
सुनील चतुर्वेदी-
खर्च कम, आमदनी ज्यादा फिर भी बाबू ठन-ठन गोपाल! लो भला ऐसा भी कहीं होता है! कुछ तो भी!
मेरी बात पर ऐसा संदेह तो तब लाजमी है जब यह पता हो कि पानी का सालाना खर्च कितना है और बरसात का कितना पानी छत, खेत या गाँव, शहर में आता है यानी आमदनी कितनी है। कोई जानता होगा, कोई नहीं भी और कोई आधा-अधूरा। तो चलो आज इसकी भी पड़ताल कर ली जाय।

बरसात के सीजन में जितना पानी ज़मीन पर आता है उसका लगभग 70-80 प्रतिशत पानी गाँव, खेत, मैदानों से व्यर्थ बहकर चला जाता है जो सड़कों पर भरता है और नदी, नालों में बाढ़ का कारण बनता है। शहरी क्षेत्र में घरों की छत से तो कुल वर्षा का 90 प्रतिशत पानी बहकर निकल जाता है।
अब सवाल है आख़िर बरसात के मौसम में हमारे खेत, मैदान में कितना पानी गिरता है? यह पता करना कोई कठिन पहेली नहीं है। आप आयतन निकालना जानते हैं तो आने वाले पानी की मात्रा निकाल सकते हैं। इसके लिये आपको दो आँकड़े पता होना चाहिये। एक- आपके गाँव, शहर, खेत, छत का क्षेत्रफल, दूसरा-आपके यहाँ की औसत वर्षा।
उदाहरण के लिये औसत वर्षा 1 मीटर है तो एक हेक्टेयर ज़मीन पर लगभग पूरे बारिश के मौसम में 1 करोड़ लीटर पानी आयेगा और इसमें से क़रीब 70-80 लाख लीटर पानी उस क्षेत्र से बहकर व्यर्थ चला जाता है। ठीक इसी तरह शहरी क्षेत्र में 100 वर्ग मीटर की छत पर 1 मीटर बारिश होने पर 90 हज़ार लीटर पानी बह जाता है।
आप अन्दाज़ लगा सकते हैं कि यदि आपके गाँव, शहर का क्षेत्रफल 1000 हेक्टेयर है तो कितना पानी हर साल आपके गाँव शहर से बहकर चला जाता है। निश्चित रूप से व्यर्थ बहकर जाने वाले वर्षाजल की मात्रा आपकी ज़रूरत से कहीं ज्यादा है।
इसका मतलब तो यह हुआ कि हमारे पास पानी का संकट नहीं है असल समस्या है हम बरसात के मौसम में आने वाले पानी को रोक नहीं पा रहे हैं। यदि हम इस व्यर्थ बहने वाले वर्षा जल का 60-65 प्रतिशत पानी भी रोक लें तो जल संकट का समाधान हो सकता है।
यहाँ एक बात और जान लें कि आदर्श स्थिति में कुल बारिश का 6 प्रतिशत पानी प्राकृतिक रूप से रिसकर भू-जल स्तर तक पहुँचता है। वर्तमान में सीमेंट कंकरीट के जंगल खड़े हो जाने से ज़मीन में रिसकर नीचे पहुँचने वाले इस पानी की मात्रा और कितनी कम हो गयी होगी!
इस कारण ज़मीन के नीचे पानी की उपलब्धता और हमारी आवश्यकता के अनुपात में एक असंतुलन निर्मित हो गया। यदि हम वर्षाजल का कुछ हिस्सा सही रीचार्जिंग तकनीक अपनाकर ज़मीन के नीचे पहुँचा दें तो हमारा जल स्तर जो वर्तमान में उतार पर है फिर से ऊपर उठना शुरू हो जायेगा।
अब बताइये, यह मिसाल तो सच साबित हुई कि खर्च कम, आमदनी ज्यादा फिर भी बाबू ठन-ठन गोपाल!
अब सवाल है इस बहते वर्षाजल को कैसे रोकें? क्या आज से पहले भी वर्षाजल संरक्षण की हमारी कोई परंपरा रही है?
क्रमशः
जल साक्षरता (पार्ट 5) : पानी का ये गुण कोई दैवीय चमत्कार नहीं बल्कि वैज्ञानिक घटना है!


