कि अगले क्षण तुम्हारे साथ कुछ हो जाये। मेरी गारंटी बस यह है कि – मैंने कहा तो मान लो। यूक्रेन को सुरक्षा की गारंटी चाहिए तो यूरोप से ले, हमसे नहीं”
गोया, यही महाशय अगले 100 साल अमेरिका का प्रेजिडेंट बने रहने की पालिसी करवा के धरती पर आए हैं। इनके हिसाब से कोई देश अपनी पूरी संपदा इनके हवाले कर दे। लूटना जम के चाहते हैं पर लिखित में उसकी सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकते। ताकि कल को लूट कर बोरिया-बिस्तर समेट कर भागने में आसानी हो।
लगातार अपमान के घूंट पी कर भी चुपचाप बैठने के बाद यही मोमेंट था, जब इस पप्पू ने चिढ़कर अमेरिका का सामंतवादी चेहरा दुनिया के सामने उजागर करते हुए पूछ ही लिया कि – आपकी डिप्लोमेसी और गारंटी का क्या अचार डालें? इसी यूक्रेन ने तीस साल पहले अपने नाभिकीय हथियार सरेंडर कर दिए थे और बदले में रूस और इसी अमेरिका ने उनकी सुरक्षा की गारंटी ली थी। इस गारंटी का क्या हुआ? बाद में रूस ने कई बार यूक्रेन से समझौते किये, तोड़े और लगातार हमले किये। 2014 में रूस ने समझौता तोड़ा और क्रीमिया को कब्जे में लिया। आज भी यूक्रेन ने रूस पर हमला नहीं किया है, बल्कि यूक्रेन पर यह युद्ध थोपा गया है। आप लोगों की गारंटी और डिप्लोमेसी के भरोसे शांति कब तक चलेगी? इस डिप्लोमेसी पर क्या भरोसा करें?
सोचता हूँ कि जेलेन्स्की जरा भी समझदार होता तो अमेरिका जैसे सुपर पॉवर को नाराज नहीं करता और न ही इस डील में बाधा बनता। संसाधनों पर कब्जे के लिए उसे रातोंरात गायब करवा देना अमेरिका के लिए कितना आसान है, यह किसी से छुपा नहीं है।
यह पप्पू वाकई समझदार होता तो यूक्रेन पर हमला होते ही पुतिन के पांव पकड़ लेता, और पुतिन की मांग के अनुसार देश का सैन्य निशस्त्रीकरण करता, ताउम्र रूस की कठपुतली बन कर अपने जीवन में ऐश करता। कुछ नहीं तो अमेरिका की डील स्वीकार कर के अंटी में दो-चार अरब डॉलर दबा कर कहीं किसी गुमनाम देश भाग जाता और जीवन भर मौज मारता।
पर ये ससुरा ठहरा पप्पू, जो तीन साल से धमाकों से थर्राती धरती पर जान को जोखिम में डाल कर घूम रहा है। डील से पहले बस एक ही माला जपता है कि – मेरे देश की सुरक्षा की लिखित गारंटी दो, उसके अगले दिन चाहें मेरा इस्तीफा ले लो। पर सिर्फ मेरे देश को खनिजों की लूट का खुला अड्डा बनने की न मैं इजाजत दूंगा और न अंतिम सांस तक समर्पण करूँगा।
सच में, जेलेन्स्की थोड़ा भी समझदार होता तो अपना जीवन खतरे में नहीं डालता और देश अमेरिकी अथवा रूसी उद्योगपतियों के हवाले कर चैन की बंसी बजाता और आलीशान जिंदगी जीता।
पर क्या करें, इसे धेला भर भी अकल नहीं।
पप्पू जो ठहरा !!


