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हिमाचल प्रदेश

चाय तक का ऑफर ठुकरा देने वाले पत्रकार मृत्युंजय पुरी के साथ खड़े होने का वक्त है!

अमृत तिवारी-

त्रकार मृत्युंजय पुरी के लिए खड़े होने का वक़्त है. ख़बर के बदले धन उगाही के आरोप को सीधा सच मान लेना बेवक़ूफ़ी होगी. हिमाचल में तक़रीबन सभी पत्रकारों पर विज्ञापन लाने का भारी बोझ होता है. अगला अगर विज्ञापन के नाम पर पैसा ले रहा है, तो इसमें बड़ी आसानी है कि आप उसे धन-उगाही के तौर पर ट्रैप कर लें. और ऊपर से पुरी के आला दर्जे वाले “शुभ-चिंतक” भी कम नहीं हैं.

जब मैं हिमाचल में समाचार फर्स्ट का संपादक था तो पुरी मेरे येहाँ रिपोर्टर थे. तब मेरी पत्रकारिता की शैली एग्रेसिव और उखाड़-पखाड़ वाली थी. मुझे तेज़-तर्रार रिपोर्टर की ज़रूरत थी. उस दौरान ये News18 के लिए काम करते थे. मेरे ही आग्रह पर इन्होंने मुझे जॉइन किया और हमने बेधड़क, बिना लाग-लपेट स्टोरीज़ चलाई. पराक्रम, नवनीत बत्ता और मृत्युंजय पुरी की तीकड़ी से हमने हिमाचल के भीतरखाने राजनीतिक गोलबंदियों से लेकर भ्रष्टाचार को जमकर उजागर किया. उभरते डिजिटल पत्रकारिता में हमने एक अलग ही कल्चर की शुरुआत की.

मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि उस दौरान पुरी ने लोअर हिमाचल में हमारे साथ मिलकर सिर्फ़ लंका लगाने वाली स्टोरीज़ कीं. क्या शासन और क्या प्रशासन. ग़लत को ग़लत कहने का साहस और ताक़त हमने दिखाया था. हमारे संस्थान से भी हमें पैसे की चिंता छोड़.

विशुद्ध पत्रकारिता करने की छूट मिली थी. इस बीच बाहर से कई ऑफ़र भी आते रहे. सरकारी तंत्र से भी आए. लेकिन, मृत्युंजय पुरी ने हर बात मुझे बताई. कौन बुला रहा है. कहां ऑफ़र दे रहा है. कितने के विज्ञापन का करार चाह रहा है…इत्यादि.

आप हैरान होंगे कि हर ऑफ़र हमने बद्दतमीजी के साथ ख़ारिज की. एक बड़े ही अहम पद पर बैठे बीजेपी के नेता ने हमसे सिर्फ़ चाय पीने की गुज़ारिश की. हमने चाय का ऑफ़र बेअंदाजी से ठुकरा दिया. इसके गवाह सूर्यवंशी और बंटी कचोट रहे हैं.

पिछले विधानसभा चुनाव की बात है. मृत्युंजय पुरी ने ही नगरोटा बगवां में बीजेपी की रैली की कलई खोल दी. जब जेपी नड्डा स्टेज पर थे. तब, रैली-स्थल से बाहर कैमरे पर फ़ेसबुक लाइव चल रहा था. प्रचार का ढोल फट गया. भारी भद्द पिटी थी. दूर-दूर तक संदेश गया कि हिमाचल में बीजेपी की हालत पंचर ही नहीं, महा-पस्त है. मुझे याद है पार्टी का स्थानीय ख़ेमा पुरी से भयंकर नाराज़ था. धमकी का दौर चला. दो-तीन धमकियाँ मेरे तक भी आईं. लेकिन, सामने वाले बंदे ने भी ठोककर चुनौती स्वीकार की थी.

कांग्रेस के नेता भी पुरी की कई स्टोरीज़ के शिकार हुए. एक कांग्रेसी मित्र ने मुझसे निजी तौर पर शिकायत की. कहा कि आपका रिपोर्ट सही से काम नहीं कर रहा. हमारे दो पंचायतों के प्रधानों को बेवजह तंग किया है. मैंने पुरी से जब पूछा तो पता चला कि प्रधानों ने सीसी रोड की चौड़ाई कम कर दी थी और नाली का हिस्सा छोड़ा ही नहीं था. मैंने तुरंत वो स्टोरी काँगड़ा वाले सेक्शन में चलवा दी. कांग्रेसी मित्र तब से लेकर आज तक नाराज़ हैं.

आख़िर में यही बात कहूँगा, मृत्युंजय के कई दुश्मन हैं. धारदार पत्रकारिता के चलते दोस्त कम और दुश्मन ज़्यादा कमाए हैं. विजिलेंस को बुलाना और चेक के साथ पैसा पकड़वाना एक बड़ी साज़िश का हिस्सा लगता है. मैं बतौर अमृत तिवारी हर हाल में मृत्युंजय पुरी के साथ खड़ा हूँ. डंके की चोट पर खड़ा हूँ. चाहें देश-प्रदेश की सत्ता बंदे के ख़िलाफ़ ही क्यों न हो… हर-हर महादेव.

मूल खबर…

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