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विपश्यना शिविर जाते वक़्त रास्ते में क्या महसूस हुआ!

विपश्यना शिविर के रास्ते में हूँ। अगले एक घंटे में पहुँच जाऊँगा और मेरा फ़ोन दस दिन के लिए स्विच्ड ऑफ हो जाएगा।

मैं सच में ऐसा प्रबंध करके जा रहा हूँ जिससे मेरे बग़ैर सबकुछ स्मूथ चलता रहे। बड़ा हल्का महसूस कर रहा हूँ। सब ख़ुशी ख़ुशी विदा किए। दो दिन से तैयारियाँ चल रहीं थीं विदाई की। मैं सिस्टम क्रिएट कर रहा था भड़ास के लिए। हो गया।

कार के ड्राइवर को रोक कर चाय पी पिला रहा हूँ। मेरे साथ जाने वाला ये आख़िरी आदमी है जो मेरी सेवा में है। मुझे इससे बात करना अच्छा लग रहा है।

पता है न कि अब बात नहीं कर पाऊँगा दस दिन तक। किसी चीज की क़ीमत तब समझ आती है जब वो अनुपलब्ध हो। जीवन वाक़ई अदभुत है। माइक्रो शेड्स तो लाखों करोड़ों हैं जीवन के। एक से एक रंग। बस महसूस करना आना चाहिए।

काश दुनिया से परमानेंट जाने वाले भी मेरी तरह ये कह सकते, गा सकते- मगर मैं लौट के आऊँगा ये मत भूल जाना तुम!

तस्वीर कल एक पॉडकास्ट इंटरव्यू का, भाई सर्वेश मिश्रा के साथ उनके स्टूडियो में।

मिलते हैं ब्रेक के बाद दोस्तों!

ये वीडियो शिविर के भीतर से है –

भड़ास एडिटर यशवंत की एफबी वॉल से

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