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दुनिया को दिखा देने की फीलिंग जितनी जल्दी दिमाग़ से निकल जाए उतना अच्छा!

अनुभव सिन्हा-

दो छोटी छोटी कहानियाँ सुनाता हूँ। बत्तीस साल पुरानी बात है। मैं सहायक निर्देशक था। सरोज जी गाना शूट कर रही थीं। एक डांसर को बार बार किसी बात पे टोक रही थीं। कुछ मैं ध्यान नहीं दे सका, कुछ समझ भी नहीं आया। कुछ समय बाद मेरे साथ खड़ी थीं और उसी डांसर को बुलाया और बहुत डाँटा। मुझे लगा पूरे ग्रुप में वो सबसे अच्छा कर रहा था। फिर भी डाँट पड़ी। मैं मुँहलगा था उनका (बाद में कई गाने किए हमने साथ। सोनू निगम का ‘तू’ और ‘’बिजुरिया’ भी)। मैंने कहा वो तो सबसे अच्छा कर रहा है? क्यों डाँटा। बोलीं यही प्रॉब्लम है। वो अलग से दिखना नहीं चाहिए। ग्रुप डांसर है। पूरा ग्रुप एक दिखना चाहिए। कोई अलग से नज़र नहीं आना चाहिए।

लगभग उतनी ही पुरानी बात है। प्यारेलाल जी रिकॉर्डिंग कर रहे थे। कुछ तीस बत्तीस वायलिन वाले एक साथ बजा रहे थे। उनसे कुछ पचास फीट दूर प्यारे भाई बैठे हुए थे। ज़ाहिर है सब के सब सेम धुन बजा रहे थे। अचानक प्यारे भाई चिल्लाए अरे ‘नवीन’ (सही नाम भूल गया हूँ। ऐसे ही एक दोस्त का नाम लिख दिया)। ‘नवीन तेरा F sharp जा रहा है थोड़ा’ नवीन शर्मिंदा हो गया। जल्दी से सॉरी बोला और अगली रिहर्सल में प्यारे भाई ख़ुश हो गये। नवीन और प्यारे भाई एक दूसरे को देख के मुस्कुराए भी।

दोनों कहानियों से क्या पता चला? जब सब लोग काम कर रहे होते थे मैं उन्हें खड़ा हो के देख रहा होता था। हाहाहा।

ऐक्टर्स की बात कर रहा हूँ। जब भी नये एक्टर को एक छोटा सा मौक़ा मिलता है, ज़ाहिर है उसे लगता है कि दुनिया को दिखा दूँगा। यही मेरा मौक़ा है। सच है यही तुम्हारा मौक़ा है। पर दुनिया को दिखा देना तुम्हारा काम नहीं है। तुम्हारा काम उस दिन सिर्फ़ उतना है कि जिस सीन के लिए तुम्हें बुलाया गया है उस सीन में तुम्हारी भूमिका क्या है वो समझो, वो भूमिका बखूबी निभाओ। और चले जाओ। याद रखिए वो कलाकार जो सबसे ज़्यादा अदृश्य रहता है वो निर्देशक को सबसे ज़्यादा याद रहता है ‘चुप चाप आया, अपना काम किया और निकल गया’। दुनिया को दिखाने की कोई ज़रूरत नहीं है। अच्छा काम करो, वो देख लेगी। दुनिया को दिखा देने की फीलिंग जितनी जल्दी दिमाग़ से निकाल के काम पे जुट गये उतना अच्छा।

काफ़ी सारे अभिनेता सीन हाथ में मिलते ही देखते हैं कि मेरे संवाद कितने हैं। जल्दी से याद करूँ। मेरी वजह से रीटेक नहीं होना चाहिए। कोने में जा के संवाद का अभ्यास करते रहते हैं। अगर किसी बड़े अभिनेता के साथ सीन है तो उसका दबाव अलग। एक ज़रूरी काम रह जाता है। इस सीन में ये किरदार क्यों है। डराने के लिए हैं? प्यार पाने के लिए है? आंसू निकलवाने के लिए है? है क्यों ये? ये जानकारी संवादों से परे है। ये सबसे ज़रूरी जानकारी है। निर्देशक से लो। सहायक से लो। ख़ुद समझो और कर के दो। मैं उन किरदारों की बात कर रहा हूँ जो शुरुआत में मिलते हैं। एक सीन, दो सीन या उस से भी कम। निर्देशक इस सीन में क्या करना चाह रहा है? मैं इसमें कैसे मदद कर सकता हूँ। हो सकता है दर्शक को नज़र ना आए तुम्हारी कोशिश। निर्देशक को नज़र आता है कि जितना थोड़ा सा करना था उतना ही किया। पहली कहानी का डांसर। नज़र नहीं आना था नज़र नहीं आया।

रिश्तों से कभी कभार ही काम मिलता है। असल काम काम से मिलता है। मनोज पाहवा और कुमुद मिश्रा के पास हर फ़िल्म में इस लिये जाता हूँ कि मेरे सीन में चार चाँद लगा देते हैं। वरना शूटिंग के अलावा शायद ही कभी हम साल में एक दो बार मिलते हों। फ़ोन पे तो कभी नहीं। कुमुद तो अपने नाटक तक में नहीं बुलाता।

बस यूँ ही। सुबह ख़याल आया था कि इस बारे में बात करूँगा कि निर्देशक, छायाकार, अभिनेता सब उस कहानी के ग़ुलाम हैं जो कही जा रही है। हर दृश्य उस कहानी का ग़ुलाम है। हर दृश्य का हर किरदार उस कहानी का ग़ुलाम है। निर्देशक तो ख़ैर सबका ग़ुलाम है।

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