
पत्रकारिता के क्षेत्र में किसी गैर हिंदी भाषी राज्य में हिंदी पत्रकारिता करने का अपना अलग ही मजा है। पहला तो यही कि प्रतिस्पर्धी कम मिलेंगे तो खुला मैदान है। खुलकर बैटिंग कीजिए। नए-नए प्रयोग कीजिए। बैनर प्रभावशाली होगा तो लोग आसानी से मिलते भी हैं। और हां सामग्री जुटाने में आपकी सहायता भी करते हैं। हां, सामग्री पठनीय होनी चाहिए क्योंकि अधिकांश पाठकगण आपको हिंदी बेल्ट में ही मिलेगा।
मेरे ओडिशा में रहते हुए पत्रकारिता के दौरान 2017 में भारतीय जनता पार्टी की दो दिवसीय राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक भुवनेश्वर में प्रस्तावित थी। उन दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा भाजपा के चाणक्य की उपाधि से नवाजे जा चुके अमित शाह पार्टी के अध्यक्ष थे। राज्य में ओडिया धरती का पुत्र कहे जाने वाले बीजू पटनायक के पुत्र नवीन पटनायक की सत्ता का परचम लहरा रहा था। उनकी पार्टी बीजू जनता दल ने 2014 के लोकसभा चुनाव में 21 में से 20 सीटें जीत ली थी।
राज्य में लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते हैं। तो विधानसभा की 147 सीटों में से 117 बीजू जनता दल और दस भाजपा के खाते में आयी थी। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी थी। यहां के धर्मेंद्र प्रधान (अब शिक्षामंत्री) बिहार से राज्यसभा भेजे गए थे। मोदी जी की कैबिनेट में वह पेट्रोलियम मंत्री बनाए गए थे। ओडिशा में भाजपा बेहद कमजोर पार्टी थी। जब पूरे देश में मोदी की लहर चल रही थी तब नवीन पटनायक ने ओडिशा में मोदी को तेजी से मिल रही बढ़त को रोक लिया था। विपक्षी दलों में पटनायक का डंका बज रहा था। लेकिन बीजू जनता दल के लोकसभा 20 सांसद और राज्यसभा में लगभग 9 सांसद भाजपा नीत एनडीए सरकार के प्रत्येक विधेयक में मोदी सरकार का समर्थन करते थे। ऐसा नवीन बाबू के निर्देश पर होता था। मोदी भी मंच पर उन्हें, मेरे परम मित्र कहा करते थे।
हालांकि, मीडिया से बीजद अध्यक्ष मुख्यमंत्री नवीन बाबू एनडीए और यूपीए से बराबर की दूरी बनाए रखने का बयान देते थे। पर दिल्ली में बाकायदा दोस्ती निभा रहे थे। वह ओडिया हित को सर्वोपरि बताया करते थे। उधर भाजपा धीरे-धीरे राज्य में मुख्य विपक्षी दल के रूप में बढ़त लेने में जुटा था। नवीन भाजपा के प्रति नरम थे तो भाजपा उनके प्रति गरम थी। ऐसा जनाधार तैयार करने की कवायद को लेकर बताया जाता रहा। मोदी-शाह की जोड़ी पूर्वी भारत के गैर हिंदी भाषी राज्य ओडिशा में पार्टी को मजबूत बनाने में जुटी थी। पूरी सरकार व संगठन के साथ ही भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री भी दो दिन के लिए ओडिशा में डेरा डाले थे।
प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी की नजर में यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के महत्व का एक उदाहरण यहीं पर देखने को मिला। योगी जी पहले रामकृष्ण मिशन के आश्रम में रुकना चाहते थे पर सुरक्षा कारणों से उन्हें एक अलीशान होटल में ठहराया गया था। राजभवन में खुद मोदी रुके थे। डिनर टेबल पर राजनाथ सिंह, नितिन गडकरी समेत कुछ पार्टी के दिग्गज नेता मोदी के साथ बैठे थे। मोदी ने सबसे कहा कि भई योगी जी कहां हैं? बुलाइए उनको। उनके बगैर भोजन नहीं होगा। फिर क्या संदेश भेजा गया। योगी आदित्यनाथ राजभवन पहुंचे। तब कहीं जाकर डिनर शुरू हुआ। पूरी पार्टी और बड़े नेताओं में योगी के प्रति मोदी के दोस्ताना व्यवहार का संदेश गया। योगी भाजपा के स्टार प्रचारक भी हैं। वह इकलौते नेता हैं जिनकी चुनाव प्रचार में पूरे देश में मांग रहती हैं।
भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी का कवरेज करने दिल्ली से आए मित्रों में टाइम्स ऑफ इंडिया के राजनीतिक संपादक अखिलेश सिंह, भुवनेश्वर संस्करण के स्थानीय संपादक राजाराम सतपथी, इंडिया टुडे के विशेष संवाददाता संतोष कुमार, सुजीत ठाकुर, द हिंदू ओडिशा के विशेष संवाददाता प्रफुल दास से मित्रवत संबंध का लाभ मिला था।
सर्वाधिक सरल स्वभाव के अखिलेश जी एक समय कानपुर में ही तैनात थे। तो उनसे कुछ ज्यादा ही निभ रही थी। इंडिया टुडे के लिए ओडिशा से काम करने के कारण संतोष कुमार से दोस्ताना हो गया था। वह एक नेक इंसान हैं। उनकी दो किताबें भी पब्लिश हुईं। प्रेस ब्रीफिंग पॉल हाइट्स होटल में होती थी। रविशंकर प्रसाद, प्रकाश जावडेकर ब्रीफिंग करते थे और ओडिशा के भाजपा प्रवक्ता सज्जन शर्मा सहयोग देते थे। इस बैठक से पहले ओडिशा के जिला परिषद के चुनाव में भाजपा ने सबसे ज्यादा (कितनी ठीक से याद नहीं है) सीटें जीतकर दिखा दिया था कि भाजपा लय-ताल में आ चुकी है।
इस बढ़त पर इंडिया टुडे में मेरी एक रिपोर्ट छपी थी। शीर्षक था ‘केसरिया पलटन की छलांग’। इस रिपोर्ट में धर्मेंद्र प्रधान के गृह जनपद अनुगुल में भाजपा संभवतः 15 में आठ या नौ सीट ही जीत सकी थी। तो इसी रिपोर्ट में एक लाइन यह भी थी कि धर्मेंद्र प्रधान अपना ही गढ़ नहीं बचा सके। यह उनके तिलमिलाहट की वजह हो सकती है।
बहरहाल, से प्रधान से संपर्क करके अमित शाह के इंटरव्यू के लिए समय मांगा। हमारे साथ ओडिया के लीडिंग अखबार समाज के स्वनामधन्य संपादक बामापद त्रिपाठी भी थे। वह संबलपुर के रहने वाले थे और वहीं के लीडिंग पेपर संवाद में रह चुके थे। उनकी सज्जनता का मैं कायल था। धर्मेंद्र प्रधान से उनके अच्छे संबंध हैं। इंटरव्यू के लिए समय मिलने की वजह, उनका साथ एक कारण हो सकता है।
प्रधान के पीए के माध्यम से हम लोगों को मेफेयर होटल के रेस्ट्रां में सुबह नौ बजे पहुंचने को कहा गया। दस मिनट बाद खुद धर्मेंद्र प्रधान हम लोगों को लेने आ गए। अमित शाह तक पहुंचने के लिए थोड़ा टहलते हुए पैदल चलना पड़ा। इस बीच धर्मेंद्र प्रधान ने मुझसे पूछा, ‘शर्माजी इंडिया टुडे के लिए ओडिशा से आप ही लिखते हैं?‘ मेरे हां कहने पर वह तपाक से बोल पड़े कि डिस्ट्रिक्ट बोर्ड के इलेक्शन की रिपोर्ट आपकी ही थी.. मैंने कहा कि हां, केसरिया पलटन की छलांग शीर्षक से छपी थी। आपको बधाई हो, आप लोग ओडिशा में छाने लगे हो। मुझे लगा कि तारीफ करेंगे। पर वह बोले, आपको ओडिशा की पोलिटिकल पल्स की जानकारी नहीं है।
इस अप्रत्याशित जवाब से मैं सकपका गया। पूछा, उसमें गलत क्या था? वह, धर्मेंद्र प्रधान अपना गढ़ नहीं बचा सके, यह लिखा था आपने। अच्छा नहीं लगा। मैं खुश हुआ कि पढ़ा गया तभी तो तल्ख टिप्पणी कर रहे हैं। मैंने कहा कि किसी खुश या नाराज करने की पत्रकारिता मैं नहीं करता। जो सच लगा लिख दिया। मेरी इस बेबाकी से बामापद त्रिपाठी और साथी पत्रकार रंजीत महंति और फोटोग्राफर मनोज स्वैं मुझे घूरे जा रहे थे। तब तक भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह तक जा पहुंचे। वहां पर महामंत्री संगठन रामलाल भी थे।
चूंकि इंटरव्यू मुझे ही करना था तो पेशेगत स्वभाव के कारण मैं होमवर्क करके गया था। सवाल कागज पर लिखे था (हालांकि जरूरत नहीं पड़ी)। जब अमित शाह ने यह कहा कि 2019 के चुनाव में देखना भाजपा की ओडिशा में सरकार बनेगी। मैंने पूछा, विधानसभा में कितनी सीटें आ सकती हैं? वह बोले कम से कम 110 सीटें। मैंने उनसे कहा कि राज्य के 28 जिलों की नब्ज टटोलने का मौका मिल चुका है। और लोगों से इंटरैक्ट (बातचीत) करने में मुझे अच्छा लगता है। मुझे तो ऐसा नहीं लगता। हां, ग्राफ बढ़ रहा है। शाह संगठन बूते इतनी सीटें लाने की बात दोहराते हुए कार्य योजना बताने लगे।
मेरे मुंह से निकला कि यदि ऐसा सही में है तो सरकार बना भी सकते हैं पर मुझे लगता नहीं है कि आपकी पार्टी आपके बताए गए ग्रासरूट पर है। रामलाल मुझे तरेर कर देखने लगे। प्रधान भी देख रहे थे। शाह बोले, हो सकता है कि आपको न लगता हो। पर अभी तो 2017 है। दो साल चुनाव में बाकी हैं। तैयारी और तेज की जाएगी। रही सही कसर यदि है तो वह पूरी कर ली जाएगी। करीब 15 सवालों का इंटरव्यू पूरा हो गया। अच्छा लगा जो पहली बार टॉप लीडरशिप से रूबरू था।
इसके बाद बीजू जनता दल में खरमंडल हो गया। नवीन पटनायक के चहेते केंद्रपाड़ा से सांसद बैजयंतजय पंडा की नवीन बाबू के सबसे चहेते ब्यूरोक्रेट वीके पांडियन से खटपट हो गयी। पंडा ओडिशा के बड़े मीडिया टाईकून हैं। उनका ‘ओ’ टीवी यानी ओडिशा टीवी बड़ा ओडिया चैनल माना जाता है। उसके भी सुर बदलने लगे। यह बात जनता भी नोटिस करने लगी थी कि ओ टीवी अब नवीन पटनायक सरकार विरोधी होता जा रहा है। चैनल की निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे।
पंडा का झुकाव भाजपा की तरफ भांपकर मेरे मन में आया कि स्टोरी आइडिया इंडिया टुडे को भेज दूं। संपादक अंशुमान तिवारी को फोन करके चर्चा की तो उन्होंने कहा कि महेश जी स्टोरी आइडिया भेजिए। निर्देश मिला कि अगले अंक में जानी है। बैजयंत पंडा से बातचीत के लिए समय लेने का प्रयास किया। उनका पीआर वर्क देख रहे जयंतो बाबू से बातचीत की। दो दिन बाद पंडा की तरफ से बताया गया कि इस प्रकरण पर वह बात नहीं करेंगे। स्टोरी इंडिया टुडे में छपी। ‘पंडा का फंडा’ शीर्षक था और उसमें उनके चैनल ओ टीवी के बदलते सुर पर भी एक लाइन छपी जो कि उन्हें नागवार गुजरी।
चैनल की संचालिका उनकी पत्नी (जागी मन्नत पंडा, (उनका इसी नाम से परिचय कराया जाता है) ने प्रकाशन समूह के चेयरमैन अरुण पुरी को नोटिस भेज दिया कि बिना चैनल का पक्ष जाने मैगजीन में उसकी साख पर सवाल खड़ा कर दिया गया। मुझसे प्रमाण मांगा गया। कहा गया कि उनके खिलाफ ओडिशा के किसी कद्दावर नेता का बयान हो या किसी अन्य मीडिया हाउस ने मिलती जुलती स्टोरी दी हो। इस मामले में मेरी मदद बीजद के प्रवक्ता प्रताप केसरी देव ने की। मैंने फौरन इंडिया टुडे को मेल भेजा। तब जाकर मामला शांत हुआ।

इसी साल राजस्थान पत्रिका से जुड़ने का मौका मिला। हुआ यूं कि एक एडिटोरियल वर्कशॉप में राजस्थान पत्रिका की कैम्पेन एडिटर डॉ. शिप्रा माथुर का आना हुआ। इसमें अजय उपाध्याय जी मुख्य अतिथि थे। मैं संयोजक था। दोनों मेहमान दो दिन तक रुके थे। शिप्राजी ने मुझसे कहा कि ओडिशा से पत्रिका के लिए स्पेशल स्टोरी भेज दिया करें। मैं कोठारी (गुलाब कोठारी) सर से बात कर लूंगी। फिर बताऊंगी। शिप्रा मुझसे छोटी है। मैं प्यार से उसे शिप्रा दीदी बुलाता हूं। उनके पति पशु चिकित्सक हैं। उनका विकलांग पशुओं को कत्रिम अंग लगाने का बड़ा सराहनीय कार्य है। काफी नामवर हैं। हमारा और शिप्रा का भाई-बहिन का रिश्ता आज भी कायम है।
ओडिशा से राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं के लिए स्टोरी निकालना मेरे बाएं हाथ का खेल हो गया था। काफी व्यस्त रहने लगा। अपना काम करने के साथ ही दूसरे प्रकाशन समूहों के लिए भी समय निकाल लेता था। ओडिशा में सामाजिक सरोकारों की बड़ी और पठनीय स्टोरी आइडिया और कंटेंट उपलब्ध कराने वालों में जगदानंद (संस्थापक-सीवाईएसडी) जैसे सहज आत्मीय भाव रखने वाले मित्र हैं तो वह ओडिशा में सहज ही पांव जमा लेगा। शिप्रा दीदी से मेरा संपर्क उन्हीं के माध्यम से हुआ था।
दि हिंदू के प्रफुल दास, वरिष्ठ पत्रकार, कला संस्कृति, सियासत जैसे विषयों पर मजबूत पकड़ रखने वाले केदार मिश्रा का भरपूर सहयोग मिला। कॉरपोरेट पार्टियों में जाने, कालेजों में भाषण देने, सेंट्रल यूनिवर्सिटी कोरापुट में मास कम्युनिकेशन के छात्रों को पढ़ाना, ढेंकानाल में आईआईएमसी में कैंपस इंटरव्यू आदि के मौके सदैव याद रहेंगे। पूरे ओडिशा में मास कम्युनिकेशन के 29 बच्चों का चयन किया था जिन्हें समाज में प्रशिक्षु संवाददाता या उप-संपादक पद पर उचित पारिश्रमिक के साथ नियुक्त किया। इसकी अनुमति बोर्ड ऑफ गवर्नर से ले ली थी। इसका लाभ भी मिला।
दैनिक जागरण, अमर उजाला समेत कई अख़बारों में वरिष्ठ पदों पर रहे वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा से संपर्क 9260973105 के ज़रिए किया जा सकता है।
पिछला भाग…
कानपुर वाले महेश शर्मा का पत्रकारीय जीवन (पार्ट-12) : अख़बार में भीमसेन और निरंजन रथ का भी अलग ही लेवल था


