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आज के अखबार : कोर्स करेक्शन की चर्चा नहीं, किसान आंदोलन में जागरण और टीओआई की खबर भ्रामक

संजय कुमार सिंह

आज अखबारों में किसानों का आंदोलन खत्म होने की खबर है। दैनिक जागरण में यह लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह अखबार के पहले पन्ने से पहले के अधपन्ने पर लीड है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है पंजाब पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को शंभू बॉर्डर से हटाया, खनौरी सीमा भी साफ, दल्लेवाल गिरफ्तार। हिन्दुस्तान टाइम्स में भारत-कनाडा के बीच रिश्तों को ठीक करने के लिए वार्ता शुरू करने की खबर लीड है। इसी विषय पर दैनिक जागरण की लीड की  रिपोर्टिंग (लिखी या छपी खबर) और शीर्षक टीआरपी बटोरू तो हो सकती है लेकिन खबर भ्रम फैलाने वाली है। केंद्र सरकार ने किसानों से समय मांगा, संभवतः आंदोलन खत्म हो गया पर  दैनिक जागरण ने खबर दी है, वार्ता विफल, मान सरकार ने बुलडोजर चलवाया। दैनिक जागरण का जो संस्करण आज मुझे मिला उसमें लीड का शीर्षक है, केंद्र किसान वार्ता विफल, शंभू और खनौरी बॉर्डर पर मान सरकार ने चलवाया बुलडोजर। उपशीर्षक है, कार्रवाई – केंद्रीय मंत्रियों से सातवें दौर की बातचीत विफल होने के तुरंत बाद किसानों की धरपकड़। मुझे इस खबर का मतलब समझ में नहीं आया। अगर बातचीत विफल हो गई (पहले हो नहीं रही होगी वह भी किसानों की विफलता थी या सफल रही होती तो कल क्यों विफल होती) तो इसमें किसानों की क्या गलती है जो उन्हें सजा दी जा रही है। मान सरकार ने बुलडोजर चलवाया तो भाजपा सरकार को मतलब नहीं हो यह संभव है। केंद्र की भाजपा सरकार कह सकती है कि बुलडोजर तो मान सरकार ने चलवाया है हमारा उससे कोई संबंध नहीं है। यह शीर्षक भाजपा के किसी पर्चे या मुखपत्र के लिए तो ठीक है अखबार का काम था कि वह मान सरकार से पूछकर अपने पाठकों को बताता, अपनी ओर से कोई अटकल लगाता या फिर कोशिश करता और कामयाबी नहीं मिली, यही बताता। पर ऐसा कुछ नहीं है। खबर में लिखा है, केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि किसानों से सौहार्दपूर्ण माहौल में बात हुई। किसानों ने जो डाटा हमारे सामने रखा है उसका देश भर में हर वर्ग पर कितना असर होगा इसपर चर्चा करने के लिए हमने उनसे समय मांगा है। बैठक में तमिलनाडु व केरल के किसान प्रतिनिधि भी आये थे। 

आज के अखबारों में सुनीता विलियम्स के धरती पर सकुशल वापस आने की खबर प्रमुखता से छपी है। इसमें कल सोशल मीडिया पर चर्चा में रहे प्रधानमंत्री के ‘कोर्स करेक्शन’ की खबर नहीं है। टेलीग्राफ ने कल सुबह 8:51 पर ही यह खबर जारी की थी और सारे दिन सोशल मीडिया पर इसकी चर्चा रही। इसके अलावा, एक खबर यह भी है कि कांग्रेस की केरल इकाई ने सोशल मीडिया पर पोस्ट किया, “मोदी ने सुनीता विलियम्स को एक पत्र लिखा है। पूरी संभावना है कि वे इसे कूड़ेदान में डाल देंगी क्योंकि वे हरेन पंड्या की चचेरी बहन हैं… उन्होंने (पंडया ने) मोदी को चुनौती दी थी और ‘सुबह की सैर’ के दौरान उनकी हत्या कर दी गई।” इस हत्या का अभी तक खुलासा नहीं हुआ है। उल्टे, इसे रोकने के लिए और हत्याओं तथा ईनाम की लंबी कहानी है। इसमें तड़ीपार होना और पूर्व गृहमंत्री पी चिंदबरम का जेल में रहना तथा मामले का अभी तक कुछ पता न चलना शामिल है। आज इसकी कोई चर्चा नहीं है। इस तथ्य के बावजूद कि कल इंडियन एक्सप्रेस समूह के रामनाथ गोयनका पत्रकारिता पुरस्कार में मुख्य अतिथि, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा है, अगर नागरिक सूचना संपन्न नहीं होंगे तो लोकतांत्रिक प्रक्रियाएं अर्थहीन हो जाएंगी। इंडियन एक्सप्रेस में आज छपे राष्ट्रपति के भाषण का शीर्षक है, राज्य में समाचार माध्यमों की भूमिका अहम होती है, इस क्षेत्र के स्वास्थ्य से हम सब लोगों का संबंध है

आज जब राष्ट्रपति ने मीडिया की भूमिका का जिक्र किया है तो उसकी लापरवाही के अलावा उसका पक्षपात साफ दिख रहा है और इसमें यह शामिल है कि अखबारों ने आज  इस खबर को भी महत्व नहीं दिया है। यह इंडियन एक्सप्रेस के अलावा मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। राष्ट्रपति ने जब आम आदमी पार्टी के नेताओं, मनीष सिसोदिया तथा सत्येन्द्र जैन के खिलाफ मुकदमा चलाने की अनुमति दी थी तो मैंने यहां लिखा था, मुझे लगता है कि यह चुनाव आयोग के बाद राष्ट्रपति कार्यालय पर भी केंद्र सरकार के प्रभाव का लक्षण है। दिल्ली के विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी की हार और भाजपा की जीत को पहले भी सुप्रीम कोर्ट के परोक्ष सहयोग से होना माना गया है। इससे संबंधित तथ्य और तर्क बताने वाले आलेख सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध हैं। ऐसे में पहले ही महीनों जेल रह चुके एक जनप्रतिनिधि पर मुकदमा चलाने की अनुमति देना वैसे ही अटपटा है। मनीष सिसोदिया के खिलाफ तो भ्रष्टाचार के सबूत हैं और ना कोई धन बरामद हुआ है। फिर भी उन्हें जेल में रखकर भ्रष्ट साबित किया जा चुका है। उल्टे वे ऐसे और इतने काम कर चुके हैं जिसका श्रेय आजाद भारत में शायद ही किसी जनप्रतिनिधि को है। इसके बावजूद वे पहले ही जेल काट चुके हैं और आजाद भारत के गिनती के ऐसे नेताओं में हैं। अब मुकदमा चलाने की अनुमति देने का मतलब यही है कि राष्ट्रपति भवन का सूचना तंत्र स्वतंत्र और निष्पक्ष काम नहीं कर रहा है। राजभवनों का तो लोगों को पता चल गया था।एक अच्छे नेता को बदनाम करके चुनाव हरा देना वैसे भी देश या देश की राजनीति के हित में नहीं है। राष्ट्रपति से यह अपेक्षा तो की ही जा सकती है कि उनका फैसला सबकुछ जानसमझ कर लिया गया होगा।   

आज राष्ट्रपति के आदेश के अनुसार एफआईआर करा दिये जाने की खबर है और अगर मनीष सिसोदिया के अच्छे काम की जांच होगी तो सत्येन्द्र जैन के अच्छे काम, सीसीटीवी लगाने के लिए एफआईआर है और इसकी भी जांच होगी। मैं नहीं कहता कि जांच नहीं होनी चाहिये या घोटाला नहीं हुआ है। तथ्य यह है कि जिसने काम किया उसकी जांच हो रही है उसे भ्रष्ट करार दिया जा चुका है। दूसरी ओर, यह सब उसकी सह पर हो रहा है जिसके नेतत्व में किसी ने ऐसे काम तो छोड़िये, कोई काम ही नहीं किया है। शासन के संकेत नहीं है और आरोपों पर कार्रवाई नहीं हुई, डिग्री संदिग्ध है तो जांच नहीं हुई है। 20,000 करोड़ के घोटाले को छिपाने के लिए संदिग्ध अफसर को लगाया गया फिर अफसर को बचाया गया। सवाल पूछने वालों को जेल हो गई। हरेन पंडया का मामला आज इसीलिये चर्चा में है लेकिन वह भी पहले पन्ने पर नहीं है। यही नहीं, राज्यसभा में सरकार ने कल स्वीकार किया कि दस साल में नेताओं के ख़िलाफ़ दर्ज ईडी के 193 मामलों में से केवल दो में आरोप सिद्ध हुए हैं। यह खबर भी आज पहले पन्ने पर नहीं है। मणिपुर भी आज पहले पन्ने पर नहीं है। अकेले हिन्दू की लीड का शीर्षक है, मणिपुर में शांति करार के कुछ ही दिन बाद फिर हिंसा भड़की, एक मरा। आज के अखबारों में नागपुर का फॉलो-अप भी नहीं है। द हिन्दू की सेकेंड लीड के अनुसार अभी तक 84 लोग पुलिस की हिरासत में लिये जा चुके हैं। आप जानते हैं कि हिंसा ‘अफवाह’ फैलने से हुई थी और इसका संबंध मुख्यमंत्री ने जो कहा उससे भी हो सकता है। दूसरी ओर, 21 लाख का ईनाम देने की घोषणा करने वाले के खिलाफ कार्रवाई की खबर नहीं है। खबर यह है कि आपत्तिजनक नारे लगाने वालों की भीड़ ने एक महिला कांस्टेबल से छेड़छाड़ की और दंगाइयों के एक समूह ने उसकी वर्दी खींची। अमर उजाला का शीर्षक है, नागपुर हिंसा का मास्टरमाइंड फहीम गिरफ्तार, 1250 पर मुकदमा दर्ज। अब तक 80 आरोपी पकड़े गये हैं। जो खबर बड़ी है या शीर्षक होना चाहिये था वह सिंगल कॉलम में छपी है और शीर्षक रिवर्स में है। इसके अनुसार, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंगदल के आठ कार्यकर्ताओं ने समर्पण किया है। इनके खिलाफ धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने का केस दर्ज किया गया है।

अकले फहीम मास्टरमाइंड है और उसका नाम शीर्षक में है लेकिन दंगाइयों का दूसरा समूह, विश्व हिन्दू परिषद और बजरंगदल के आठ कार्यकर्ता समर्पण करने के बावजूद शीर्षक में नहीं हैं। नवोदय टाइम्स ने फहीम को शीर्षक में एमडीपी (माइनॉरिटी डेमोक्रेटिक पार्टी) नेता फहीम लिखा है। उपशीर्षक में बताया है कि फहीम, गडकरी के खिलाफ चुनाव लड़ चुका है। खबर में लिखा है, यह पूछे जाने पर कि क्या फहीम खान ही मास्टर माइंड है, नागपुर के पुलिस आयुक्त वीरेन्द्र सिंघल ने कहा कि हमलावरों की पहचान के प्रयास जारी हैं। यहां आरएसएस को ज्ञान प्राप्त होने की बात दो कॉलम में है। विश्व हिन्दू परिषद और बजरंगदल के आठ कार्यकर्ताओं ने समर्पण की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यह सब इतना सामान्य है कि अलग से पूछने लायक मुद्दा नहीं है और अखबार जो चाहते हैं वो संदेश फैला देते हैं। इसमें मुख्यमंत्री ने जो कहा, अफवाह नहीं रोकी और आरएसएस ने जो अब कहा – सब का समय ठीक होता तो दंगा नहीं होती और जाहिर है कि सब सोची समझी योजना का भाग है। वह राजनीति हो सकती है पर मीडिया बता क्यों नहीं रहा है या अपनी भूमिका समझ ही नहीं रहा है। हालांकि नहीं समझता तो आज राष्ट्रपति के भाषण की उपेक्षा क्यों करता। मुझे लगता है कि मीडिया की भूमिका बहुत ही खराब है और इसे शीघ्र ठीक किये बगैर भाजपा के चुनाव हारने की उम्मीद नहीं करनी चाहिये। हालांकि अभी वह मुद्दा नहीं है।

आप जानते हैं कि विश्व हिन्दू परिषद और बजरंग दल ने औरंगजेब के मकबरे को हटाने की मांग की थी, मुख्यमंत्री ने अपनी (या सरकार की) ‘मजबूरी’ बताई उसके बाद अफवाह फैलने से हिंसा हुई। कहने की जरूरत नहीं है कि इससे निपटना भी राज्य सरकार का काम था और राज्य सरकार न सिर्फ पूरी तरह नाकाम रही है मुख्यमंत्री ने आग में घी डालने का काम भी किया है। खबर यह भी है कि आरएसएस ने अब कहा है कि औरंगजेब प्रासंगिक नहीं हैं। बेशक, आरएसएस ने यह बात बहुत देर से कही है और अफवाह फैलने या मुख्यमंत्री के मजबूरी बताने से पहले कही होती तो स्थिति कुछ और होती। आज इंडियन एक्सप्रेस ने अंदर के पन्ने पर (पहले पन्ने पर पत्रकारिता पुरस्कार की खबर है) पांच कॉलम में छापा है। टेलीग्राफ में यह सेकेंड लीड है और शीर्षक में ही कहा गया है कि यह समझ देर से आई! हालांकि, इंडियन एक्सप्रेस में भी फ्लैग शीर्षक है, नागपुर हिंसा के दो दिन बाद। मीडिया का एक बड़ा वर्ग हेडलाइन मैनेजमेंट के साथ संघ परिवार को संरक्षण देने, प्रचार करने की पत्रकारिता कर रहा है और राष्ट्रपति ने इमरजेंसी में एक्सप्रेस की भूमिका की चर्चा की। अभी की पत्रकारिता के लिए सिर्फ आदर्श बताये हैं।

इसके बावजूद दैनिक जागरण जैसे हिन्दी के अखबार में आज शीर्षक है, भारत की बेटी सुनीता का धरती पर स्वागत। कहने की जरूरत नहीं है कि भारत की बेटी 278 दिन फंसी रही तो ना भारत ने चिन्ता दिखाई न दैनिक जागरण ने। मुझे याद आता है कि हम सुंरग और खान में फंसे लोगों के मामले में कितने लाचार रहे हैं और सीवर में घुसकर मनुष्यों को काम करने से रोक नहीं पा रहे हैं। अभी भी सीवर में घुसकर काम करने वाले मारे जाते हैं और मौत की इन खबरों को वो महत्व नहीं मिलता है जो सुनीता विलियम्स के भारत की बेटी होने पर मिला है। हालांकि, इसमें कोई शक नहीं है पर मामला पूरा तो बताते। उदाहरण के लिए दैनिक जागरण ने प्रधानमंत्री के ट्वीट से एक पुरानी फोटो छापी है जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सुनीता विलियम्स से हाथ मिला रहे हैं। जैसा कि मैंने पहले कहा, कल टेलीग्राफ की ‘कोर्स करेक्शन’ वाली खबर चर्चा में थी और इसलिए इस फोटो का भी खास महत्व है। यह फोटो मेरे किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है। दैनिक जागरण में यह टॉप पर है। अमर उजाला ने प्रधानमंत्री मोदी का संदेश टॉप पर छापा है। संदेश है, सपनों को हकीकत में बदलने का साहस किया। इसी पत्र के आधार पर द टेलीग्राफ ने कोर्स करेक्शन वाली खबर दी थी। पेश है, खबर के गूगल अनुवाद का संपादित रूप : सुनीता विलियम्स पत्र लिखकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने व्यवहार (स्वभाव) में सुधार किया (दिखाया)। तब मीडिया की रपटों में कहा गया था कि उन्होंने विलियम्स की उपलब्धियों को स्वीकार करने से लगातार इनकार किया था, क्योंकि वह उनके कट्टर विरोधी, गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की चचेरी बहन थीं। पंड्या के पिता ने 2003 में अपने बेटे की हत्या के लिए नरेन्द्र मोदी को जिम्मेदार ठहराया था।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नासा की अंतरिक्ष यात्री सुनीता विलियम्स को पत्र लिखा है और उन्हें भारत आने का निमंत्रण दिया है। एक मार्च को लिखे गए और पूर्व नासा अंतरिक्ष यात्री माइक मैसिमिनो के माध्यम से भेजे गए इस पत्र को मंगलवार को केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्री जितेंद्र सिंह ने एक्स पर साझा किया। इसमें मोदी ने लिखा है, “भले ही आप हजारों मील दूर हों, लेकिन आप हमारे दिलों के करीब हैं। भारत के लोग आपके अच्छे स्वास्थ्य और आपके मिशन में सफलता के लिए प्रार्थना कर रहे हैं।” “आपके लौटने के बाद, हम आपको भारत में देखने के लिए उत्सुक हैं। भारत के लिए अपनी सबसे लायक बेटियों में से एक की मेजबानी करना खुशी की बात होगी।” विलियम्स का स्वागत करने में आगे आकर मोदी अब 2007 में उन्हें सम्मानित करने में हुई देरी पर सफाई देते दिखाई दिए। भारतीय-अमेरिकी की पहली अंतरिक्ष उड़ान के बाद उन्होंने महिलाओं के लिए 29 घंटे और 17 मिनट के कुल चार स्पेस वॉक का विश्व रिकॉर्ड बनाया था। गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री मोदी ने विलियम्स के पृथ्वी पर लौटने के तीन महीने बाद राज्य में उनके परिवार से मिलने के लिए उनका स्वागत करने का इंतजार किया। तब मीडिया रपटों में कहा गया था कि उन्होंने विलियम्स की उपलब्धियों को स्वीकार करने से लगातार इनकार कर दिया था, क्योंकि वह उनके कट्टर विरोधी गुजरात के पूर्व गृह मंत्री हरेन पंड्या की चचेरी बहन हैं। मीडिया में पांड्या के हवाले से दावा किया गया कि मोदी ने 27 फरवरी 2002 को गुजरात दंगों के दौरान नौकरशाहों और पुलिस अधिकारियों के साथ बैठक की थी और उन्हें निर्देश दिया था कि वे “लोगों को अपनी हताशा व्यक्त करने दें और हिंदू प्रतिक्रिया के रास्ते में न आएं”। खबरों के अनुसार, इस बयान ने मामले और इसके राजनीतिक निहितार्थों के बारे में चर्चाओं को फिर से हवा दे दी है।

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