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कर्नाटक के रेस्त्रां में विस्फोट और पुलवामा की याद अखबारों में नहीं है

अखबारों में आज सरकारी खबरों और प्रचार की भरमार है

संजय कुमार सिंह

मीडिया का एक बड़ा हिस्सा जब केंद्र की भाजपा सरकार के समर्थन में है तो यह याद रखना चाहिये कि पुलवामा 14 फरवरी को हुआ था। इस बार अभी तक ऐसा कुछ नहीं हुआ है और प्रधानमंत्री गंभीर रूप से मुद्दे की तलाश में हैं। आज के अखबारों से उनका यह प्रयास दिख रहा है और इसलिए इस बार सभी खबरों को इसी नजर से देखना होगा। इस लिहाज से कल बेंगलुरू के एक रेस्त्रां में हुआ विस्फोट सामान्य नहीं है। खासकर तब जब भाजपा दावा करती है कि वह सत्ता में हो तो दंगे-विस्फोट नहीं होते हैं। तथ्य यह भी है कि कपड़ों से पहचाने जाने वाले लोग दंगा कराने की जुगत में पकड़े जाते रहे है। उनपर क्या कार्रवाई हुई इसे प्रचारित नहीं किया जाता है। आप जानते हैं कि कुल मिलाकर, खबर और प्रचार का अंतर कम हुआ है और पहले पैसे देकर खबर को विज्ञापन के रूप में छपवाना पेड न्यूज कहा जाता था तो अब बहुत सारी खबरें पेड न्यूज होती हैं।

पतंजलि के भ्रामक विज्ञापन और उसका गोरखधंधा हम जान चुके हैं। सरकारी विज्ञापनों की बात ही निराली है। इसलिए अभी सिर्फ आज छपी खबरों की बातचीत। इसमें सबसे महत्वपूर्ण है तीन टेलीविजन चैनल पर जुर्माना लगाने की खबर देर से ही सही, आज इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर छपी है। यहां तथ्य यह भी है कि इमरजेंसी में और उसके बाद भी खबरों पर सेंसर का विरोध किये जाने के मद्देनजर टेलीविजन की खबरों पर सरकारी नियंत्रण घोषित तौर पर नहीं है और स्वनियमन को प्रोत्साहित किया जाता रहा है। ऐसे में न्यूज ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड अथॉरिटी (एनबीडीएसए) ने तीन टेलीविजन चैनल पर जुर्माना लगाया है और घृणा फैलाने वाले शो के वीडियो हटाने के लिए कहा है। यह आदेश 28 फरवरी को हुई बैठक के बाद का है। यह खबर आज सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर छपी है। मेरे सात अखबारों में 29 फरवरी और एक मार्च को नहीं छपी।

समाचार चैनलों पर जुर्माना

कहने की जरूरत नहीं है कि ऐसे शो से पैसा कमाने वाले चैनल के लिए मामूली आर्थिक जुर्माने का कोई मतलब नहीं है ना ही उससे समाज को होने वाले नुकसान की भरपाई हो सकती है। फिर भी जुर्माना ही लगाया गया है और उसकी भी खबर नहीं है जबकि पहले कहा जाता था कि उसी चैनल पर उसी समय यह खबर एक से ज्यादा बार दी जाए। अगस्त 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा था कि एक लाख रुपये की फाइन अप्रभावी है और इसे बढ़ाया जाना चाहिये जो उल्लंघन की गंभीरता और चुकाने की मीडिया इकाई की क्षमता के अनुकूल हो। इस तरह कहा जा सकता है कि इमरजेंसी में अगर खबरें सेंसर होती थीं, उस पर मीडिया को एतराज था तो अब मीडिया मनमानी खबरें छापता है, सरकार के समर्थन में बिछा हुआ है और अपने खिलाफ खबरें छापने की उम्मीद तो छोड़िये मामूली जुर्माने की खबर भी छिपाता है। लोकसभा का अगला चुनाव मीडिया की इस सेवा और समर्थन के बीच होने की उम्मीद है। 

कपड़ों से पहचाने जाने वाले

बेंगलुरू के कैफे में ब्लास्ट की खबर आज द हिन्दू और इंडियन एक्सप्रेस में लीड है, बाकी अखबारों में पहले पन्ने पर है लेकिन अमर उजाला और द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नहीं है। द टेलीग्राफ में ढाका के एक रेस्त्रां में आग लगने और 46 लोगों की मौत की खबर है जो दिल्ली के दूसरे अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। अकेले इंडियन एक्सप्रेस ने शीर्षक में बताया है कि टोपी, मास्क लगाया एक व्यक्ति इस मामले में संदिग्ध है। द हिन्दू की खबर के शीर्षक का एक बुलेट प्वाइंट है, शहर की सुरक्षा का आश्वासन देते हुए उप मुख्यमंत्री ने कहा, जांच चल रही है और घटना को राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिये। इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, एनआईए ने पुलिस के साथ मिलकर इस घटना की जांच शुरू कर दी है।

प्रधान प्रचारक और चुनाव प्रचार

आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री कल पश्चिम बंगाल में थे और उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से भी हुई। कोलकाता के दैनिक, द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है। मुख्य शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने बंगाल के लिए चुनावी योजनाओं का खुलासा किया। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, भाषण में राम और संदेशखाली प्रभावी रहे। प्रधानमंत्री से मुलाकात पर मुख्यमंत्री ने कहा, हमलोगों ने खूब बातें कीं, अखबार में लीड के साथ छपी सिंगल कॉलम की खबर है। दिल्ली में टाइम्स ऑफ इंडिया ने इसे लीड के बराबर, टॉप पर दो कॉलम में छापा है। शीर्षक है, बंगाल में परिवर्तन के लिए मोदी की चुनावी अपील में  संदेशखाली की गूंज। अखबार की आज की लीड भी सरकार के प्रचार में है। इसके अनुसार, जीडीपी के आंकड़ों ने सेनसेक्स और निफ्टी को नई उंचाइयों पर पहुंचाया। इंट्रो है, बीएसई का मार्केट कैपिटल करीब 400 लाख करोड़ हुआ।

संदेशखाली का भाजपाई मुद्दा

हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, संदेशखाली में अपराध को लेकर मोदी ने टीएमसी, इंडिया गठबंधन की आलोचना की। अमर उजाला ने इसे लीड बनाया है और  शीर्षक है, संदेशखाली से देश आक्रोशित, दीदी ने दोषी को बचाने में लगाई ताकत : मोदी। उपशीर्षक है, पीएम बोले – शर्म आनी चाहिये ….. इस घटना पर विपक्षी गठबंधन ने बंद कर लिये आंख-कान-मुंह।  यह दिलचस्प है कि प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा और अमर उजाला ने ही नहीं, टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी इसे प्रमुखता से छापा है। तथ्य यह है कि संबंधित विधायक को  गिरफ्तार किया जा चुका है, पार्टी ने उनकी सदस्यता छह साल के लिए निलंबित कर दी है और कार्रवाई चल रही है। जब यह सब हो ही रहा था (और भाजपा लगी ही हुई थी) तो विपक्षी गठबंधन के लिए बोलने की कोई जरूरत नहीं थी। फिर भी प्रधानमंत्री यह सब बोल रहे हैं जबकि उन्होंने अपने आरोपी सांसद को बचा ही नहीं लिया उनके बेटे को संगठन पर काबिज भी होने दिया।

संदेशखाली पर इंडियन एक्सप्रेस

संदेशखाली की खबर को इंडियन एक्सप्रेस ने भी टाइम्स ऑफ इंडिया की तरह लीड के बराबर मेंदो कॉलम में छापा है। इसका शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने ममता पर हमला बोला संदेशखाली के अभियुक्त को बचाया … प्रत्येक जख्म का जवाब बोट से दीजिये। यह पुलवामा पर पहली बार वोट देने वालों से की गई अपील जैसा लगता है। अखबार ने लिखा है कि प्रधानप्रचारक ने इंडिया ब्लॉक की चुप्पी पर सवाल उठाया और दावा किया कि भाजपा के दबाव में गिरफ्तारी हुई। अखबार ने इसके साथ एक और खबर छापी है। इसका शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, संदेशखाली विवाद ने क्यों आमतौर पर निडर रहने वाले तृणमूल को कोने में धकेल दिया। अखबार ने इसमें जो उदाहरण दिये हैं उससे पता चलता है कि अदालतों पर सरकार का दबाव नहीं था जबकि गुजरात और भाजपा सरकार के मामलों में जजों को ईनाम देने और जज की संदिग्ध मौत की जांच नहीं कराने जैसे मामले हैं। संदेशखाली को मीडिया ने भी मुद्दा बनाये रखा जबकि राहुल गांधी की यात्रा को मीडिया में नहीं के बराबर जगह मिलती है और जो मिलती है वह विरोधी खबरों की होती है।  

हिमाचल प्रदेश – जो हुआ उसके बाद

हिमाचल प्रदेश में जो हुआ उसके बाद मोटे तौर पर सरकार गिरने की आशंका फिलहाल नहीं है और इस आशय की खबरें छप चुकी हैं लेकिन देश को कांग्रेस मुक्त बनाते-बनाते नरेन्द्र मोदी ने जब भाजपा को कांग्रेस युक्त बना दिया है और भाजपा में संघ के लोगों की उपेक्षा करके इन्हें पद और ईनाम मिलने पर भी नरेन्द्र मोदी के समर्थक खुश है तो आज इंडियन एक्सप्रेस ने पहले पन्ने पर छपी एक खबर से बताया है कि हिमाचल प्रदेश से राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस नेता और अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी के खिलाफ वोट दिये जाने का अंदेशा सिंघवी और कांग्रेस आलाकमान को हफ्ते भर पहले से था। पर संख्या बल पक्ष में होने के कारण आत्मविश्वास और गलत गणना से गड़बड़ी हुई। कल मैंने लिखा था कि मोदी की गारंटी के प्रचार के बावजूद कांग्रेस के खिलाफ और भाजपा के पक्ष में वोट डालने वाले कांग्रेस के विधायकों की सदस्यता चली गई है। इस मामले में अदालत से राहत नहीं मिली तो उन्हें फिर से चुनाव लड़ना पड़ेगा और एक बार जीतने के सारे लाभ जाते रहेंगे। दूसरी ओर, हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि एक मंत्री ने बागियों से मुलाकात की है जिससे इस मामले को नया मोड़ मिला है। हालांकि, ईडी की सक्रियता के बीच इसका कारण और उनकी परेशानी समझना मुश्किल नहीं है।    

पेड न्यूज की समस्या

यह कोई एक मामला नहीं है ऐसे कई मामले हैं। फर्क सिर्फ यह है कि अगर वहां आरोपी मुस्लिम था और पीड़ित हिन्दू तो यहां दोनों ही हिन्दू थे। यहां जेएनयू में चेहरा ढंक कर हमला करने वाली शर्मा जी की बिटिया को भी याद किया जा सकता है जो पुलिस को अभी तक नहीं मिली। देश में ऐसी व्यवस्था को संरक्षण देने और कांग्रेस पर देश को बांटने का आरोप लगाने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पश्चिम बंगाल में कहा और अमर उजाला ने पहले पन्ने पर छापा है, आज रो रही होगी राजा राम मोहन राय की आत्मा – इस धरती पर राजा राम मोहन राय ने जन्म लिया जिन्होंने नारी शक्ति को न्याया और सामर्थ्य दिया। लेकिन संदेशखाली में इन लोगों के कारनामे देखकर राजा राम मोहन राय की आत्मा आज जहां भी होगी, अत्यंत दुखी होगी और रोती होगी। यह नरेन्द्र मोदी की ही हस्ती है कि देश के लिए पदक जीतने वाली बेटियों के यौन शोषण के मामले में अपने सांसद का भरपूर बचाव करके भी बंगाल में राम मोहन राय को याद कर लेते हैं। अखबार उनके एक ही पक्ष को दिखाते हैं तो यह तय करना मुश्किल है कि यह पेड न्यूज नहीं है, तो पहले पन्ने पर क्यों है?

पेटीएम के मामला

पेटीएम के मामला आप जानते हैं। नोटबंदी के बाद प्रधानमंत्री की प्रशंसा वाला उसका विज्ञापन और फिर उसे मिली कामयाबी, शेयर बाजार में सफलता, उतार-चढ़ाव आदि। यह सब रिजर्व बैंक की इस घोषणा के बाद हुआ है कि कंपनी ने उसके आदेश नहीं माने। इससे शेयर बाजार में उसे जो नुकसान हुआ हो, आदेशन नहीं मानने के मामले में कोई कार्रवाई नहीं हुई है। उल्टे रिजर्व बैंक को लगाई गई रोक की तारीख बढ़ानी पड़ी। ऐसे में आज अमर उजाला में पहले पन्ने पर एक खबर है, मनी लांड्रिंग में फंसा पेटीएम पेमेंट्स बैंक, 5.49 करोड़ रुपये का जुर्माना। उपशीर्षक है, जुए और अवैध कमाई की रकम बैंक खाते से होती थी ट्रांसफर। खबर के अनुसार पेटीएम के खिलाफ मनी लांड्रिंग का भी मामला है। पर किसी कार्रवाई या गिरफ्तारी की खबर नहीं है जबकि विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार करने में देरी नहीं होती। नरेन्द्र मोदी की कथनी और करनी के इस अंतर को बताना जरूरी है क्योंकि वे यह दावा भी कर रहे हैं कि देश को मोदी की गारंटी पर भरोसा है। 15 लाख, सपनों का भारत, चौराहे पर आने, झोला उठाकर चल देने, ना खाउंगा ना खाने दूंगा और वाशिंग मशीन पार्टी आदि के बाद भी इस दावे का मतलब समझा जा सकता है पर वे ऐसा कह रहे हैं और रैली में जनता ताली बजाती तो बजाती, अखबार पहले पन्ने पर प्रमुखता से छापकर नेता के झूठे दावे को जनता तक पहुंचा रहे हैं।   

दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय

अखबारों में अर्थव्यवस्था, जीडीपी और जीएसटी संग्रह बढ़ने का प्रचार भी रहता है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड यही है। जीएसटी कलेक्शन बढ़ने की खबर हर महीने की पहली तारीख को आती और दो को छपती ही है, कई महीनों से। इसमें मुद्दा यह है कि जीएसटी की दर और बहुत सारी सेवाओं पर जीएसटी लागू किये जाने से वसूली बढ़ी है और अगर सब कुछ अच्छा है, जैसा दावा किया जाता है तो टैक्स दर कम किया जाना चाहिये, रेल यात्रा महंगी क्यों की जा रही है और वरिष्ठ नागरिकों की छूट तक बहाल नहीं की जा सकी है। ऐसे में सामान्य सा सवाल है कि सब ठीक या अच्छा होने का फयदा क्या है? जाहिर है सब ठीक होने का दावा प्रचार है और खबरों को दी जा रही प्रमुखता सरकार को मीडिया का सहयोग। दूसरी ओर, तथ्य यह भी है कि दिल्ली में प्रति व्यक्ति आय दो साल में 22.77 प्रतिशत बढ़ी है। जो हालात हैं उसमें यह बड़ी बात है। केंद्र सरकार इसका श्रेय लेना नहीं चाहती है या नहीं ले सकती है इसलिए यह खबर आज कम ही अखबारों (नवोदय टाइम्स, अमर उजाला, हिन्दुस्तान टाइम्स) में है। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड या उसके साथ की खबरों में इस तथ्य का उल्लेख प्रमुखता से नहीं है। इस मजबूरी को आप समझ सकते हैं। 

छापे में मिला काला’ धन कमाया कैसे गया

हिन्दी के मेरे दोनों अखबारों में आज कानपुर की एक तंबाकू कंपनी पर छापे की खबर प्रमुखता से छपी है। इसके अलावा महादेव ऐप्प और उसके 580 करोड़ रुपये जब्त किये जाने की खबर भी प्रमुखता से है। संभव है, यह कार्रवाई और कम से कम इस खबर को मिली प्रमुखता सरकार की ईमादनारी दिखाने की कोशिश हो और चुनाव के समय इस तरह की कार्रवाई का मकसद कुछ और हो भी नहीं सकता है। लेकिन मुद्दा यह है कि चुनाव के समय काले धन की जरूरत सभी दलों को होती है और यह वर्षों से चला आ रहा है। भाजपा इलेक्टोरल बांड से भारी वसूली करके दूसरों के कथित काले धन पर रोक लगाने की कोशिश असल में उन्हें चुनावी तौर पर कमजोर करने के लिए कर रही है। यही नहीं, इस तरह के छापों और कार्रवाई का असर उद्योग धंधों पर होता है जबकि सरकार या देश को कोई लाभ नहीं होता है। उदाहरण के लिए कांग्रेस के सांसद के यहां 350 करोड़ रुपये की नकद बरामदगी का मामला है। इसमें प्रचार ज्यादा हुआ पर कार्रवाई नहीं हुई। साफ है मकसद टैक्स वसूली नहीं बदनाम करना था। दूसरी ओर तंबाकू कंपनी के पास अगर काला धन मिला है तो वह पिछले 10 साल में कमाया ही है। सवाल है कि यह कैसे हो पाया? लेकिन मीडिया सिर्फ सरकारी पक्ष छाप कर सरकार का प्रचार कर रहा है। संबंधित सवालों के बिना ये खबरें,  जो इस समय सरकार का प्रचार हैं और ऐसा आम आदमी को समझ में नहीं आये – यह तो संभव है लेकिन पत्रकारों, संपादकों को कैसे नहीं आयेगा?

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