
संजय कुमार सिंह
टनल या सुरंग में फंसे मजदूरों को निकालने की कोशिश के 13 दिन हो गये उन्हें निकाला नहीं जा सका है। आज 14वें दिन राजस्थान में मतदान है और अखबारों की खबरों से लग रहा था कि उनका मकसद सरकार को हर संभव कोशिश करते दिखाना है। इसमें मजदूरों को सुरक्षित निकालना कम महत्वपूर्ण हो सकता है इसकी मुझे कोई आशंका नहीं थी। फिर भी अखबारों की घोषणाओं के बावजूद जब मजदूर नहीं निकाले जा सके तो मुझे लगा कि कहीं उनका निकलना राजस्थान में मतदान वाले दिन ही न हो जिससे सरकार (डबल इंजन वाली है) को फायदा हो और मैंने इसीलिए ये उम्मीद जताई थी कि शुक्रवार नहीं तो शनिवार को मजदूर जरूर निकाल लिये जाएंगे तथा मतदान के समय टीवी पर उनके सुरक्षित निकल आने की खबरें चल रही होंगी। मतदान शुरू हो चुका होगा पर अभी तक ऐसा नहीं हुआ है तो आइये समझें कि अभी तक की अखबारों की खबरों के अनुसार मामला क्या है और जो मजदूर 13 दिन में भी नहीं निकाले जा सके वे आज शाम तक भी नहीं निकाले गये तो वाकई चिन्ता वाली बात है।
इस लापरवाही, नालायकी का जवाब मिलेगा कि नहीं पता नहीं लेकिन मामला साधारण नहीं है। क्योंकि अखबारों का काम नहीं है कि सरकार की छवि बनाने में लगे रहें। ऐसी स्थिति में संबंधित लोगों को झूठा आश्वासन देने का काम करे। दूसरी ओऱ, वोट के लिए सरकार ऐसा करती करवाती रही है। हेडलाइन मैंनेजमेंट अब पुराना हो चला। इसका सबूत यह है कि छत्तीसगढ़ में मतदान से पहले मुख्यमंत्री पर रिश्वत लेने के आरोप लगाये गये। रिश्वत देने और कूरियर से धन पहुंचाने वाले लोग सामने आये पर कुछ साबित नहीं हुआ। इसमें मुद्दा यह भी था कि रिश्वत लेना अपराध है तो देने वाला कैसे कह रहा है कि उसने दिये हैं। जाहिर है, उसे वायदा माफ सरकारी गवाह बनाये जाने की उम्मीद होगी या भरोसा दिया गया होगा। ऐसा दूसरे मामलों में हो भी चुका है। जहां तक कूरियर से नकद पहुंचाने का आरोप है, यह अपने आप में अपराध है। पहले हवाला से लेन-देन होता था और भ्रष्टाचार खत्म करने तथा ना खाउंगा ना खाने दूंगा जैसे दावों के बावजूद अगर यह सेवा चल रही है तो चुनाव के समय उसपर स्पष्टीकरण देने की बजाय सरकार ने केंद्रीय मंत्री के हजारों करोड़ के लेन-देन के वीडियो पर चुप्पी साध ली और मंत्री के कहने पर भी मामले की जांच के आदेश दिये जाने की खबर प्रचारित नहीं है।
जाहिर है, चुनाव के समय छवि बचाने के लिये जो सब किया जाना था वह तो नहीं ही हुआ, केंद्रीय मंत्री के मामले की जांच के आदेश भी नहीं दिये गये। कारण सरकार का अपने आरोपों पर भरोसा या जांच में क्या मिलना है उसकी जानकारी होना कुछ भी हो सकता है। फिर भी सरकार और ईडी की तरफ से सत्तारूढ़ नेताओं के खिलाफ प्रचार किया गया, खबरें छपी और छपवाई गईं। जाहिर है, मतदान पर उसका असर पड़ा होगा और सारी कोशिशें की ही गईं। पर सच यही है कि वह आरोप झूठा था और उसकी खबर आज राजस्थान में मतदान के दिन छपी है और इसका फायदा राजस्थान में सत्तारूढ़ सरकार को हो सकता है। कुल मिलाकर, बदनामी से बचने की कोशिशों का फायदा नहीं मिला, प्रचार का एक मौका हाथ नहीं आया और छत्तीसगढ़ चुनाव के समय जो आरोप लगाये गये थे उनके फर्जी होने की खबर आज टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर छपी है। चुनाव के समय उत्तर प्रदेश और राजस्थान में सरकारी पार्टी की ओर से हिन्दू मुसलमान करने की जो कोशिशें हुईं वह पूरी तरह उघार हैं।
जो सरकार जनहित के काम सोचती भी नहीं है उसे टनल में फंसे मजदूरों को निकालने की हर संभव कोशिश करता दिखाने में यह बता दिया गया है कि राहत का कार्य बहुत दक्षता और सही ढंग से नहीं भी चल रहा हो सकता है। अखबारों की खबरों से जो मैंने समझा है उसके अनुसार 13 दिन में 60 मीटर मलबा नहीं हटाया जा सका और अखबार बता रहे थे कि बस 10-13 मीटर रह गया। उसमें लोहे का गर्डर भी आया। राहत कार्य का तो पता नहीं लेकिन रिपोर्टिंग बच्चों वाली भी नहीं है। हुआ यह है कि कुल करीब 4.5 किलोमीटर के टनल का करीब 330 मीटर खोदने के बाद मजदूर जहां काम कर रहे थे, उनके पीछे की छत धंस गई। आगे सुरंग बना नहीं था और पीछे छत धंसने से करीब 60 मीटर में मलबा पड़ा है। यह कोई 60 मीटर में उतना ही ऊंचा होना है जितनी ऊंची सुरंग बन रही थी। ऐसे में मजदूरों तक पहुंचने के दो रास्ते थे – खोदे जा चुके सुरंग के रास्ते मलबे को निकाला जाता और जो छत धंसी थी उधर से भी खोद कर मजदूरों तक पहुंचने की कोशिश की जाती। मैं कोई जानकार नहीं हूं, खबरों के आधार पर सबसे आसान या सामान्य विकल्प की बात कर रहा हूं और यह मानते हुए कि कोई जल्दी नहीं थी।
जो लोग काम कर रहे थे वे विशेषज्ञ थे। उन्हें पता होगा कि 40 जो बाद में 41 हो गये, मजदूरों के पास 240 मीटर जगह है और आगे जो आंशिक तौर पर खोदा जा चुका है और जिसमें वॉक व योगा किया जाना प्रचारित है वह दो-ढाई किलोमीटर है। (खबरों और भक्तों के दावों के अनुसार)। ऐसे में मशीनों आदि से जो ड्रिलिंग चल रही है वह मलबा हटाना ही है और तथ्य यह है कि हम चांद पर पहुंच गये हैं, उसका प्रचार कर चुके हैं लेकिन 13 दिन में 60 मीटर लंबाई और खोदे गये सुरंग के बराबर मलबा नहीं निकाल पाये हैं। ड्रिल तो नहीं ही हुआ है। अगर मैंने कुछ गलत समझा है तो यह खबरों का कमाल है और अगर सही हूं तो ऐसा काम नहीं है जो 13 दिन में नहीं होता। पर यही सच है और हो चुका। फिर भी खबरों में कोई शिकायत नहीं है। प्रचार ही प्रचार है सो अलग। कहने की जरूरत नहीं है कि त्रासदी की इस खबर और पिछले दिनों चले प्रचार के बीच दिल्ली के प्रदूषण का मामला छत्तीसगढ़ में महादेव ऐप्प और घूसखोरी की खबरों के साथ दब छिप गया था और आज दोनों अचानक उभर आये हैं। इंडियन एक्सप्रेस में दोनों ही खबरें पहले पन्ने पर नहीं हैं। दूसरी अच्छी और महत्वपूर्ण खबरें हैं पर जो नहीं हैं वो अपनी जगह। टाइम्स ऑफ इंडिया में वायु प्रदूषण की खबर भी सिंगल कॉलम में ही सही, पहले पन्ने पर है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में आज लीड है, “शहर में प्रदूषण का ‘गंभीर’ संकट कम होने का नाम नहीं ले रहा”। कहने की जरूरत नहीं है कि देश की राजधानी का यह संकट दिल्ली सरकार के वश का नहीं है और आस-पास के शहरों या राज्यों की डबल इंजन की सरकारों को भी सक्रिय होना होगा या चिन्ता करनी होगी। लेकिन कांग्रेस मुक्त भारत का नारा देने वाली भाजपा की केंद्र सरकार डबल इंजन वाले उत्तर प्रदेश और हरियाणा के साथ पंजाब की आम आदमी पार्टी तथा राजस्थान की कांग्रेस (या भविष्य में निर्वाचित होने वाली) सरकार के साथ मिलकर कुछ कर पायेगी इसकी संभवना बनने तक यह खबर ही है। और शायद इसीलिए कई दिनों बाद सिर्फ दिल्ली के अखबारों की ही चिन्ता के रूप में सामने आई है। अमर उजाला में प्रदूषण से संबंधित खबर का शीर्षक है, दिल्ली फिर बनी गैस चैम्बर, एक्यूआई पहुंचा 400 पार। उपशीर्षक है, तीन दिन राहत की उम्मीद नहीं, 27 को बूंदाबादी के आसार। डबल कॉलम में खबर और फोटो वाली इस मूल खबर के साथ सिंगल कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, ठोस प्रयास करें राज्य : एनजीटी।
दिल्ली की प्रदूषित हवा में सांस लेते हुए मुझे ख्याल आता है कि शराब नीति में बदलाव के लिए दिल्ली सरकार और सत्तारूढ़ दल के नेताओं के खिलाफ कार्रवाई चल रही है, निर्वाचित जनप्रतिनिधि जेल में हैं जबकि ना कोई शराब पीने के लिए मजबूर किया गया ना किसी से शराब छीनी गई। अगर इससे किसी ने कमा लिया तो यही अपराध है। लेकिन दिल्ली के प्रदूषण के कारण बहुत सारे लोग, स्वयं नेतागण भी प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर हैं जिसका असर उनके और परिवार के स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। लेकिन साफ हवा की चिन्ता नहीं है और उसकी आड़ में गाड़ियों को 15 साल में कंडम कर देने का नियम बन गया है जैसे इससे किसी की कमाई नहीं होगी और संस्कारों की बात करें तो विन्टेज कारों का अपना महत्व है और पिता अथवा पूर्वजों की गाड़ी चलाने का आनंद अतुलनीय है। प्रदूषण के नाम पर हमें इससे वंचित किया गया पर हवा फिर भी साफ नहीं है। इसके लिए किसी को सजा नहीं होनी और शायद अच्छी भली गाड़ियों को कंडम करने के नियम से कोई कमाता भी नहीं है।


