
संजय सिन्हा-
प्रभाष जोशी प्रधान संपादक थे। संजय सिन्हा उप संपादक। नहीं, यह पद का सही विवरण नहीं है। प्रभाष जोशी ‘प्रधान संपादक’ थे, संजय सिन्हा ‘प्रशिक्षु उप संपादक’।
नौकरी ज्वाइन करने से पहले मुझे यही लगता था कि प्रधान संपादक के बाद सीधे उप संपादक होते हैं। यह मेरी बुद्धि थी, मेरी समझ थी। सच्चाई तो यह थी (और यही है) कि किसी भी अखबार के संसार में प्रधान संपादक माउंट एवरेस्ट पर होता है, और उप संपादक समंदर की तलहटी में। मतलब, खबरों के संसार में उप संपादक सबसे निचली सीढ़ी पर होता है और प्रधान संपादक अखबार का मुखिया।
आप मेरी समझ पर तरस खा सकते हैं, लेकिन क्या कीजिएगा, मेरे भाग्य में ही लिखा था कि मैं दुनिया को पढ़कर नहीं, भोगकर ही समझूंगा।
मैंने ज्वाइन किया तो पता चला कि अखबार में एक ही संपादक होते हैं, बाकी उनके नीचे संपादकीय फौज। जनसत्ता की कड़ियों को समझें तो कुछ इस तरह – प्रधान संपादक, संपादक, सहायक संपादक, समाचार संपादक, उप समाचार संपादक, मुख्य उप संपादक, वरिष्ठ उप संपादक और उप संपादक, और फिर प्रशिक्षु उप संपादक।
गिन लीजिए कितनी कड़ियां हैं एक प्रधान संपादक और प्रशिक्षु उप संपादक के बीच।
शुरुआती दिनों की बात है – लखनऊ के हमारे संवाददाता ने एक रिपोर्ट भेजी थी। उन दिनों लखनऊ से टेलीप्रिंटर के जरिए खबरें आती थीं। वह खबर रोमन में टाइप होकर आई थी और मुझे दी गई थी देवनागरी में लिखने के लिए। उप संपादक का काम होता था खबरों को दुरुस्त करना, री-राइट करना, अनुवाद करना। उप संपादक सीधे मुख्य उप संपादक के मातहत काम करता था। मुख्य उप संपादक ने खबर किसी उप संपादक को दी और समझा दिया कि इसे ऐसे, इतने कॉलम के योग्य लिखना है। खबर लिखने के बाद मुख्य उप संपादक की जिम्मेदारी होती थी कि वह उप संपादक के लिखे को पढ़े, ठीक करे और उसे किस पन्ने पर कहां छापना है, वह तय करे।
लखनऊ से हमारे संवाददाता (नाम नहीं लिखूंगा) ने खबर भेजी थी। उसमें उन्होंने टाइपिंग की गलती करते हुए लिखा था कि उत्तर प्रदेश की इसी ‘बेईमान सभा’ (असल में लिखना था विधान सभा) में फलाने लाल ने यह कहा था…
संजय सिन्हा भोले थे। उन्होंने ‘बेईमान सभा’ को ‘बेईमान सभा’ ही लिख दिया। वरिष्ठ उप संपादक की नजर उस गलती पर नहीं पड़ी और खबर छप गई।
मैं अगले दिन जब ऑफिस पहुंचा तो सनसनी मची थी। सारे लोग मुझे घूरकर देख रहे थे। संजय सिन्हा, यह क्या किया तुमने? ‘विधान सभा’ को ‘बेईमान सभा’ लिख दिया?
खैर, लिखे को कौन मिटा सकता था? वही छपा था। मेरी समझ में वह गलती नहीं थी, मुझे लगा कि जनसत्ता का मूड-मिजाज संजय सिन्हा के मूड-मिजाज से मैच करता है। वहां के संवाददाता (अभी भी नाम नहीं लिखूंगा) ने सोच-समझकर ही विधान सभा को बेईमान सभा कहा है तो वही ठीक होगा।
थोड़ी देर में मेरे पास पैगाम आया कि प्रधान संपादक प्रभाष जोशी प्रशिक्षु उप संपादक संजय सिन्हा को अपने कमरे में बुला रहे हैं। राम बाबू.. प्रभाष जोशी के पीए होते थे, उनका फोन समाचार संपादक के पास आया था। नीचे लोग सोच रहे थे कि आज तो संजय सिन्हा की पत्रकारिता भ्रूण मौत मर जाएगी।
मैं प्रभाष जोशी के कमरे में गया।
उन्होंने मेरी ओर देखा और पहला प्रश्न – “क्यों भई, बेईमान सभा क्या है?”
“विधान सभा।”
“तो क्या उसे अखबार में लिख दोगे?”
“मैंने नहीं लिखा है। लखनऊ के संवाददाता ने लिखा था। मैंने तो सिर्फ रोमन को देवनागरी में किया था।”
“उप संपादक का क्या काम होता है? गलतियों को ठीक करना। किसी भी सूरत में विधान सभा को बेईमान सभा नहीं लिख सकते हैं। यह मानहानि का मामला है।”
“जी। गलती हो गई। आगे से ध्यान रखूंगा।”
बात खत्म।
कहानी इतनी ही है।
लेकिन कहानी इतनी ही थोड़ी होनी चाहिए थी?
इस गलती की कई कड़ियां थीं।
- लखनऊ के रिपोर्टर वरिष्ठ थे। उन्हें खबर भेजते हुए स्पेलिंग पर ध्यान देना चाहिए था।
- खबर दिल्ली आई तो न्यूज रूम की जिम्मेदारी समाचार संपादक की थी। उन्हें अपने सिर पर जिम्मा लेना चाहिए था।
- उनके नीचे उप समाचार संपादक थे, वे भी जिम्मा ले सकते थे।
- मुख्य उप संपादक तो सीधे खबर छापने के जिम्मेदार थे। कायदे से एक प्रशिक्षु उप संपादक के लिखे को बिना पढ़े जाने देना उनकी गलती थी।
- उनके नीचे भी वरिष्ठ उप संपादक थे। वे भी मेरे लिखे को पढ़ सकते थे।
- फिर उप संपादक। उसे छोड़िए, वह तो बेचारा सबसे निचली सीढ़ी पर खड़ा था।
लेकिन हुआ क्या? प्रशिक्षु उप संपादक की गलती को किसी ने अपने ऊपर नहीं लिया। प्रधान संपादक के सामने गलती का ठीकरा फोड़ा गया सीधे प्रशिक्षु उप संपादक के माथे पर। मैं समझ गया था कि भूल मुझसे हुई थी। प्रधान संपादक ने कहा था कि यह मानहानि का मामला है। माफी मांगनी होगी। लेकिन तुम्हें नहीं, मुझे। संजय सिन्हा को नहीं, प्रभाष जोशी को।
अगले दिन ‘जनसत्ता’ के पहले पृष्ठ पर कोने में माफीनामा छपा था। प्रभाष जोशी ने माफी मांगी थी, एक प्रशिक्षु उप संपादक की गलती की, सार्वजनिक रूप से। उन्होंने लिखा था कि भूलवश ऐसा हो गया था, जिसके लिए हम शर्मिंदा हैं। माफी मांगते हैं।
मैं उस दिन पहली बार समझा था कि मुखिया कौन होता है। मुखिया वह होता है, जो अपने मातहत की गलती का जिम्मा अपने ऊपर लेता है। मुखिया वह होता है, जो पूरी टीम को संभालता है, और यदि नीचे वाले से कोई भूल हो जाए, तो भीतर के सिस्टम में भले ही उसे चाहे जो सजा दे, माफी मंगवाए, लेकिन बाहर की दुनिया में मुखिया ही सामने आता है, और माफी मांगता है। वह किसी जांच की बात सार्वजनिक रूप से नहीं करता; वह तो सीधे उस गलती को अपने माथे लेता है और कहता है कि चूक हमारी ओर से हुई है।
साधारण लोग क्या करते हैं? प्रशिक्षु के सिर पर गलती का ठीकरा फोड़ देते हैं। प्रभाष जोशी इसी लिए प्रमुख थे कि वे स्थानीय संपादक की भूल को अपने सिर लेते थे। वे प्रशिक्षु उप संपादक की गलती को भी अपने सिर लेते थे।
प्रसंगवश बता रहा हूँ कि जनसत्ता के संपादकीय में स्थानीय संपादक बनवारी जी ने लिख दिया था कि राजस्थान के गांव देवराला में रूप कंवर नामक महिला, जो अपने पति की चिता के साथ सती हो गई थी, वह महान कृत्य था और उसकी महानता वही समझ सकता है…
इस पर देश भर में हंगामा हुआ था। माना गया था कि ‘जनसत्ता’ सती प्रथा का हिमायती है। खूब हल्ला मचा था और फिर प्रभाष जोशी ने उस गलती को भी अपने माथे लिया था।
वही परंपरा थी। मैंने उसे आदर्श के रूप में अपनाया था। कभी जो अपनी पत्रकारीय कहानी सुनाने बैठा तो सब सुनाऊंगा।
अब ऐसा नहीं होता है। वह दौर था, जब विमान हादसे की जिम्मेदारी उड्डयन मंत्री की होती थी। रेल हादसे की जिम्मेदारी रेल मंत्री की होती थी। किसी राष्ट्रीय हादसे का जिम्मा मुखिया को ही लेना होता है।
आप समझ रहे हैं न मैं क्या कह रहा हूं?
अब परिस्थिति बदल गई है। प्रधान संपादक खुद कोई काम नहीं करता है, कराता है। तो उससे कोई गलती हो ही नहीं सकती है, गलती तो काम करने वाले से होती है। और अब जहां गलती होती है, काम करने वाला निपट जाता है। प्रधान संपादक अपनी कुर्सी पर बैठकर प्रबंधन से मिलकर नाक में उंगली करते हुए नीचे वाले को निपटाता रहता है। प्रबंधन खुश होता है कि वाह, क्या संपादक मिला है। उससे कभी गलती नहीं होती।
लेकिन यह इस दौर की कहानी है। उस दौर में मालिक सिर्फ प्रधान संपादक को डांटते थे। रामनाथ गोयनका ऐसे ही मालिक थे। उन्हें किसी और संपादक से कोई मतलब नहीं था। तभी उप संपादक की गलती भी प्रधान संपादक के सिर होती थी। प्रधान संपादक माफी मांगते थे, सजा हुई तो सजा भी वही भुगतते थे। अंदरूनी तौर पर भले उप संपादक को जो सजा मिले (मुझे तो कोई सजा नहीं मिली थी), सार्वजनिक दंड के भागीदार प्रधान ही होते थे।
बाद में समाचार के संसार में नियम बन गया था कि पीआरबी अधिनियम के तहत खबरों में भूल के लिए दोषी कौन होगा, उसका नाम अखबार में छापा जाएगा। किसी अखबार को उठाकर पीछे पढ़ लीजिएगा, लिखा होता है “पीआरबी अधिनियम के तहत खबरों की जिम्मेदारी फलाने संपादक पर।”
यही होना चाहिए। कहीं कुछ भी गलत हुआ है, तो नियम के तहत मुखिया को आगे आना चाहिए और सिर झुका कर कहना चाहिए कि गलती उसी की है। सजा वही भुगतेगा।
नोट: आप समझ गए न संजय सिन्हा क्या कहना चाह रहे हैं?..
- वह कहना चाह रहे हैं कि मुखिया को जिम्मेदारी लेनी चाहिए। गलती को माथे से लगाकर माफी मांगनी चाहिए।
- गलती स्वीकार करने से आदमी छोटा नहीं हो जाता है। जैसे बाहर की दुनिया में प्रभाष जोशी नहीं हुए थे। जैसे भीतर की दुनिया में संजय सिन्हा भी नहीं हुए थे।
- गांव की कहावत है कि मजा (पद, प्रतिष्ठा, सुख, शोहरत) तुमने उठाया तो सजा कौन भोगेगा?
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