चंद्र भूषण-
कल के व्यस्त सांस्कृतिक दिन की एक उपलब्धि शाम को 6 किलोमीटर की पैदल चलाई रही। साथ में मिला गोपाल प्रधान से बुद्ध के प्रति आचार्य रामचंद्र शुक्ल के वैचारिक रुझान संबंधी एक नया ज्ञान। अब कहीं से चिंतामणि भाग-4 का जुगाड़ हो तो अपनी मति से इस सूचना की पुष्टि करूं। चलाई का ब्यौरा यह रहा- खान मार्केट मेट्रो स्टेशन से बीकानेर हाउस, वहां से इंडिया हैबिटेट सेंटर, फिर वहां से जवाहर लाल नेहरू स्टेडियम मेट्रो स्टेशन। गोपाल-ज्ञान इनमें बीच वाली यात्रा में प्राप्त हुआ, साथ में शुक्ल जी संबंधी कुछ कड़वी जिज्ञासाओं का थोड़ा-बहुत समाधान भी हुआ।
रही बात बीकानेर हाउस में चली ‘हंसाक्षर’ की वार्षिक विचार गोष्ठी की, तो जब वहां पहुंचा तब सुधीश पचौरी का भाषण चल रहा था। नामवर जी के जाने के बाद हिन्दी की दुनिया से साहित्यिक किस्सेबाजी वाली विनोदवृत्ति उठ चुकी है। पचौरी जी उसे भरने की कोशिश करते हैं लेकिन उनके पास मसाला बहुत कम है। उन्होंने कहा कि हिंदी आलोचकों में अपनी पाठ-पद्धति विकसित करने का गुण नहीं रहा, और यह बात और लोगों के अलावा नामवर सिंह पर भी लागू होती है। खुद पचौरी जी को अपनी अलग पद्धति खोजने के चक्कर में मैं कई घाटों का पानी पीते, फिर अगले घाट पर बढ़ जाते देखता आ रहा हूं, सो…
अशोक वाजपेई ने सुधीश जी का सिरा पकड़ने के बजाय एक वाजिब बात कही कि विचार का मतलब लंबे समय तक यहां वामपंथी विचार ही समझा जाता था। किसी के ख्याल में भी नहीं था कि दक्षिणपंथी विचार यहां इतनी बुरी तरह राज करेगा कि वैचारिक स्वतंत्रता की कहीं कोई जगह ही नहीं बचेगी। साहित्य की भीतरी बहस में गए बगैर उन्होंने इसके सामने मौजूद बाहरी राजनीतिक चुनौती पर बात की। हालांकि यह कहते हुए कि हिंदी साहित्य में यथार्थ के धार्मिक पक्ष की अनदेखी यहां के समाज में इस बीमारी को इस हद तक बढ़ाने में मददगार साबित हुई।
गरिमा श्रीवास्तव ने वाजपेई समेत कुछ और कवियों की कविताएं सुनाकर कहा कि विचारधारा के बिना भी अच्छा साहित्य लिखा जा सकता है। जबकि गोपाल प्रधान ने पूंजी के संकट को देश-दुनिया के सामाजिक-राजनीतिक संकट का मूल बताते हुए हिंदी साहित्य की वाम विचारणा के महत्व को रेखांकित किया। बीच में एक हताशाजनक लेकिन विचारोत्तेजक सूचना उन्होंने यह दी कि सवर्ण मिडल क्लास अब हिंदी से निकल चुका है। किसी ने पूछा कि सवर्ण से क्या तात्पर्य है, तो कहा कि जो समझा जाता है वही। पल्लव का संचालन अच्छा था लेकिन बहस कराने में उनकी दिलचस्पी का हाल हिंदी की साहित्यिक वैचारिकता के हाल जैसा ही लगा।
इस ठीहे पर अगली गोष्ठी सत्य व्यास जैसे ‘नई हिंदी’ के कथित ‘बेस्टसेलर्स’ के इर्दगिर्द थी, जिससे मैं ज्यादा नहीं चिपक सका।
अगला आयोजन हैबिटेट सेंटर में वीरेनियत का था, जो साल दर साल दिल्ली में अखिल भारतीय हिंदी कवियों का अपना आयोजन बनता जा रहा है। हर बार यहां कुछ ऐसी कविताएं सुनने को मिल जाती हैं कि सब कुछ गंवाकर भी इस माध्यम से जुड़े रहने का दिल करने लगता है। इस बार ऐसी कविताएं सुनाने में विजया सिंह ने बाजी मारी। क्या कमाल की रेंज है इस कवि में! फिलस्तीन से लेकर मच्छर तक और बहनों से पॉर्न देखने की अपील से लेकर कश्मीर तक समान इंटेंसिटी, विट, ह्यूमर और चुस्त कहन के साथ वे लिखती और पढ़ती हैं। पहली बार सुना (एक को छोड़ बाकी सात कवियों को पहली बार ही सुना) लेकिन मौका मिला तो फिर-फिर सुनने जाऊंगा।
कविता पढ़ने की शुरुआत छत्तीसगढ़ की पूनम वासम से हुई और चार साल पहले बस्तर में देखे गए सुकमा जिले के चिंतागुफा इलाके के परेशान लोगों की याद उन्होंने मेरे जेहन में ताजा कर दी। भारतीय सत्ता का बेरहम चेहरा अभी महानगरों में भी उजागर है, लेकिन यहां से दूर आदिवासी इलाकों में यह जैसा दिखता है, उसकी इधर बस कल्पना ही की जा सकती है। पूनम एक साहसी कवि हैं और कविता में बहुत जरूरी काम कर रही हैं।

पवन पराग ने बेरोजगार सीरीज की अपनी कविताओं में देश का पिटा हुआ मुद्दा मान ली गई, दिनोंदिन विकराल होती एक समस्या को कवि की नजर से देखा है और अरसे बाद साबित किया है कि कविता औसत संवेदना से आगे जाकर बंद रास्ते खोल देने की विधा है। इलाहाबाद से आई कविता कादंबरी इस शहर के ‘प्रयागराजीकरण’ की प्रॉपर एंटीथीसिस नजर आईं। ऐसी कविताएं, जिनमें इस प्यारे शहर का वह खाका खिंचता है, जो हमारी पढ़ाई के समय वहां मौजूद था और जो पिछले कुछ दशकों में हजारों टन जहर संगम के पानी और वहां की फिजाओं में घोल दिए जाने के बावजूद अभी सिरे से खत्म नहीं हुआ है।
इलाहाबाद से ही जुड़े वरिष्ठ कवि हरीश चंद्र पांडे ने इस सिलसिले को और मजबूत किया- ‘लोगों ने कहा पानी हमारे घरों में घुस रहा है, पानी ने कहा मैं अपने घर में हूं।’ उनके जितने ही वरिष्ठ कवि, चंडीगढ़ से आए सत्यपाल सहगल मेरे पुराने मित्र हैं। पहली बार उन्हें 1995 में, अपनी शादी के थोड़े ही समय बाद जम्मू में सुना था। कवि की जैसी तस्वीर मन में रही है, वैसे ही कवि हैं लेकिन आंख की मुश्किल से यहां एक (मेरी सबसे प्रिय रही) कविता ही खुद से सुना पाए। उनकी बाकी कविताएं संचालन कर रहे आशुतोष कुमार ने पढ़ीं, और अच्छे से पढ़ीं।
युवा शायर नादिम नदीम के शेरों में नई बात ही नहीं, कुछ अलग तरह की बहर भी सुनाई पड़ी। इस शायर में पॉलिटिकल कंटेंट है लेकिन यह लाउड नहीं है और सुनाते वक्त नौटंकी नहीं करता। पटना से आए कवि अंचित में वही रेडिकल पटनहिया रोमान है, जो मुझे जून 1988 में वहां पहुंचने के बाद वहां की हवा में महसूस होता था। लेकिन पटना के दोनों बड़े समकालीन कवियों आलोक धन्वा और अरुण कमल का कोई प्रभाव उनकी कविताओं पर नहीं है। यह एक युवा आवाज है, अपने ढंग से ही इसका प्रौढ़ होना वाजिब होगा। अपनी तरफ से मैं आगे इसमें ज्यादा देसी, जमीनी स्पर्श आने की अपेक्षा रखता हूं।
खैर, इस हवाई सर्वेक्षण से वीरेनियत का माहौल क्या ही समझ में आने वाला है। एक हॉल को नाक तक भरा हुआ देखना और बाहर भी लगभग उतने ही लोगों का उचकते नजर आना हिंदी कविता के लिए एक उम्मीद जगाने वाली बात लगती है। इसपर तुर्रा यह कि बहुत सारे दोस्तों से मुलाकात हो जाती है। सोशल मीडिया की मेहरबानी से दूरियां अभी उतनी ज्यादा नहीं बन पातीं। लेकिन एक मित्र का हाथ अपने हाथों में लेना, एक मिनट भी उससे बात कर लेना मन में भरोसा भर देता है।
लिखने-पढ़ने का गंभीर काम कई बार आपसे अकेलापन मांगता है और अकेला करता भी है। बदले में ऐसा कुछ देता नहीं, जिसे उजरत मानकर संतोष किया जा सके (सेलिब्रिटी लेखन और उसके महारथियों को उनके हाल पर छोड़ दें)। लेकिन इस लेखन की परिणति हर हाल में सामाजिक ही हो, ऐसी अपेक्षा समाज के साथ-साथ खुद लिखारियों की भी होती है। मेरे लिए यह अंतर्विरोध कुछ हद तक वीरेनियत में और इधर संजय कुंदन के सुरजीत भवन वाले अड्डे पर भी हल होने लगा है।



