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भाजपा को मीडिया का समर्थन मुफ्त हो, मांगा, खरीदा अथवा डरा कर हासिल किया गया हो दिखता तो है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों की सबसे महत्वपूर्ण खबर राजस्थान के मुख्यमंत्री के चयन से संबंधित है। इसके साथ ही भाजपा ने तीनों राज्यों के लिये नए मुख्यमंत्री का चयन कर लिया है। दो राज्यों में आज शपथग्रहण है। तीसरे, राजस्थान में शपथग्रहण 15 को होगा जो नये चुने गए मुख्यमंत्री का जन्म दिन भी है। कहने की जरूरत नहीं है कि चुनाव परिणाम आने के बाद मुख्यमंत्रियों के चयन में भाजपा को एक सप्ताह से ज्यादा का समय लगा। मुख्यमंत्री केंद्र या आलाकमान की पसंद हैं – यह भी कोई नई बात नहीं है। कांग्रेस के समय में भी ऐसा होता था और तब अखबार तरह-तरह की आलोचना से भरे होते थे। नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार थे और बाद में राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी भाजपा का मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित होता था। भाजपा वाले दूसरों से पूछते थे कि आपका मुख्यमंत्री कौन होगा या मुख्यमंत्री का चेहरा कौन है और यह पहले से तय नहीं हो तो इसे विपक्षी दलों की कमजोरी बताया जाता था।

आप जानते हैं और खबर भी है कि विधायक दल ने अपना नेता चुना। यही नियम है लेकिन विधायक दल किसे नेता चुने इसका इशारा केंद्र कर देता रहा है और यह कोई नई बात नहीं है। लेकिन भाजपा ने 2014 के बाद जो रणनीति अपनाई थी वह इस बार नहीं रही। कहने की जरूरत नहीं है कि नियमानुसार विधायक दल का नेता मुख्यमंत्री होता है या सांसद अपने नेता खुद चुनते हैं जो प्रधानमंत्री बनता है तो पहले से उम्मीदवार की घोषणा तकनीकी रूप से सही नहीं है। लेकिन भाजपा (या किसी और को भी) अच्छा और आसान लगेगा तो करेगा। भूमिका अखबार की महत्वपूर्ण है जब वह इसे रेखांकित करता है या नहीं करता है। भाजपा ने इस बार मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार पर सवाल नहीं उठाया तो मीडिया ने भी नहीं (के बराबर) उठाया ना यह बताया कि इस बार भाजपा की रणनीति बदल गई है। जिसके लिए वह कांग्रेस की आलोचना करती थी ही खुद कर रही है।

यही हाल मुख्यमंत्री के चयन में लगने वाले समय का है। 3 दिसंबर को चुनाव परिणाम आने के बाद कांग्रेस ने तेलंगाना में मुख्यमंत्री का चयन तुरंत कर लिया था। उनका शपथग्रहण हो गया और वे काम भी शुरू कर चुके हैं। भाजपा को कांग्रेस के मुकाबले ज्यादा समय लगा पर यह खबर वैसे नहीं बनी जैसे कांग्रेस के समय बनती थी या बनती। दूसरी ओर, तीनों मुख्यमंत्रियों का चयन निश्चित रूप से पार्टी आलाकमान की उपलब्धि है। मोटे तौर पर यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की सफलता है। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे पता चलता है कि भाजपा में वही हो रहा है जो नरेन्द्र मोदी और अमित शाह चाहते और करते हैं। कांग्रेस में ऐसा होता तो मीडिया (और विपक्ष भी) आलाकमान की कथित मनमानी और तानाशाही की चर्चा से नहीं चूकता। इंडिया गठबंधन में फूट और तालमेल न होने की खबरें आप देखते ही हैं।

भाजपा के मामले में अगर मोदी और शाह की तारीफ नहीं है तो संभव है इसका कारण आलाकमान की इस कार्रवाई को अलोकतांत्रित कहे जाने से बचना-बचाना हो। नरेन्द्र मोदी कांग्रेस के आंतरिक लोकतंत्र की बात करते रहे हैं पर भाजपा के आंतरिक लोकतंत्र की बात नहीं होती है। दिलचस्प यह है कि इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की मजबूती और कामयाबी के रूप में पेश किया जाता है। पर वह भी बड़े सलीके से। यह भाजपा को मीडिया का समर्थन है। खुला और स्पष्ट है – भाजपा ने खरीदा हो, डरा धमकाकर हासिल किया हो, विज्ञापनों के लालच में हो या यूं ही नीतियों का समर्थन हो। पर मुद्दा यही है। राजस्थान में पहली बार के विधायक का मुख्यमंत्री बन जाना साधारण नहीं है। खासकर तब जब नरेन्द्र मोदी का दो बार का मुख्यमंत्री होना प्रधानमंत्री होने की उनकी योग्यता थी। पर पांच बार के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का पार्टी में क्या उपयोग होगा देखने लायक होगा। वे भैंरों सिंह शेखावत की तरह उपराष्ट्रपति बन सकते हैं या जगदीप धनखड़ को उपराष्ट्रपति बनाने के अलग कारण हैं।

अखबारों (मीडिया) में ऐसी चर्चा अब नहीं के बराबर होती है। और साफ दिख रहा है कि न सिर्फ संघ परिवार बल्कि मीडिया ने भी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह को खुली छूट दे रखी है और उनका शासन न सिर्फ प्रेस कांफ्रेंस मुक्त है बल्कि सवाल मुक्त भी है। मैंने कल लिखा था अनुच्छेद 370 पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर हिन्दुस्तान टाइम्स ने प्रधानमंत्री को अपनी प्रशंसा खुद करने के लिए मंच, माइक और श्रोता मुहैया कराया था। आज पहली बार के विधायक को मुख्यमंत्री बनाये जाने की खबर के शीर्षक में इस तथ्य का उल्लेख तो है पर कोई दूसरी खबर या टिपपणी नहीं है। आप जानते हैं कि कल की खबर ट्वीटर पर भी थी या वहां से ली गई थी जिसे प्रधानमंत्री की फोटो और नाम से उनके एक्सक्लूसिव लेख की तरह छापा गया था। ऐसा नहीं है कि आज पहली बार के विधायक को मुख्यमंत्री बनाने से संबंधित कोई दूसरी खबर या ट्वीट ही नहीं है। उसपर आने से पहले कुछ और अखबारों के शीर्षक देख लूं।

द हिन्दू में और सीधा सरल शीर्षक है, भजन लाल शर्मा राजस्थान के नये मुख्यमंत्री होंगे। उपशीर्षक है, भाजपा ने जयपुर के सांगानेर से पहली बार के विधायक को राज्य का नेतृत्व करने के लिए चुना। 56 साल की इस हस्ती ने पार्टी के महासचिव के रूप में काम या है। दीया कुमारी और प्रेम चंद बैरवा उप मुख्यमंत्री होंगे। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, पहली बार के विधायक भजनलाल 33 साल में राजस्थान के पहले ब्राह्मण मुख्यमंत्री होंगे। दीया कुमारी और प्रेम चंद बैरवा उप मुख्यमंत्री होंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि, 33 साल में राजस्थान के पहले ब्राह्मण मुख्यमंत्री होंगे – इस खबर की खास जानकारी है। और मेरे अखबारों में सिर्फ टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे शीर्षक में बताया है। यहां मुख्य खबर के साथ मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री का यह बयान भी है, अपने लिए कुछ मांगने की बजाय मैं मर जाना पसंद करूंगा। कहने की जरूरत नहीं है कि व्यापम के बावजूद कांग्रेस की सरकार गिराकर बनी सरकार चलाने के लिए शिवारज सिंह चौहान की सेवा ली गई और इस बार पार्टी अगर उनके बिना या उनके बावजूद चुनाव जीत गई है तो उन्हें छोड़ दिया गया। भाजपा के लिए यह चाहे आम हो या खास – खबर तो बड़ी है लेकिन पहले पन्ने पर यहीं है।

राजस्थान के पहले ब्राह्मण सीएम की बात छिड़ी है तो यह बताना उपयुक्त होगा कि नए मुख्यमंत्रियों से भाजपा इंडिया समूह की जातिवार जनगणना और अन्य सवालों के प्रभावों का मुकाबला करना चाहती है। संभव है, इसी आड़ में मुख्यमंत्री नहीं बनाये गये वरिष्ठ नेताओं को संतुष्ट किया गया हो या उनका समर्थन लिया गया हो। पर यह कितने दिन चलेगा या यह विश्वास कितने दिन बना रहेगा, उसपर शक है। हालांकि 2024 का चुनाव जीतने का प्रधानमंत्री का कांफिडेंस इस कारण भी हो सकता है। लेकिन मीडिया में ऐसे मुददों की चर्चा नहीं हो तो बात अखरती है। यहां गौरतलब है कि द हिन्दू ने मुख्य खबर के साथ जो सिंगल कॉलम की खबर छापी है वह आज मोहन यादव के शपथ लेने की है। इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर का शीर्षक है, भाजपा ने राजस्थान में एक बार फिर चौंकाया: पहली बार के विधायक मुख्यमंत्री होंगे। अखबार में इसके साथ दो खबरें हैं। एक का शीर्षक बताता है कि मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा वसुंधरा राजे ने की और कौन उपमुख्यमंत्री बनेंगे। पर दूसरी खबर ज्यादा दिलचस्प है। इसका शीर्षक है, अंतिम पंक्ति से केंद्र में, सरपंच से मुख्यमंत्री।

इस शीर्षक से मुझे प्रधानमंत्री के साथ एक समूह की तस्वीर याद आ रही है जिसमें नीरव मोदी भी थे। बाद में लंबे समय तक मीडिया की दुनिया के केंद्र में रहे। आज कल कहां हैं, पता नहीं। इस खबर के जरिये नए मुख्यमंत्री के भूत, भविष्य और वर्तमान को बताने की कोशिश की गई है लेकिन विज्ञापनों से भरे पहले पन्ने में ऐसी खबरों के लिए जगह निकालना वाकई मुश्किल है। खासकर तब जब विज्ञापन इसीलिये या ऐसे ही हों। द टेलीग्राफ में इस खबर का शीर्षक है, भाजपा के पुराने लोगों में सब बाहर। इसका फ्लैग शीर्षक है, राजस्थान के मुख्यमंत्री की पसंद से मोदी ने पूरा नियंत्रण हासिल किया। मुझे लगता है कि इस शीर्षक और तथ्य से नरेन्द्र मोदी की मजबूती या लोकप्रियता का पता चलता है पर आज की खबरों में इस तथ्य को भी हाईलाइट नहीं किया गया है। समझना मुश्किल नहीं है, क्यों? पर मुद्दा यह नहीं है। मुद्दा यह है कि तीनों राज्यों में भाजपा की अप्रत्याशित जीत और फिर लगभग अनजाने मुख्यमंत्री – लेकिन मीडिया का यह आरोप नहीं लगा रहा है कि केंद्र ने मुख्यमंत्री थोप दिये।

यही नहीं, मुख्यमंत्री पद के दावेदार नाराज नहीं हैं, उन्हें आलाकमान से शिकायत नहीं है और क्यों नहीं है, यह भी अखबार नहीं बता रहे हैं। ऐसे किसी नेता को अखबार अपना मंच, माइक औऱ श्रोता क्यों नहीं मुहैया कराते? संभव है कि वे परम संतुष्ट हों, उन्हें कुछ कहना नहीं हो, आलाकमान से कोई शिकायत नहीं हो और वे आंख बंद करके नरेन्द्र मोदी व अमित शाह का नेतृत्व मानते हों – पर यह खबर तो है ही। इस पर कुछ नहीं, किसी भी तरह से नहीं। यह तो मुद्दा है ही। उदाहरण नरेन्द्र तोमर का लीजिये। वे भाजपा के कुछ दुर्लभ नेताओं में हैं जो 2014 के बाद से लगभग लगातार मंत्री हैं। उनके बेटे का वीडियो पर्याप्त नुकसानदेह है। उसकी जांच उनकी मांग के बावजूद नहीं हुई। वीडियो आने के बाद उन्हें विधायक बना दिया गया। सांसद पद से इस्तीफा देने के लिए कहा गया। उनका कद तो छोटा हो ही गया। उनके लिए यह सजा हो सकती है। पर इसकी चर्चा नहीं है। खासर इसलिये भी कि जिस पैसे की बात वीडियो में हो रही थी वह उनका है या किसी और का?

पूरी मीडिया, पूरा सोशल मीडिया कांग्रेस सांसद के ठीकानों से छापे में मिले 350 करोड़ रुपये के पीछे परेशान है लेकिन सैकड़ों करोड़ की चर्चा करने वाले इस वीडियो से किसी को दिक्कत नहीं है। कोई नहीं कह रहा है कि नरेन्द्र तोमर ने जब खुद जांच कराने की मांग की है तो जांच क्यों नहीं हो रही है और प्रधानमंत्री (जैसे कांग्रेस सांसद के मामले में राहुल गांधी) क्यों नहीं बोल रहे हैं। यहां गौर तलब है कि कांग्रेस सांसद के मामले में कांग्रेस और राहुल गांधी को तो बोलना चाहिये जबकि जांच चल रही है, जांच पूरी नहीं हुई है और उसमें किसी अपराध का मामला दर्ज नहीं हुआ है। लेकिन सत्तारूढ़ दल के नेता पर आरोप की जांच नहीं होना अलग मामला है।

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