वानखेड़े के पर कतरे गए पर दैनिक जागरण ने प्रस्तुति में खेल किया

संजय कुमार सिंह-

मंदिर जाना प्रधानमंत्री का धार्मिक और लोकतांत्रिक अधिकार है। पर वे कब जाते हैं और क्या करते हैं उसपर टिप्पणी करना आम आदमी के साथ अखबारों और पत्रकारों का भी अधिकार है। आज के मेरे पांचों अखबारों में दो खबरें प्राथमिकता से छपी हैं। एक का शीर्षक द हिन्दू में इस प्रकार है, चुनाव वाले उत्तराखंड राज्य में प्रधानमंत्री ने भारत के ऋषि परंपरा की तारीफ की। दूसरी खबर एनसीबी के बहुचर्चित अधिकारी समीर वानखेड़े से संबंधित है। कहने की जरूरत नहीं है कि वानखेड़े पर कई गंभीर आरोप हैं।

इस आलोक में उन्हें जांच से अलग किए जाने की चर्चा और खबर है पर उसका महत्व कम करने के लिए कल ही नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो ने एक स्पष्टीकरण जारी किया है। इसका जिक्र भी अखबारों में है। इसके अनुसार, किसी भी अधिकारी या अधिकारियों को उनकी मौजूदा भूमिका से हटाया नहीं गया है और वे ऑपरेशंस ब्रांच की जांच में सहायता देना जारी रखेंगे (जांच करने और जांच में सहायता करने में अंतर है फिर भी ऐसा कहा गया है) और यह तब तक जारी रहेगा जबतक इसके उलट कोई खास आदेश जारी नहीं होता है।

कहने की जरूरत नहीं है कि वानखेडे को शाहरुख खान के बेटे आर्यन और महाराष्ट्र के मंत्री नवाब मलिक के दमाद के मामले की जांच से अलग कर दिया गया है। वानखेड़े 2006 में मुस्लिम थे और 2008 में आरक्षण के तहत सरारी नौकरी पाने वाले ‘संदिग्ध’ सरकारी नौकर हैं और मामला उन्हीं का बनाया हुआ है तो आरोपों की पुष्टि उन्हें ही करनी है और इसी को जांच में सहायता कहा जाता है। और ऐसी सहायता अपराधियों या अभियुक्तों से भी ली जाती है। आरोप यह भी है कि यह मामला वसूली के लिए बनाया गया था। इसलिए मामले में दम नहीं मिला तो वसूली का मामला होने की संभावना बढ़ेगी और तब शायद उसकी जांच हो या न हो। पर सरकारी स्पष्टीकरण इन मुद्दों पर नहीं है। इस बात पर है कि उन्हें जांच से हटाया नहीं गया है। हालांकि आज सभी अखबारों का शीर्षक यही है।

इंडियन एक्सप्रेस ने आज इस खबर को लीड बनाया है। लाल स्याही में फ्लैग शीर्षक है, नई टीम आज मुंबई में है, एनसीबी की मुंबई इकाई को लेकर हंगामा, आर्यन मामले में दिल्ली एसआईटी के तहत किया गया। उपशीर्षक है, जो अन्य मामला स्थानांतरित किया गया है उसमें वानखेड़े के आलोचक, नवाब मलिक के दामाद से संबंधित मामला भी है। एक अलग बॉक्स में एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड भी है और इसका शीर्षक बाकायदा यही है, नुकसान की भरपाई की कोशिश। ऐसे में बाकी के अखबारों के शीर्षक भी गौर करने लायक हैं।

  1. टाइम्स ऑफ इंडिया
    आर्यन मामला वानखेड़े नहीं देखेंगे, एनसीबी ने एसआईटी बनाई
  2. हिन्दुस्तान टाइम्स
    वानखेड़े बाहर, आर्यन मामला नई टीम को दिया गया
  3. द टेलीग्राफ
    नशे की जांच के विवादास्पद मामले को दिल्ली स्थानांतरित किया गया।

हिन्दी अखबारों में मैंने सिर्फ दैनिक जागरण को देखा। और वहां उसका शीर्षक है, आर्यन ड्रग्स मामले की जांच अब वानखेड़े नहीं, केंद्रीय टीम करेगी। कहने की जरूरत नहीं है कि अंग्रेजी के अखबारों ने जो साफ-साफ कहा है उसे जागरण ने लीप-पोत दिया है और जो एक्सप्रेस ने एक्सप्लेन्ड में कहा है उसे जागरण ने हाइलाइट कर कहा है, वानखेड़े की जिम्मेदारियों में कोई परिवर्तन नहीं, एनसीबी मुंबई के क्षेत्रीय निदेशक बने रहेंगे। दूसरा शीर्षक है, नवाब मलिक के दामाद से जुड़ा मामला भी मुंबई क्षेत्रीय इकाई से लिया गया। बेशक यह वानखेड़े के पर कतरना है। लेकिन विभाग के स्पष्टीकरण के मद्ददेनजर संपादक जी नहीं मानें या उन्हें यकीन नहीं हो तो नैतिकता और निष्पक्ष पत्रकारिता का तकाजा था कि यह बताया जाता कि नवाब मलिक ने एनसीबी के अनाम कर्मचारी का जो पत्र जारी किया था उसमें लगाए गए अन्य आरोपों का क्या हुआ।

कहने की जरूरत नहीं है सरकारी या विभागीय स्तर पर उनके बारे में कोई टिप्पणी नहीं की गई है। अगर कुछ हुआ होता तो उसकी भी खबर होती और प्रमुखता से होती। नहीं है, इसलिए यही माना जाना चाहिए कि उनकी जांच नहीं हो रही है। या उसके प्रचार की जरूरत फिलहाल नहीं महसूस की जा रही है। लेकिन अखबार ने इस सूचना को हाइलाइट नहीं किया है। ऐसे में यह मान लेना चाहिए कि सरकार ने भारी छीछालेदर के बाद छवि सुधारने की मामूली या आधी-अधूरी कोशिश की है। मीडिया से जो अपेक्षा रही होगी वह अंग्रेजी वालों ने तो पूरी नहीं की। दैनिक जागरण ने अपनी योग्यता और क्षमता के अनुसार पूरी कोशिश की है।

शंकराचार्य, बाल नरेन्द्र और मगरमच्छ

प्रधानमंत्री मोदी ने शुक्रवार को केदारपुरी में आदि गुरु शंकराचार्य के पुनर्निर्मित समाधि स्थल का लोकार्पण और 12 फीट ऊंची प्रतिमा का अनावरण “भव्य रूप में” किया। …. प्रधानमंत्री ने रुद्राभिषेक करने के साथ ही पहले चरण के 225 करोड़ रुपये से हुए कार्यों का लोकार्पण और 184 करोड़ रुपए से होने वाले दूसरे चरण के कार्यों का शिलान्यास भी किया। …. प्रधानमंत्री ने आदि शंकराचार्य के जीवन दर्शन, अल्प जीवनकाल में किए गए बड़े कार्यो और भारतीय समाज को सांस्कृतिक- आध्यात्मिक रूप से एकजुट करने के प्रयासों का उल्लेख करते हुए देश के प्राचीन वैभव को दोबारा लौटाने का संकल्प व्यक्त किया। ….. तीर्थाटन सिर्फ सैर-सपाटा नहीं, बल्कि देश को जोड़ने वाली जीवंत परंपरा है। …..

दूसरी तरफ द टेलीग्राफ ने पीटीआई के जरिए वितरित प्रेस इंफॉर्मेसन ब्यूरो की तस्वीर छापी है और बताया है कि शंकराचार्य केरल के रहने वाले थे और वह राज्य भाजपा को चुनावी निर्वाण देने से बार-बार मना कर दे रहा है तथा प्रधानमंत्री जो वैराग्य के प्रति अपनी निष्ठा दिखाते रहते हैं और सावधानी से चुने गए सहायकों का प्रदर्शन करते हैं, एक असामान्य और अप्रत्याशित प्राणी मगरमच्छ से संबंध रखते हैं। शंकराचार्य के बारे में कहा जाता है कि जब वे छोटे थे तो तभी सन्यासी बनना चाहते थे। इनके संन्यास ग्रहण करने के समय की कथा बड़ी विचित्र है। कहते हैं, माता एकमात्र पुत्र को संन्यासी बनने की आज्ञा नहीं देती थीं। तब एक दिन नदी किनारे एक मगरमच्छ ने शंकराचार्य जी का पैर पकड़ लिया तब इस वक्त का फायदा उठाते शंकराचार्य जी ने अपने माँ से कहा, “माँ मुझे सन्यास लेने की आज्ञा दो नही तो मगरमच्छ मुझे खा जायेगा”। इससे भयभीत होकर माता ने तुरंत इन्हें संन्यासी होने की आज्ञा प्रदान की; और आश्चर्य की बात है की, जैसे ही माता ने आज्ञा दी वैसे तुरन्त मगरमच्छ ने शंकराचार्य का पैर छोड़ दिया। और इन्होंने गोविन्द नाथ से संन्यास ग्रहण किया। केरल के कालडी (Kalady) में आदि शंकराचार्य का जन्म हुआ था। यहां एक मगरमच्छ घाट है। यह एक प्रसिद्ध तीर्थस्थल और पर्यटन के लिहाज से आकर्षण केंद्र है।

दूसरी ओर, कहानी यह भी है कि बाल नरेन्द्र एक बार गेंद निकालने के लिए मगरमच्छ से भरे तालाब में कूद गए थे। वहां से एक मगरमच्छ के बच्चे को भी ले आए और घर ले गए। मां की सलाह पर इस मगरमच्छ के बच्चे को वापस तालाब में ले जाकर छोड़ दिया गया। बाल नरेन्द्र तैरकर तालाब के बीच में चले जाते थे जहां मंदिर में एक झंडा लहराता था। (ग्रामीणों के हवाले से एक पुस्तक में कहा गया है कि इसमें 29 मगरमच्छ थे)। एक दिन मगरमच्छ की पूंछ बाल नरेन्द्र के पैर से टकरा गई जिससे बाल नरेन्द्र बुरी तरह जख्मी हुए थे। पुस्तक के अनुसार जख्म के ये निशान आज भी देखे जा सकते हैं। पानी में वापस छोड़ दिए गए मगरमच्छ के बच्चे से अलग इस बुरे बर्ताव वाले मगरमच्छ का क्या हुआ यह पता नहीं चला।

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