पढ़िये और जानिये कि बचाव अभियान को मीडिया ने कैसे प्रचार अभियान बना रखा है
संजय कुमार सिंह
कल के अखबारों में लगभग साफ घोषणा के बावजूद दीवाली के दिन से निर्माणाधीन टनल में फंसे 40 से 41 हो गये मजदूरों में से किसी को भी अभी तक सुरक्षित नहीं निकाला जा सका है। आज के अखबारों में इस तथ्य को स्वीकार करने वाले शीर्षक की बजाय गोल मोल शीर्षक हैं। उसपर आने से पहले बता दूं कि अभी तक की स्थिति के बारे में द टेलीग्राफ का शीर्षक है, “पहुंच बाधित, समय सारिणी के बारे में कोई वादा नहीं (फ्लैग)। राहत की उम्मीदों पर बाधाएं भारी”। दूसरे अखबारों ने कल को आज कर दिया है। यानी कल आज कहा था, आज फिर आज कहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज इस खबर को लीड बनाया है और शीर्षक है, फंसे हुए मजदूर सिर्फ 10-13 मीटर दूर लेकिन मुश्किल ने ड्रिलिंग रोक दी। द हिन्दू ने लिखा है, टनल राहत में देरी हुई क्योंकि ड्रिल मशीन बाधा से टकराई।
सिल्कयारा डेटलाइन से इशिता मिश्रा की बाइलाइन वाली इस खबर के अनुसार, “मशीन का सामना धातु की किसी वस्तु से हुआ। यह एक गर्डर रिब था और इस कारण ड्रिलिंग का काम रोकना पड़ा। बचाव दल के सदस्य प्रदीप यादव और बलविंदर कटर लेकर रेंगते हुए वहां तक गये और पाइप को काट दिया। यह काम रात दो बजे पूरा हुआ। इस और ऐसी दूसरी खबरों से पता चलता है कि मौके पर मीडिया का जमावड़ा हो गया है और वहां मौजूद रिपोर्टर पल-पल की खबर दे रहे हैं। ऐसे में अनुमान है कि मजदूर अगर आज सुंरग से निकलेंगे तो कल के अखबारों में खबर होगी और राजस्थान में कल ही मतदान है। कहने की जरूरत नहीं है कि इसका फायदा डबल इंजन वाली पार्टी को हो सकता है। इसी तरह अगर मजदूर आज नहीं निकले तो कल यानी 25 नवंबर को ऐन मतदान के दिन निकलेंगे और टीवी पर उसकी खबर मतदान पर असर डाल सकती है।
इसलिए बहुत संभावना है कि आज या कल में मजदूरों का निकालने की पूरी कोशिश की जाये और उसका राजनीतिक लाभ उठाया जाये। अगर कल भी मजदूर नहीं निकाले जा सके तो इस बात की संभावना बहुत कम है कि मतदान के बाद मजदूरों को निकालने का कोई राजनीतिक फायदा मिलेगा। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि मजदूर कब निकलते हैं, मीडिया उसकी खबर कैसे देता है और चुनाव में कैसा लाभ होता है। अभी तक की खबरों से यह कहा जा सकता है कि सरकार को हर संभव कोशिश करते दिखाया गया है और जो बाधाएं आई हैं उन्हें सामान्य या वाजिब कह कर पेश किया गया है। हालांकि ऐसे मामलों में इन बाधाओं का पूर्वानुमान न होना राहत कार्यों की दक्षता पर सवाल उठाते हैं। अगर आज और कल भी मजदूर नहीं निकले तो समझिये कि मजदूरों की हालत वाकई खराब है और वे मुश्किल में हैं। उनका सुरक्षित निकल पाना मुश्किल है और अभी तक जो प्रचार हुआ है वह झूठ है।
अभी तक की खबरों का मकसद यह बताना था कि सरकार अपना काम पूरी गंभीरता से कर रही है और सरकार या उसकी एजेंसियां काम करती हुई नजर आये। लोगों को लगे कि सरकार हर संभव कोशिश कर रही है और इधर-उधर की चूक जैसे जहां ड्रिल मशीन रखी गई थी उसमें दरार आ गई या जहां ड्रिल किया जा रहा था उसके रास्ते में लोहा आ गया। उसे काटकर फिर ड्रिल करने का काम शुरू हुआ। जैसी बाधाएं मामूली और सवाभाविक हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह लोहा वहां प्राकृतिक तौर पर नहीं रहा होगा। टनल निर्माण के क्रम में ही लगा होगा फिर वह अचानक कैसे आया गया होगा या पहले से होगा तो क्या उसका पता नहीं चल सकता था। फिर भी हुआ और प्रचारित किया गया, खबर छपी है कि रात दो बजे काट कर ठीक कर दिया गया तो आप समझ सकते हैं कि खबरें मजदूरों को सुरक्षित निकालने पर कम और प्रयासों के प्रचार पर ज्यादा केंद्रित हैं।
उदाहरण के लिए दरार के संबंध में बताया गया कि मशीन 25 टन की है और चलने से कंपन होता है और ऐसे में दरार पड़ना स्वाभाविक है। तथ्य यह है कि मशीन चार-छह दिन बाद आई और चालू की गई तथा इसके लिए जरूरत के अनुसार जगह या मंच नहीं बनाया गया था। कुल मिलाकर खबरों से पता नहीं चल रहा है कि मजदूर वाकई संकट में हैं या आसानी से निकाल लिये जायेंगे या उनका निकलना जान-बूझकर देर किया जा रहा है जिससे मतदान में फायदा हो। जो भी हो, अखबारों की खबरों से साफ है कि उन्हें जो भी बताया जा रहा है या छापने के लिए दिया जा रहा है उसे वे छाप दे रहे हैं। यह सोचे बिना कि उनके पाठकों इस सूचना की कितनी जरूरत है या है भी कि नहीं। मामला चूंकि डबल इंजन वाली सरकार की और उसकी छवि का है इसलिए प्रचार के साथ-साथ छवि का भी ख्याल रखा जा रहा है।
इसीलिए वीरवार को निकाले जाने के आश्वासन से शिकायत या उसके फेल होने से कोई नाराजगी नहीं है और यह 15 लाख नहीं मिलने जैसा मामला नहीं है कि बाद में जुमला कह दिया गया और हम जैसे ज्यादातर लोगों ने उसे स्वीकार कर लिया। इसमें इस बात की भी परवाह नहीं की कि विदेश में रखा काला धन क्यों नहीं आया और लाने के लिए नोटबंदी के अलावा क्या कोशिशें की गईं। अखबारों की खबरों के भरोसे कल रात जब मैंने टनल में फंसे मजदूरों की स्थिति जानने के लिए खबरें तलाशनी शुरू की तो जो खबरें मिलीं उन्हें देखिये और समझिये कि मीडिया कैसे सबको बुद्धू बना रहा है। सवाल नहीं पूछकर खुद भी बन रहा है वह अलग मद्दा है पर चूंकि यह उसकी पसंद है इसलिए मैं उसपर नहीं जा रहा हूं। पर मीडिया ने जो खबरें दीं उनमें कुछ वाकई गैर जरूरी और कुछ बाकायदा हास्यापद हैं। गुरुवार को फंसे मजदूरों का 12वां दिन था आज टाइम्स ऑफ इंडिया ने जिस दूसरी को सिर्फ 10-13 मीटर कहा है वह पहले से ही बहुत ज्यादा नहीं था और कुछ ईंच की बाधा के लिए कल भी काम रोकना पड़ा था और नई बाधाओं के कारण कई मशीनें कई बार खराब और योजनाएं नाकाम हो चुकी हैं।
ऐसे में कोई अनुमान नहीं है कि मजदूर कब निकाले जा सकते या जीवित निकाले भी जा सकेंगे कि नहीं। बाकी खबरें राम भरोसे हैं जो पहले गलत साबित हो गईं तो अब क्यों नहीं होंगी। द टेलीग्राफ में इस खबर को लीड बनाना और उसका शीर्षक इस तथ्य की ओर इशारा कर रहा है। कहने की जरूरत नहीं है कि रिपोर्टर प्राप्त सूचनाओं को खबर की तरह भेजता है और डेस्क पर लोग उसे पढ़कर तय करते हैं कि खबर कितनी महत्वपूर्ण है और कैसे कितनी बड़ी छपनी है। खबर की कुछ खास बातें इस प्रकार हैं
– मजदूर कुछ घंटे में या कल तक बाहर आ सकते हैं। (17:13 की खबर)
– एनडीटीवी की खबर है कि मजदूरों को स्ट्रेचर पर निकाला जायेगा।
– एनडीआरएफ के डायरेक्टर जनरल ने पीटीआई को यह जानकारी दी है।
– मजदूरों को एक-एक कर निकाला जायेगा,
– स्ट्रेचर में पहिये लगे हैं, इन्हें रस्सी से खींचा जायेगा।
– स्थानीय स्वास्थ्य केंद्र में विशेष वार्ड तैयार है, एम्बुलेंस हैं ही।
– बचाव कर्मियों के लिए भी खतरा है, उनकी भी चिन्ता है। (20:48 की खबर)
– पूरे देश में मजदूरों के लिए दुआएं की जा रही है।
– मुख्यमंत्री ने सुरंग के मुहाने पर बौखनाग देवता के मंदिर में माथा टेका।
– फंसे मजदूर कब निकलेंगे इस बारे में अनुमान लगाना ठीक नहीं है।
– इससे राहत कार्यों में लगे लोगों पर दबाव पड़ता है – एनडीआरएफ
इन और ऐसी खबरों के बीच आज के दूसरे अखबारों की लीड की चर्चा कर लें। इससे आपको यह अनुमान लगाने में सहायता मिलेगी कि अखबारों ने किन खबरों को छोड़कर इस खबर को महत्व दिया है।
1. हिन्दुस्तान टाइम्स
– केंद्र ने डीपफेक क्रैकडाउन को गति दी है (लीड)
– जम्मू व कश्मीर मुठभेड़ 1 और सैनिक, 2 आतंकी मरे
– टनल के राहतकर्मियों को उम्मीद है कि 41 फंसे लोग आज निकल जायेंगे।
– पन्नूण रिपोर्ट पर ट्रुडेव ने कहा, भारत और अमेरिका के साथ मिलकर काम कर रहे हैं।
2. टाइम्स ऑफ इंडिया
– फंसे मजदूर सिर्फ 10-13 मीटर दूर, पर बाधा ने ड्रिलिंग रोक दी
– चुनाव प्रचार के अंतिम दिन गहलौत और पायलट ने एक आवाज में प्रधानमंत्री के दावे की आलोचना की (आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री अपनी पारटी के बारे में कम और कांग्रेस की आलोचना ज्यादा कर रहे हैं)
3. इंडियन एक्सप्रेस
– गवरनर विधेयक को अनंत काल तक लंबित नहीं रख सकते हैं : सुप्रीम कोर्ट ने कानून को रेखांकित किया (लीड)
2. जम्मू कश्मीर मुठभेड़ से सेबंधित फोटो (चार कॉलम)
3. निज्जर बनाम पन्नूण : अमेरिका और कनाडा को भारत का जवाब, वे कयों अलग हैं (तीन कॉलम में, फोटो और कैप्शन के नीचे)
4. द हिन्दू
– विधेयकों को लेकर राज्यपाल के पास कोई वीटो पावर नहीं होता है – सुप्रीम कोर्ट ने कहा (लीड)
– टनल बचाव में देरी क्योंकि ड्रिल मशीन बाधा से टकराई
5. द टेलीग्राफ
– “पहुंच बाधित, समय सारिणी के बारे में कोई वादा नहीं (फ्लैग)। राहत की उम्मीदों पर बाधाएं भारी”।
– महुआ (मोइत्रा) और लोकप्रिय हो जाएंगी मुख्यमंत्री (ममता बनर्जी)
– कश्मीर का पत्रकार 655 दिनों बाद आजाद हुआ (किसी और अखबार में अंदर भी है?)
– ईडी ने प्रकाश राज को पूछताछ के लिए बुलाया (राज ने) कहा : खेला होबे
– गहलौत की मुश्किल : अच्छी योजनाएं, थोड़ा प्रचार (मीडिया सहयोग नहीं करे तो यही होता है)
6. नवोदय टाइम्स
– मुठभेड़ : लश्कर कमांडर सहित दो आतंकी ढेर, जवान शहीद (लीड)
– … जिन्दगी बस कुछ कदम दूर (टनल की खबर टॉप बॉक्स)
– गुरुघर पर कब्जा छुड़ाने गई पुलिस पर निहंगों का हमला, जवान शहीद
7. अमर उजाला
– अयोध्या के लोकार्पण की तिथि आई, मथुरा भी अब दूर नहीं : मोदी (लीड)
– उत्तरकाशी ड्रिलिंग कर रही ऑगर मशीन का प्लेटफॉर्म हिला, रोकना पड़ा बचाव अभियान
एक तरफ सरकार के कामों का प्रचार ऐसे किया जा रहा है और सभवतः इसका चुनावी लाभ लेने की कोशिश की जा रही है तो यह भी हो रहा है कि चुनाव आयोग राहुल गांधी को तो फुर्ती से नोटिस भेज देता है पर बाकी मामलों में सुस्त बना रहता है। चुनाव आयोग नोटिस भेजेगा तो खबर भी छपेगी ही और यह खबर भी पहले पन्ने पर है।


