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आज के इस दौर में आपको कार्ल मार्क्स नहीं तो और किसको पढ़ना चाहिए?

Sushobhit-

कार्ल मार्क्स के दर्शन में कुछ केंद्रीय-विचार हैं, जिन पर मार्क्सवाद का भव्य और स्वाभिमानी भवन निर्मित हुआ है। अगर आप इन बीज-विचारों को समझ लेंगे तो मार्क्सवाद की अंत:क्रियाएँ आपको समझ आ जाएँगी। ये हैं- इतिहास, वैज्ञानिकता, भौतिकवाद, द्वंद्व, अंतरराष्ट्रीयवाद और प्रगतिशीलता। आएँ, इन्हें एक-एक कर देखें।

इतिहास यानी क्या? मार्क्स ने बताया था कि इतिहास केवल कुछ अराजक और अनियमित घटनाओं का संकलन नहीं है, न ही वह केवल शासकों, सामंतों और धनपतियों की वंशावली है। बल्कि इतिहास एक जीवंत प्रक्रिया है, जो निरंतर एक तार्किक निष्कर्ष की ओर बढ़ती रहती है। यह बहुत कुछ चार्ल्स डार्विन के एवॅल्यूशनरी प्रिंसिपल की तरह है। संयोग से मार्क्स और डार्विन समकालीन थे और उनके बीच निरंतर ख़तो-किताबत होती थी। एंगेल्स ने कहा है कि जैसे डार्विन ने ऑर्गैनिक नेचर के विकासवादी नियमों का उद्घाटन किया था, उसी तरह से मार्क्स ने मानवीय-इतिहास के विकासवादी नियमों का पथ प्रशस्त किया था।

इतिहास मनुष्यों से विलग नहीं है और मनुष्यों की दोहन और शोषण की प्रवृत्तियाँ इतिहास पर हावी रहती हैं। कम्युनिस्ट मैनिफ़ेस्टो का आरम्भ ही इस विचार से होता है कि मनुष्यजाति का समूचा इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है। अगर आप इतिहास की वैज्ञानिक व्याख्या करें, तथ्यों का संकलन करें, उनका वस्तुनिष्ठ विश्लेषण करें तो आप न केवल कुछ निष्कर्षों पर पहुँचेंगे, बल्कि भविष्य के पूर्वानुमान भी लगा सकेंगे।

यह मार्क्स के दर्शन में निहित वैज्ञानिकता और भौतिकता ही है, जिसके चलते उन्होंने अधिभौतिकता (मेटाफिजिक्स), पौराणिकता, मिथकीयता, कल्पनाओं, अटकलों, स्यूडो-साइंस आदि का पूर्ण-निषेध किया और दृढ़ता से यह कहा कि जो विचार वैज्ञानिक मानकों पर खरा या सिद्ध नहीं है, वह त्याज्य है। मार्क्सवाद के इस अश्वमेध में धर्म और ईश्वर की कपोल-कल्पनाओं की क्षति तो होनी ही थी।

मार्क्स ने समाजशास्त्र को समाज-विज्ञान में परिणत करने में केंद्रीय भूमिका निभाई थी। लेनिन ने कहा है कि मार्क्स की रीति इतनी तार्किक और वैज्ञानिक थी कि उनके द्वारा बनाई थ्योरी समाज-विज्ञान के क्षेत्र में अंतिम-वाक्य सिद्ध हुई थी। इस थ्योरी का आकर्षण इसमें निहित था कि यह सांयोगिकताओं से नहीं, बल्कि एक स्वाभाविक तर्कशीलता के साथ निर्मित हुई थी।

लेकिन जहाँ- बक़ौल लेनिन- मार्क्स की थ्योरी समाज-विज्ञान के क्षेत्र में ‘अंतिम-वाक्य’ थी, वहीं वह आप्तवाक्य नहीं थी, क्योंकि मार्क्सवाद एक प्रगतिशील दर्शन है। यह डॉग्मा नहीं है, कमांडमेंट नहीं है, राजाज्ञा नहीं है, उपदेश नहीं है। यह एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है और यह इतिहास के सभी चरणों में स्वयं को पुनराविष्कृत करती है। यही कारण है कि 19वीं सदी में मार्क्स और एंगेल्स ने जिस थ्योरी का प्रतिपादन किया था और 20वीं सदी में लेनिन ने जिसे प्रभावशील बनाया था, उसका एक्सटीरियर 21वीं सदी में भिन्न होगा, लेकिन उसकी सैद्धांतिक-अंतर्वस्तु पूर्ववत् होगी।

दुनिया का कोई भी प्रतिक्रियावादी विचार- विशेषकर राष्ट्रवाद और साम्प्रदायिकता- प्रगतिशील नहीं हो सकते। क्योंकि वे पहले ही निष्कर्षों पर पहुँच चुके हैं और यथास्थिति को बनाए रखने के लिए व्याकुल हैं। जबकि मार्क्सवाद में निहित प्रोग्रेसिव-स्पिरिट ही उसे एक क्रांतिकारी दर्शन बनाती है। वह स्टेटस-कोइस्ट विचार नहीं है। इसीलिए एक मार्क्सवादी का काम कभी ख़त्म नहीं होता, क्योंकि सभ्यता की समीक्षा, इतिहास की विवेचना और सामाजिक-संरचनाओं का विश्लेषण एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है। मार्क्सवाद बौद्धिक रूप से क़ाहिलों के लिए नहीं, परिश्रमियों और विप्लवियों के लिए है।

अब बच गया अंतरराष्ट्रीयवाद तो समझ लें कि यह मार्क्सवाद का बुनियादी विचार है, इन अर्थों में कि प्रतिक्रियावाद का स्वरूप हमेशा स्थानीय होता है- जातीय अस्मिता, राष्ट्रगौरव, पुरातन रीतियों, संरचनाओं और परम्पराओं का मोह। जबकि मार्क्सवाद एक कॉस्मोपोलिटन विचार है और उसमें भी विशेषकर वर्किंग क्लास (कामगार) को वह एक ही राष्ट्र का नागरिक मानता है- यह राष्ट्र समूचा संसार है। इसीलिए मार्क्स ने दुनिया के मज़दूरों से एक होने का आह्वान किया था, जर्मनी के मज़दूरों भर से नहीं, इंग्लैंड के कारख़ानों के श्रमिकों भर से नहीं, फ्रांस के सोशलिस्टों भर से नहीं, रूस के भूदासों भर से नहीं। मार्क्सवाद का अंतिम लक्ष्य मानवमुक्ति है और इसमें स्त्रीमुक्ति (वीमेन्स इमेन्सिपेशन जो कि लेनिनवाद की केंद्रीय प्रतिज्ञा थी) भी समाहित है।

मार्क्स से पहले भी दुनिया में यदा-कदा मज़दूर आंदोलन होते थे, लेकिन उनके पास कोई सुचिंतित विचार-प्रक्रिया और वैज्ञानिक दिशानिर्देश नहीं थे, जिससे वे विफल हो जाते थे। राजा ईश्वर का स्वघोषित प्रतिनिधि बन गया था और शोषक अपनी लिप्सा पर भाग्यवादी मुलम्मा चढ़ा देता था। मार्क्स और एंगेल्स ने इस प्रवंचना का पर्दाफ़ाश करके सर्वहारा को एकजुट किया। मार्क्स यूटोपिया शब्द को बहुत पसंद नहीं करते थे, क्योंकि इसमें एक असम्भव, भविष्यवादी स्वर था, जबकि वर्गविहीन, समाजवादी समाज उनके लिए एक अवश्यम्भावी वास्तविकता थी।

हर वो विचार जो शोषण के तंत्र को मज़बूत बनाता हो और समाज में वैचारिक-आलोड़न को बाधित करता हो- जैसे कि वर्तमान में उपभोक्तावाद, सांस्कृतिक-राष्ट्रवाद और सोशल मीडिया विरचित पोस्ट ट्रुथ- वह निर्मम और वस्तुनिष्ठ विश्लेषण का पात्र होकर प्रश्नांकित करने योग्य है- यह मार्क्सवाद की बुनियादी सोच है और यह सोच सदियों तक प्रासंगिक रहने वाली है।

विचारहीनता, अतार्किकता, पौराणिकता, आर्थिक विषमता, सामाजिक विभेद और शोषण के सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूपों से भरे वर्तमान समाज में अगर आपको कार्ल मार्क्स नहीं तो और किसको पढ़ना चाहिए?

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