बात पायनियर की है। 80 के दशक में इस अखबार का बाजार पर वर्चस्व था। कई हाथों में अखबार के जाने के बाद चमक फीकी नहीं हुई। अंत मे मित्रा एंड कम्पनी के हाथ में आने के बाद कुछ सालों तक तो अखबार ठीक रहा। पर, जबसे अखबार की आड़ में बेईमानी होने लगी तभी से इस अखबार के दुर्दिन शुरू हो गए।
मित्रा जी, जब तक रहे, खींचकर किसी तरह से इस अखबार को ले चलते रहे। इस दौरान अखबार के सामने वित्तीय संकट होने पर नए पार्टनर को शामिल किया गया। अब क्यों शामिल किया गया, कैसे अखबार ने देनदारी से बचने के लिए अपने आपको दिवालिया घोषित किया, इसकी कहानी भड़ास प्रकाशित कर चुका है। लेकिन यह भी सही है कि विवाद का बीज मित्रा के समय ही बोया गया था।
बात अब इससे आगे की है। मामला जब एनसीएलटी में पहुँचा तो वहां से ऑक्शन की प्रक्रिया शुरू कराने का आदेश जारी हुआ। कम्पनी के हिसाब किताब के लिए रिसीवर भी बैठाया गया। इस दौरान ऑक्शन से बचने के लिए मामले को सुप्रीम कोर्ट में ले जाकर नामी-गिरामी वकीलों की जमात लेकर स्टे ले लिया गया। कभी प्रकरण की सुनवाई एनसीएलटी में तो कभी सुप्रीम कोर्ट में चलता रही। अखबार को लेकर जल्द फैसला न आये इसके लिए तारीख पर तारीख का खेल भी चला।
इस दौरान वित्तीय संकट का हवाला देकर स्टाफ की छंटनी भी खूब हुई। जिसे चाहा बगैर पैसा दिए हटा दिया। बाद में कुछ का पैसा तो दिया लेकिन अभी भी ऐसे लोगों की संख्या दहाई में है, जिनका पैसा नहीं दिया गया है।
तकरीबन 3 साल तक चले मुकदमे के दौरान स्टाफ को यह कहकर सेलरी के नाम पर चुप करा दिया जाता रहा कि मामला कोर्ट में है। जबकि इस दौरान अखबार की सीईओ कहें या ग्रुप एडिटर या फिर मालिक या फिर मुद्रक, प्रकाशक शोबोरी गांगुली नोएडा के जिस ऑफिस में बैठती हैं, वहां तो रेगुलर सेलरी देती रहीं। दिल्ली में कोई बकाया नहीं है। पर, उन्हें कभी अन्य संस्करण नहीं दिखाई दिए।
मसलन लखनऊ का ही ले लीजिए। यहां के सुपर बॉस कहे जाने वाले विजय प्रकाश सिंह ने एक महीने की सैलरी दी, दो महीने की रोक ली। क्या की मामला कोर्ट में है, अखबार की डीएवीपी नहीं है। जल्द ही अगली तारीख पर निर्णय आने के बाद सब आल इज वेल हो जाएगा।
जबकि महोदय यही बोलते-बोलते 2 साल से ऊपर का बैकलॉग ले चुके हैं। अब महोदय के मुंह से एक शब्द नहीं निकलते हैं। इस बीच तारीख पर तारीख के खेल में इन लोगों के पक्ष में भी मिलार्ड ने निर्णय दे दिया। अब बात यह नहीं समझ में आ रही है कि जब खुद को दिवालिया घोषित कर दिया तो फिर मिलार्ड ने चाभी कैसे पकड़ा दी। क्या सिर्फ इसलिए की अखबार उनका है।
चलिए मान लेते हैं कि अखबार उनका है। लेकिन अखबार उनके भरोसे तो चलता नहीं है। इसके लिए स्टाफ की जरूरत होती है। इसमें जो स्टाफ काम करता है, उसे हर माह सेलरी देनी पड़ती है। लखनऊ का हाल यह है कि अभी तक सेलरी के नाम पर न तो शोबोरी गांगुली के मुंह से कुछ निकल रहा है और न ही सुपर बॉस के मुंह से या फिर कुषाण मित्रा के मुंह से। स्टाफ के नाम पर अंगुलियों पर लोग बचे हैं। मजबूरी है इतना पैसा छोड़कर जा भी नहीं सकते।
चोरी- बेईमानी ये लोग करें, सजा स्टाफ भुगते। ये लोग आखिर किस मुंह से मुद्रक, प्रकाशक बनकर बैठे हैं, समझ से परे है। ऐसा मुद्रक प्रकाशक किस बात का जो अपने ही स्टाफ में भेदभाव करते हैं। तरस आती है ऐसे लोगों की बुद्धिमत्ता पर। अब क्या बताएं, जो मर चुके हैं, उनके परिवार को अभी तक बकाया भी नहीं दिया है, इन लोगों ने। जबकि उस आत्मा को दिवंगत हुए साल भर से ऊपर का समय हो चुका है।
भड़ास को भेजे गए मेल पर आधारित


