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किस्सा उपेंद्र राय:  ग़ाज़ीपुर से तिहाड़ वाया मुंबई

लेखक हैं दास मलूका….

‘दास मलूका’ कौन हैं, यह जानने से ज़्यादा अहम है कि हमारे समय में ऐसे लोग हैं जो दास मलूका जैसी दृष्टि रखते हैं। यह दृष्टि हमें उस गोपन की यात्रा कराती है जो दृश्य में होते हुए भी अदृश्य है। दास मलूका बहुत दिनों से चुपचाप ज़माने की यारी-हारी-बीमारी पर नज़र रख रहे थे कि मीडिया विजिल से मुलाक़ात हुई और क़लम याद आया। अब वादा है कि महीने में दो बार, जहाँ तक संभव हुआ, पहले और तीसरे रविवार वे पाठकों से गुफ़्तगू करेंगे। यह पहली पेशकश है..ग़ौर फ़रमाएँ- संपादक

दास मलूका-

1996-97 की गर्मियों की दोपहर बाद का वक्त था और एक नौजवान लखनऊ के छन्नी लाल चौराहे पर विक्रम टेम्पो से उतरा, टैम्पो वाले को किराए के 2 रुपए, जी हां 2 रुपए थमाए और पैदल ही कपूरथला कॉम्पलेक्स की ओर बढ़ चला, कपूरथला कॉम्पलेक्स जहां सहारा इंडिया की मशहूर बहुमंजिला इमारत थी, सफेद मगर उतनी ही स्याह सन्नाटे में लिपटी जिसमें खिड़कियां थी मगर खुलेपन का अहसास नहीं होता था। थोड़ी देर बाद वो नौजवान चौथे माले पर था, जहां अगली सुबह के लिए जागने जा रहे अखबार का उनींदा न्यूज रूम था। उसे पहचाने वाला वहां कोई नहीं था लिहाजा बड़ी देर तक वो गलियारे में ही सकपकाया टहलता रहा, अचानक किसी ने उसे बड़ी बेपरवाही से आवाज़ दी और राहत की सांस लिए जबरी मुस्कान चिपकाए वो एक मामूली सी डेस्क की ओर बढ़ा, डेस्क पर बैठे दूसरे शख्स ने जिज्ञासा भरी नजरों से उसे देखा तो बुलाने वाले ने बिना कोई औपचारिक परिचय कराए बताया….उपेन्दर है…..

जी हां वही उपेन्द्र राय जो आज ‘100 करोड़ के कथित लॉकर का पत्रकार’ है। उपेन्द्र राय का पत्रकारिता का करियर 1996-97 में बतौर स्ट्रिंगर पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से जिले से शुरु हुआ, तमाम कोशिशों के बाद भी उसे लखनऊ और गोरखपुर में राष्ट्रीय सहारा की यूनिटों में प्रॉपर पे-रोल पर नौकरी नहीं मिली….लेकिन अचानक एक दिन अखबार के साप्ताहिक पुल-आउट के फिल्मी पेज पर उसका छोटा सा नाम, छोटे से फिल्मी आर्टिकल के नीचे चिपका दिखा और जानने वालों को पता चला कि अब उपेंद्र राय मुंबई में है…

मुंबई सहारा में पहुंचने के बाद उपेंद्र राय की कहानी ने अचानक करवट ली और कुछ सालों की कवायद के बाद उसे स्टार न्यूज के न्यूज रूम में बतौर प्रोड्यूसर पाया गया…न्यूज रूम में उसकी हैसियत बहुत मामूली थी लेकिन जानकार बताते हैं कि उस दौर में जब मोबाइल पर इन कमिंग और आउट गोइंग क़ॉल के भी पैसे लगते थे वो लगातार फोन पर चिपका दिखता था…अपने ऑन लाइन मैनेजर से उसके रिश्ते बहुत मधुर थे, और शिकायत के मौके बहुत कम।


जिंदगी यूं ही चल रही थी और उपेंद्र राय की शोहरत उस न्यूज रूम में बस इतनी थी कि ट्रेन से यूपी-बिहार जाने वाले (जो वहां बड़ी तादाद में थे) हर छोटे-बड़े सहकर्मी का रिजर्वेशन वो चुटकियों में कनफर्म करा देता था।


वक्त ने करवट ली….पहले चैनल की और फिर उपेंद्र राय की, बताते हैं कि दिल्ली से पहुंचे नए चैनल हेड (जो इन दिनो एक ग्लोबल मीडिया ग्रुप में एशिया हेड की हैसियत रखते हैं) को एक नई कार चाहिए थी….एक खास ब्रांड की, एक खास रंग की..वो थोड़े निराश थे क्योंकि उन्हें मनपसंद गाड़ी मिल नहीं रही थी…कहते हैं कि ओहदे के बड़े फासले के बावजूद न्यूजरूम के लोकतंत्र का लाभ उठाते हुए उपेंद्र राय ‘हेड साहब’ के पास पहुंचे और ‘उन्हें’ ही बताया कि इस वक्त ‘उनकी पीड़ा’ क्या है….साहब पहले तो इस जूनियर की इसी प्रतिभा के कायल हो गए…लेकिन अगले दो दिनो में जब उनके मनचाहे रंग की और मनचाहे ब्रांड की गाड़ी दफ्तर के बाहर खड़ी थी तो फिर तो वह कृतकृत्य ही हो गए।
जानकार बताते हैं कि मुंबई में पुलिस और इनकम टैक्स अफसरों की पुरबिया/ भूमिहार लॉबी में उपेन्द्र राय ने जबरदस्त पकड़ बना ली थी। जाहिर है इसके जरिए वो कॉरपोरेट दुनिया के भी करीब हुए होंगे।

बहरहाल इसके बाद उपेंद्र राय गाहे-गाहे स्टार न्यूज की स्क्रीन पर अपनी पुरबिया एक्सेंट की हिंदी के साथ नजर आने लगे जो टीवी प्रोफेशनल्स के लिए जरा असहज करने वाला भी था। यहां से जो सिलसिला शुरु हुआ वो उन्हें वापस एक दिन सहारा ले आया…लेकिन इस बार वो उनके भी अफसर थे जो कभी उन्हें बतौर स्ट्रिंगर घास डालने को तैयार नहीं थे…सहारा में उनका आना महज एक संपादक की पद-स्थापना नहीं थी, ये बताने की जरूरत नहीं है…लेकिन इसके बाद वहां बदलावों की झड़ी लग गई और माना गया कि उपेंद्र जो कर रहा है ‘सहारा परिवार’ के भले के लिए कर रहा है। लेकिन ये वक्फा बहुत देर तक खामोशी वाला नहीं रहा…
2010 में सहारा परिवार अपनी एयरलाइन को लेकर खासा परेशान था। लगातर घाटे में जा रही एयरलाइन से परिवार ने पीछा छुड़ाने का मन बना लिया था और सौदे में उपेन्द्र राय के संपर्कों का भी सहारा लिया जा रहा था। इसी दौरान नीरा राडिया का मशहूर टेप चर्चा में आ गया जिसमें उपेन्द्र की नीरा से बातचीत भी लीक हुई।


इसके बाद सहारा जांच एजेंसियों के राडार पर आ गया तो उपेन्द्र ‘ट्रबल शूटर’ की भूमिका में भी उतरे…लेकिन यहां ट्रबल ‘शूट’ होने की बजाए बढ़ गई जिसके चर्चे दिल्ली के गलियारों में आज भी होते हैं। इस बढ़ी हुई ‘ट्रबल’ की वजह निजी तौर पर उपेंद्र राय ही थे लिहाजा वो एक जगह से दूसरी जगह हटाए और लगाए जाते रहे…क्योंकि ‘क्लैश ऑफ इंटरेस्ट’ संस्थान को दिक्कत में डाल रहा था, बीच में तो वो लंदन भी भेज दिए गए कि ED और CBI के अफसरों की नजर से जरा दूर रहें।


कहा जाता था कि सहारा परिवार किसी को घर से तब तक बेदखल नहीं करता जब तक उस पर आर्थिक और चारित्रिक अनियमितता के आरोप न हों, छोटे या बड़े।


लेकिन जानकारों का मानना है कि इस अनियमितता को भी सुविधा के मुताबिक ही तय किया जाता है – यानी जैसा कि हर जगह होता है। उपेंद्र संस्थान को असहज कर रहे थे लेकिन उन्हें फारिग नहीं किया गया तो शायद इसलिए कि उनसे उम्मीदें बरकरार थीं। लेकिन एक दिन सहाराश्री सुब्रत राय सहारा खुद जेल में थे और उपेंद्र संस्थान से बाहर। इस दौरान उन्हें तमाम जगहों के साथ साथ ‘प्रेस क्लब ऑफ इंडिया’ में भी देखा गया जहां वो बतौर पत्रकार वोट डालने के लिए पहुंचे। मगर उपेंद्र राय अब न चर्चा में थे न विवाद में….


अचानक मई 2018 की एक दोपहर बाद वो फिर मीडिया मार्केट में सनसनी की तरह सरसरा गए, खबर थी कि उन पर CBI का छापा पड़ा है और अब वो उसके मुल्जिम हैं।दास मलूका के पास यहां तक बताने के लिए बस यही था आगे की कहानी का ‘वाइटल’ हिस्सा वरिष्ठ पत्रकार शांतनु गुहा रे की फेस बुल वॉल से जिन्हें ‘कॉर्पोरेट वर्ल्ड’ पर गहरी नजर और बेहतर पकड़ के लिए जाना जाता है।

बुधवार की वो शाम और स्पेशल 27

उपेंद्र राय खुद को संपादक तो कहते हैं लेकिन आज तक न उन्होने कोई संपादकीय लिखा न कभी रिपोर्टर्स को कोई खास स्टोरी करने के लिए जोर दिया


वो 2019 में यूपी के बलिया से चुनाव लड़ना चाहते थे, एक टेलिविजन चैनल शुरु करना चाहते थे जिसके लिए जैन टीवी और अधिकारी ब्रदर्स के साथ उनकी सौदेबाजी जारी थी, बल्कि नोएडा में तो इसके लिए उन्होने जगह भी हासिल कर ली थी, और दिल्ली में तमाम लोगों की तरह वो भी अपना एक न्यूज पोर्टल चला ही रहे थे ।


राय दरअसल पत्रकारिता के नए ‘शो मैन’ बनने की ख्वाहिश रखते थे, वो चाहते थे कि बतौर चैनल हेड उनकी तस्वीरों वाली होर्डिंग भी दिल्ली-नोएडा के सनसनाते फ्लाईवे पर नजर आएं। लेकिन उनका ये दांव शायद उल्टा पड़ा।


राय जो लंबे वक्त से जांच एजेंसियों के राडार पर थे, उस शाम बमुश्किल कॉफी की कुछ चुस्कियां ले पाए थे कि CBI के 27 अफसरों की एक जांच टीम दक्षिण दिल्ली के उनके शानदार ऑफिस-कम-रिहायशी बंगले में प्रवेश करती है। और जांच शुरु…..


वहां से बरामद कागजात के साथ एक चौंकाने वाली डायरी भी बरामद होती है, राय का कहना है कि वो डायरी बतौर पत्रकार, उन्हें उनके सूत्रों के जरिए हासिल हुई। लेकिन शायद उन्हें नहीं पता था कि इसी डायरी की एक और प्रति मुंबई में कभी एक और छापे के दौरान बरामद हो चुकी थी, जिसने एक बड़े उद्यमी घराने को थर्रा दिया था। एक ऐसा बड़ा केस जिस पर दिल्ली की अदालत में सुनवाई चल ही रही है।


राय लगातार कहते रहे कि वो पत्रकार हैं, लेकिन वो बता नहीं सके कि कौन सा संपादक इस तरह निजी हवाई जहाजों में सफर करता है, बड़े उद्यमियों को जमीनें खरीदने में मदद करता है, विशाल कॉरपोरेट घरानों के टैक्स बचाने के जुगाड़ सेट करता है। जांच करने वालों को यहां तक पता था कि राय को उस मैगजीन के मालिक ने क्यों निकाला जो खुद ही तमाम मामलों में प्रवर्तन निदेशालय के राडार पर था।


उपेंद्र राय, राजधानी दिल्ली के सत्ता के गलियारों में तमाम लोगों के लिए डॉन क्विकजोट के मशहूर किरदार के ‘सांचो पैंज़ा’ की तरह थे।


(सांचो पैंजा एक ऐसा मामूली चरित्र है, जिसका इस्तेमाल बड़े-बड़े और गैरमामूली लोग करते हैं और वो अपने मुनाफे के मुताबिक उनकी मदद करता है या कह सकते हैं खुद को इस्तेमाल होने देता है)


तो ‘सांचो पैंजा’ राय की फेहरिश्त में राजधानी के लालची अफसरशाहों से लेकर अय्याश सियासत दान तक शामिल थे, वो जहां जाते हमेशा सहयोगियों का लवाजमा उनके साथ साथ चलता था।


बहरहाल राय को 12 घंटे की गहन पड़ताल और लंबे सवाल-जवाब के बाद आखिरकार गिरफ्तार कर लिया गया। इस दौरान जो लोग उनसे मिलने पहुंचे सीबीआई ने उन्हें भी हिरासत में लेकर पूरी रात बिठाए रखा, ये रेड दिल्ली और यूपी में कुल 11 जगहों पर एक ही वक्त पड़ी और एक साथ जारी थी।


लेकिन इस पूरी कार्रवाई का सबसे अफसोसनाक पहलू ये था कि राय जांच कर्ताओं को लगातार तर्क दे रहे थे कि वो तहलका मैगजीन के चीफ एडीटर थे। किस्म-किस्म की जगहों पर जाना और किस्म-किस्म के लोगों से मिलना उनके काम का हिस्सा था। उनके पास से बरामद एयरपोर्ट के कथित ‘ऑल एक्सेस पास’ के लिए भी उनके पास यही तर्क था।


(ये ऑल एक्सेस पास जिसे तकनीकी जबान में एयरोड्रम एंट्री पास कहते हैं सिर्फ अति वीवीआईपी लोगों के पास होता जो पूरे देश में महज कुछ सौ लोग भी नहीं होंगे, या फिर एयरपोर्ट के तकनीकी स्टाफ के पास। ये उन्हें कैसे हासिल हुआ ये अब भी एक पहेली है)


हालांकि तहलका के तमाम पूर्ववर्ती संपादकों के लिए ये बेहद अफसोसनाक क्षण था, और खोजी पत्रकारिता को एक नया अवतार देने वाली (trail blazer journalism) इस चर्चित मैगजीन के लिए मरणांतक आघात.

वो बात जिसका फ़साने में कोई जिक्र न था….

उपेंद्र राय ‘सांचो पांजा’ हैं तो इसका सीधा मतलब है कि वो मामूली दिखने वाले और गैरमामूली काम कर जाने वाले आदमी हैं।


मगर इस मामूली और गैरमामूली के घालमेल ने ही असल दिक्कत खड़ी की। जानकार बताते हैं कि एयर सहारा को दरहम बरहम करने को लेकर जो कुछ हो रहा था उस पर ED की नजर थी। नीरा राडिया टेप में नाम आने के बाद उपेंद्र राय से भी पूछताछ हुई। लेकिन यहीं उनका पंगा ED के अफसर राजेश्वर सिंह से हो गया जो जांच से सीधे जुड़े थे। अपने बचने की राह तलाशने में उपेंद्र राय ने राजेश्वर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। पहले ये मोर्चा RTI और PIL की शक्ल में खोला गया और फिर पैसे के जोर पर मामला दबाने की कथित कोशिश हुई। लेकिन पंगा निजी हो चुका था और ED की ओर से CBI को शिकायत की गई की केस दबाने के लिए सहारा की ओर 2 करोड़ की रिश्वत की पेशकश की गई है। कहते हैं शिकायत में उपेंद्र राय का नाम प्रमुखता से था।

थोड़े दिन की मुश्किल के बाद UPA-2 में साउथ और नॉर्थ ब्लॉक तक पैठ बना चुके उपेंद्र ने ये मामला दबवा लिया लेकिन जानकारों की राय में राजेश्वर सिंह की गांठ दब तो गई थी लेकिन खत्म नहीं हुई थी।


बताते चलें कि राजेश्वर सिंह यूपी की प्रांतीय पुलिस सेवा के मामूली से अधिकारी थे, यानि DSP रैंक, लेकिन जो एक बार वो ED आए तो जाने कैसे यहीं के होकर रह गए। यानी यहां भी मामला एक मामूली के गैर मामूली होने का ही है।
जानकारों की राय में उपेंद्र राय के तिहाड़ जाने के पीछे का पेच कहीं यहां भी फंसा है।


लेकिन CBI को तो सत्ता प्रतिष्ठान का सुग्गा कहा जाता है, अगर उसने उपेंद्र राय पर हाथ डाला तो जाहिर है कहीं से GO-AHEAD मिला होगा। तो क्या माना जाए कि NDA में उपेंद्र राय पैठ कमजोर है ?


जानकारों की राय में इसका जवाब है ना !


लेकिन मुश्किल ये हुई कि राय एक साथ कई नावों की सवारी के चक्कर में विश्वसनीयता खो बैठे। एक तरफ वो UPA के ऐसे नेताओं से कारोबारी करीबी में थे जो NDA के लिए लगभग विलन थे। दूसरी ओर बलिया का टिकट हासिल करने के चक्कर में वो SP-BSP जैसे दलों के भी संपर्क में थे, और यही उनकी परेशानी का सबब बन गया।


वो अमर सिंह जैसों की तरह पब्लिक प्लेटफॉर्म पर भी ज्यादा नहीं थे कि अपनी वाचालता से दांव पलट दें, अभी वो जुगाड़ बिठाने के माहिर ‘सांचो पांजा’ ही थे जिसके पास अपना साम्राज्य खड़ा करने का सपना था…या कहें है।


सपने कभी मरते नहीं और जानकारो की मानें तो खेल तो अब शुरु हुआ है। इस गिरफ्तारी के बाद CBI ने उन्हें अचानक बड़ी लीग में ला खड़ा किया है। दरअसल तो CBI के पास इतना ठोस केस था ही नहीं जिस पर इतनी बड़ी कार्रवाई हुई, केस तो अब धीरे-धीरे बढ़ाए जा रहे हैं।

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