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सुख-दुख

मीडिया मालिकों का दिल जीतने की उनमें अदभुत प्रतिभा थी!

वीरेंद्र सेंगर-

वरिष्ठ पत्रकार मित्र रामेश्वर पांडेय नहीं रहे। लखनऊ के एक मित्र ने मनहूस खबर बताई। स्तब्ध रह गया। हम लोगों ने करीब पांच साल लखनऊ में साथ काम किया है। तमाम यादें कौंध गयीं। … 1980 का दौर था। पत्रकारिता का पहला चरण था।अखबार के संपादक तब तडित जी और आनंद स्वरूप वर्मा जी थे। दोनों धुर वामपंथी झुकाव वाले रहे। सो हर मुद्दे पर संपादकीय टीम में जेर ए बहस होती थी।

पांडेय जी पत्रकारिता में लौटने के पहले एक धुर वाम संगठन में फुल टाइमर भी रहे थे। बाद में गोरखपुर के जागरण से होते हुए लखनऊ आए थे। पांडेय की ससुराल बिहार में थी। . … वाम राजनीति में उनका जुड़ाव बिहार से भी था। इसके भी तमाम दिलचस्प संस्मरण वे सुनाते थे। वे कविता भी लिखते थे।

कामरेड पाण्डेय जी धुर दक्षिणी पंथियों से भी घुलकर बात कर लेते थे। कुछ का तो उन्होंने ह्दय परिवर्तन भी करा लिया था। ये भी हैरान करने वाला रहा कि वे कैसे अखबार मालिकों का विश्वास जीत लेते थे। जबकि ये लोग वामपंथी विचार वालों को ज्यादा भरोसे लायक नहीं मानते थे। ये कौनसी उनकी छिपी प्रतिभा थी? मैं नहीं जानता। एक बार मैंने ठिठोली केअंदाज में उनसे पूछा भी था। वे ठाहाका मारकर हंसे थे। बोले थे सेंगर भाई इसे राज ही रहने दो। फिर मुस्करा पड़े थे। उनकी निर्मल मुस्कुराहट दिल जीत लेती थी। अलविदा दोस्त!

अमर उजाला और जागरण में उन्हें खूब मौका मिला। तमाम नए लोगों को पत्रकार बनाया। पुराने कामरेड थे ही सो अपना टोला भी बना लेते थे। ये भक्त समुदाय उन्हें सम्मान से काका बोलते, फिर तो वे जगत काका हो गये। हम दोनों लगभग एक आयु वर्ग के थे। पाण्डेय जी महज पांच महीने बड़े थे। उनसे अक्सर सामयिक राजनीतिक चर्चा फोन पर होती थी। वे जिंदादिल इंसान थे।दोस्त जाने की बहुत जल्दी कर दी। बहुत याद आओगे मित्र!

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