10 दिसंबर 2025 को पत्रकारिता के इतिहास में एक भयावह पड़ाव दर्ज हुआ। कमेटी टू प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स (CPJ) के मुताबिक, 2024 में दुनिया भर में 126 पत्रकार और मीडिया कर्मी मारे गए, जो 1992 के बाद सबसे अधिक आंकड़ा था। हैरानी की बात यह है कि 2025 में साल खत्म होने से तीन हफ्ते पहले ही यह संख्या बराबर हो गई।
इस हिंसा की सबसे बड़ी कीमत फिलिस्तीनी पत्रकारों ने चुकाई है। CPJ के अनुसार, “2023 में इज़राइल-ग़ाज़ा युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक इज़राइल लगभग 250 पत्रकारों को मार चुका है।”
सवाल दर्शकों के लिए
ऐसे दौर में, जब अंतरराष्ट्रीय राजनीति युद्ध, जलवायु संकट और अनिश्चित राजनीतिक फैसलों से घिरी है, दर्शक दुनिया को आखिर समझें कैसे?
इतिहास बताता है कि सूचना और स्वतंत्रता का गहरा रिश्ता रहा है। 1787 में अमेरिका के संस्थापक थॉमस जेफ़रसन ने लिखा था— “अगर मुझे तय करना हो कि सरकार बिना अख़बारों के हो या अख़बार बिना सरकार के, तो मैं बिना झिझक दूसरा विकल्प चुनूंगा।”
आज इंसान के इतिहास में सूचना तक पहुंच सबसे अधिक है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सूचना अधिक भरोसेमंद भी हो गई है। सरकारें और टेक कंपनियां संदेश पर नियंत्रण की कोशिश में अक्सर सफल हो जाती हैं।
युद्ध क्षेत्रों में मीडिया पर ताले
इज़राइल ने अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों का ग़ाज़ा में प्रवेश प्रतिबंधित कर रखा है। वहीं, फिलिस्तीनी पत्रकार जान जोखिम में डालकर रिपोर्टिंग कर रहे हैं। रूस में यूक्रेन युद्ध को “विशेष सैन्य अभियान” कहकर रिपोर्टिंग पर सख्त पाबंदियां लगाई गई हैं।
1990 का दशक: आज से बेहतर
जब CPJ ने पत्रकारों की मौत का रिकॉर्ड रखना शुरू किया था, तब हालात अलग थे। बर्लिन की दीवार गिरने और शीत युद्ध के अंत के बाद पूर्व सोवियत ब्लॉक में मीडिया को अभूतपूर्व आज़ादी मिली थी। हालांकि मीडिया पर राजनीतिक और कारोबारी प्रभाव तब भी थे, लेकिन एकतरफा पार्टी लाइन की जगह विविधता मौजूद थी।
मीडिया विशेषज्ञ और पूर्व विदेशी संवाददाता पीटर ग्रेस्टे के मुताबिक, 9/11 के बाद राज्य सत्ता ने “आतंकवाद” और “राष्ट्रीय सुरक्षा” की परिभाषाएं फैलाकर सूचना और विचारों पर नियंत्रण बढ़ा दिया।
ग्रेस्टे खुद इसकी कीमत चुका चुके हैं। 2013 में मिस्र में उन्हें आतंकवाद के आरोप में 400 दिन जेल में रखा गया, सिर्फ इसलिए कि उन्होंने रिपोर्टिंग के दौरान मुस्लिम ब्रदरहुड से बात की थी। उनका सवाल आज भी गूंजता है— “अगर आप सभी पक्षों से बात नहीं करेंगे, तो निष्पक्ष रिपोर्टिंग कैसे होगी?”
आज की नई सेंसरशिप
सरकारें हमेशा मीडिया को नियंत्रित करना चाहती रही हैं, लेकिन अब अमेरिका भी खुलकर उसी कतार में खड़ा दिखता है। पेंटागन तक रिपोर्टरों की पहुंच सीमित करना इसका उदाहरण है।
जेफ़रसन ने यह भी कहा था—“हर व्यक्ति तक अख़बार पहुंचे और वह उन्हें पढ़ने में सक्षम हो।” आज यही सबसे बड़ी चुनौती है। मीडिया तो बहुत है, लेकिन मीडिया की आज़ादी बहुत कम।
टेक कंपनियों का दौर
पहले खबरों का वितरण मीडिया संस्थानों के हाथ में था, अब टेक कंपनियां तय करती हैं कि आप क्या देखेंगे। जहां औपचारिक सेंसरशिप नहीं भी है, वहां खबरें एल्गोरिदम में दबा दी जाती हैं, और सोशल मीडिया पर बिल्ली के वीडियो सवालों से ज्यादा दिखते हैं।
शक्तिशाली नेता कानूनी कार्रवाई या उसकी धमकी से भी मीडिया को चुप कराने की कोशिश करते हैं। कई जगह पत्रकारों पर शारीरिक हिंसा, यहां तक कि मौत तक थोपी जा रही है।
पत्रकारिता की असली ताकत
1990 और 2000 के दशक में सरकारें पत्रकारों को सीमित जरूर करती थीं, लेकिन आज की तरह पूरी तरह प्रतिबंधित करना आम नहीं था। ग़ाज़ा और रूस जैसे इलाकों में अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों की गैरमौजूदगी में स्थानीय पत्रकार जान की बाज़ी लगाकर सच बता रहे हैं।
आज पत्रकारों पर लगे प्रतिबंध यह दिखाते हैं कि फिलहाल सरकारें जीतती नज़र आ रही हैं। लेकिन सच यह है कि सच को नियंत्रित करने की इतनी कोशिशें इस बात का सबूत हैं कि पत्रकारिता की ताकत अब भी ज़िंदा है—और सत्ता उससे डरती है।
(यह लेख ग़ाज़ा, मॉस्को और ब्रसेल्स में लंबे समय तक तैनात रहे पूर्व बीबीसी संवाददाता जेम्स रॉजर्स ने लिखा है.. स्क्रॉल डॉट इन में छपा है)


