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सियासत

अमेरिकी राजधानी बाकी देश में वोट मैनेज करने में विफल क्यों रही?

रंगनाथ सिंह-

ट्रम्प का अतीत, सनकपन भरी बातें और क्रिप्टो जगत में बहार!

अमेरिका की नन्हीं सी राजधानी के करीब 92.5 प्रतिशत लोग नहीं चाहते थे कि डोनाल्ड ट्रम्प दुबारा राष्ट्रपति बनें। हॉलीवुड भी नहीं चाहता था कि ट्रम्प राष्ट्रपति बनें। सिलिकॉन वैली भी नहीं चाहता था कि ट्रम्प राष्ट्रपति बनें। अमेरिका का लिबरल कहा जाने वाला मीडिया खुलेआम जनता से अपील कर रहा था कि ट्रम्प को वोट न दें।

ट्रम्प का अतीत, ट्रम्प की सनकी जैसी बातें, ट्रम्प का कई मुद्दों पर प्रतिगामी रुख रखना, जगजाहिर है फिर भी अमेरिकी जनता ने उस व्यक्ति को वोट दे दिया जिसे अमेरिका का रूलिंग इलीट बिल्कुल पसन्द नहीं करता। ट्रम्प समर्थक हर मतदाता ने किसी न किसी ठोस वजह से इन चारित्रिक कमजोरियों की अनदेखी करके वोट दिया होगा।

क्या आप भी मानते हैं कि ट्रम्प को वोट देने वाले बेवकूफ कचड़ा लोग हैं! अमेरिका की आधी से ज्यादा आबादी कचड़ा और बेवकूफ है! और राजधानी में 92.5 प्रतिशत समझदार स्वच्छ लोग रहते हैं! राजधानी का लिविंग स्टैंडर्ड हाई होता है, ये तो सुना था मगर कैरेक्टर को लेकर मुझे सन्देह है।

ट्रम्प ने चुनाव जीतने से पहले और बाद, जो मिजाज दिखाये हैं, उनसे लगता है कि आने वाला समय अमेरिकी एस्टैब्लिशमेंट के लिए काफी उथल-पुथल वाला साबित हो सकता है।


अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-

अमेरिका में जो बाइडन की विदाई को वहां का उद्योग जगत और शेयर बाजार ही नहीं बल्कि क्रिप्टो जगत भी सेलिब्रेट कर रहा है। ट्रंप को क्रिप्टो इंडस्ट्री अपना शुभचिंतक मानती है इसलिए ट्रंप की ताजपोशी से पहले ही लगातार क्रिप्टो में उछाल का सिलसिला बना हुआ है।

जैसा कि ट्रंप ने वादा किया था, रूस यूक्रेन युद्ध को रुकवाने को लेकर, यदि ट्रंप मध्यस्थता के जरिए इसे रुकवाने में कामयाब हो गए तो कोई बड़ी बात नहीं कि crypto में एक बार फिर वही बहार लौट आए, जो बरसों पहले नदारद हो गई थी।

हालांकि भारत और चीन जैसे देशों में अभी भी crypto के घनघोर विरोधी नेताओं और दलों की सरकार है, इसलिए दुनिया में crypto का डंका दोबारा बजने में थोड़ी दिक्कत आ सकती है। मगर रूस युद्ध से हटा तो अमेरिका और रूस ही काफी हैं, क्रिप्टो में तेजी का ताबड़तोड़ सिलसिला शुरू करने के लिए।

एक वक्त था, जब चीन ने crypto माइनिंग का पूरा कारोबार अकेले ही संभाल रखा था, फिर वहां इस पर पाबंदी लगने के बाद यह कारोबार रूस और आसपास के देशों में शिफ्ट होने लगा था। मगर यूक्रेन से शुरू हुए टकराव के बाद वहां भी crypto का बेस पूरी तरह से बसने के पहले ही उजड़ गया।

इधर, भारत में RBI के गवर्नर शक्तिकांत दास और वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने क्रिप्टो का तंबू कनात जब तक उखाड़ नहीं लिया, तब तक चैन की सांस नहीं ली। लिहाजा ट्रंप के आने और crypto में किसी बड़ी बहार के आने के बावजूद जब तक मोदी सरकार है, तब तक तो भारत में क्रिप्टो में तेजी का फायदा कोई ले नहीं पाएगा।

वैसे भी, रूस, चीन और भारत से पलायन कर गए crypto के धुरंधर दुबई जैसे कुछ देशों में अपना मजबूत ठिया जमा चुके हैं और लगता नहीं कि वे अब कभी अपने अपने देशों में वापस लौटेंगे।

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