
संजय कुमार सिंह
आज के अखबारों से पहले पन्ने की खबरों की कमी लगती है। सभी अखबारों की लीड अलग है और बिना विज्ञापन के इंडियन एक्सप्रेस के पहले पन्ने पर तीन कॉलम की एक, दो कॉलम की तीन और सिंगल कॉलम की चार तस्वीरें हैं। इनमें सिर्फ एक पुरानी (कल की) खबर से संबंधित है, एक उन्नी का कार्टून है बाकी सब खबर के साथ की फोटुएं हैं। सबसे बड़ी तस्वीर पश्चिम बंगाल के राज्यपाल के दौरे की है। कैप्शन के अनुसार, राज्यपाल ने माल्दा के एक स्कूल स्थित शर्णार्थी शिविर में मु्र्शिदाबाद से पलायन कर गये लोगों से मुलाकात की। इसके साथ कोई खबर नहीं है। कैप्शन में बताया गया है कि राज्यपाल आज मु्र्शिदाबाद जायेंगे। खबर अंदर होने की जानकारी दी गई है। यह खबर दि एशियन एज में सिंगल कॉलम में है। शीर्षक है, राज्यपाल ने दीदी की सलाह नहीं मानी, माल्दा के राहत शिविर में दंगा पीड़ितों से मिले। अमर उजाला ने इस खबर को दो कॉलम में छापा है। फ्लैग शीर्षक है,ममता की अपील ठुकरा कर माल्दा पहुंचे राज्यपाल। मुख्य शीर्षक है, शिविर पहुंच पीड़ितों का दर्द साझा किया बोस ने कहा, उन्हें घर पहुंचाना प्राथमिकता। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा के गुजरात दंगों के 20 साल होने पर 2022 में छपी एक खबर के अनुसार, विस्थापित मुस्लिम परिवार आज भी अस्थायी शिविरों में रहने के लिए मजबूर। न्यूजक्लिक की इस खबर में कहा गया था, “जैसे ही आप गुजरात के अहमदाबाद में एक शहरी झुग्गी बस्ती सिटिज़न नगर के पास पहुँचते हैं, कुख्यात 75 फीट ऊँचे पिराना कचरे के ढेर की दुर्गंध लगातार तीव्र होती जाती है। सिटीजन नगर तक जाने लायक कोई सड़क नहीं है। झुग्गी बस्ती के साथ–साथ एक खुला नाला बहता है जहाँ के निवासी आस–पास के रासायनिक कारखानों से निकलने वाले धुएं में मिश्रित हवा में निरंतर सांस लेने के लिए मजबूर हैं। सिटीज़न नगर 2002 के दंगों में विस्थापित हुए करीब 40 मुस्लिम परिवारों का आवास है, जो पिछले 20 वर्षों से यहाँ पर रह रहे हैं।“
मणिपुर का हाल आप जानते हैं। पर बंगाल के मामले में हर बार यह प्रचारित किया जाता है कि प्रशासन कमजोर है, दंगाई मुसलमानों के खिलाफ कार्रवाई नहीं की जाती है और (राज्य में) पीड़ित हिन्दू ही होते हैं। राज्यपाल का यह दौरा इन्हीं खबरों को प्रमुखता दिलाने के लिए है और भाजपा के हेडलाइन मैनेजमेंट का भाग कहा जा सकता है। वरना पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने गुरुवार को इस बात पर जोर दिया था कि दंगा प्रभावित मुर्शिदाबाद जिले में विश्वास बहाली के उपाय किए जा रहे हैं। उन्होंने राज्यपाल सीवी आनंद बोस से हिंसा प्रभावित इलाकों का प्रस्तावित दौरा टालने का आग्रह किया था। मुख्यमंत्री ने कहा, “सामान्य स्थिति वापस आ रही है और समय की मांग है कि लोगों में विश्वास पैदा किया जाए। यह काम राज्य प्रशासन कर रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो मैं भी जा सकती थी। मैं क्यों नहीं जा रही हूं? मैं सही समय पर जाऊंगी। अगर मैं अभी जाऊंगी तो दूसरे लोग भी जाना चाहेंगे।“ इसके बावजूद राज्यपाल ने कहा था कि वे कुछ इलाकों का दौरा करेंगे और लोगों से मिलकर “खुद जमीनी हालात देखेंगे“। आज एनडीटीवी डॉट इन की खबर है, गवर्नर, एनसीडब्ल्यू और मानवाधिकार आयोग की टीम – तीनों मुर्शिदाबाद में। यही नहीं, खबर है, मुर्शिदाबाद में पिछले दिनों जो भी हुआ, उस पर ममता बनर्जी बुरी तरह से घिरती नजर आ रही हैं। एक तरफ राज्यपाल मालदा पहुंचे हैं तो दूसरी तरफ राष्ट्रीय महिला आयोग की टीम भी पहुंच गई है। राष्ट्रीय मानवाधिकार की टीम भी मुर्शिदाबाद में मौजूद है। इससे ममता दीदी की टेंशन बढ़ गई है। यह तब है जब ममता बनर्जी ने हिंसा के लिए बीजेपी को जिम्मेदार ठहराया है।
एबीपी लाइव डॉट कॉम के अनुसार मुख्यमंत्री ममजा बनर्जी ने कहा, “हम सर्व धर्म समभाव में विश्वास करते हैं। मैं रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद में विश्वास करती हूं। मैं आपसे अनुरोध करती हूं कि अगर भाजपा की बात पर उत्तेजित होकर बंगाल में कोई अशांति पैदा करना चाहता है तो उसे नियंत्रित करें… जब हम दुर्गा पूजा मनाते हैं, तो वे कहते हैं कि हम मनाने नहीं देते। घर–घर में सरस्वती पूजा मनाई जाती है और वे कहते हैं कि हम ऐसा नहीं करने देते हैं। सबको सभी धर्मों का सम्मान करना चाहिए, यही परंपरा है।” मुझे याद नहीं है कि भाजपा के किसी नेता ने शांति की ऐसी अपील कभी, कहीं, किसी से की हो। दूसरी ओर, इंडिया टुडे हिन्दी डॉट कॉम के अनुसार, ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार पर एक व्यापक साजिश रचने का आरोप लगाया है और कहा है कि इसका दायरा दूसरे देशों तक फैला है। ममता ने संकेत दिया कि जिस टाइमिंग और जल्दबाजी के साथ केंद्र ने वक्फ (संशोधन) विधेयक के लिए संसदीय मंजूरी और राष्ट्रपति की सहमति हासिल की, वह कानून बनाने की मंशा से कहीं अधिक का मामला लगता है। 16 अप्रैल को कोलकाता में सीएम ममता ने इमामों और मुअज्जिनों (मस्जिद में अजान देने वाला) के साथ एक बैठक की थी। इसमें उन्होंने इस कथित जल्दबाजी पर सवाल उठाते हुए कहा, “वक्फ संशोधन को लेकर आप इतनी जल्दबाजी में क्यों थे? क्या आपको बांग्लादेश की स्थिति के बारे में पता नहीं था?”
यह तो हुई मुर्शिदाबाद की बात जो वक्फ कानून के खिलाफ हुए दंगे के बाद की खबरों का हिस्सा है। स्पष्ट है कि मुर्शिदाबाद के मामले को भाजपा का इकोसिस्टम पूरा महत्व दे रहा है। मीडिया दीदी को टेंशन जैसी खबरें दे रहा है। पर दिल्ली में भी सांप्रदायिक तनाव है, हिन्दू युवक की हत्या हो गई है और खबर दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स की एक खबर के अनुसार, युवक की हत्या के बाद सीलमपुर में तनाव है और लोगों ने सड़क जामकर प्रदर्शन भी किया है। उत्तर पूर्वी जिला डीसीपी आशीष मिश्रा ने देर रात कुणाल की हत्या के आरोप में एक महिला जिकरा को गिरफ्तार करने की पुष्टि की। पर खबर तो खबर है हालांकि पहले पीड़ित या आरोपी का धर्म नहीं बताया जाता था। इसके लिए नाम छापने से भी बचा जाता था पर अब वह सब नहीं है। खबर के अनुसार, सीलमपुर इलाके में हुई कुणाल की हत्या के बाद से इलाके में सांप्रदायिक तनाव का माहौल है। इलाके में एक समुदाय के परिवारों ने अपने घरों के बाहर पलायन करने और यह मकान बिकाऊ है, जैसे पोस्टर लगाए हैं। साथ ही सीएम से सुरक्षा की गुहार लगाई है। तनाव और विरोध-प्रदर्शन को देखते हुए मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किए गए हैं। शुक्रवार को जुमा की नमाज व प्रदर्शन को देखते हुए सीलमपुर जे ब्लाक को पुलिस ने छावनी में बदल गया। दिनभर लोग धर्मपुरा लाल बत्ती के पास सर्विस रोड पर जुटे रहे पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन किया। कहने की जरूरत नहीं है कि मुर्शिदाबाद मामले को हेडलाइन मैनेजमेंट के लिए तूल नहीं दिया गया होता तो दिल्ली के लिये यह बड़ी खबर थी। पुलिस के खिलाफ प्रदर्शन हो रहा है तो मामला वैसा ही है जैसा मुर्शिदाबाद में होने का प्रचार किया जा रहा है। जो भी हो, पक्षपाती रिपोर्टिंग से वास्तविक स्थिति का अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है और मुद्दा वह नहीं है। मैं यह बताना चाहता हूं कि रिपोर्टिंग कितनी पक्षपाती है और हेडलाइन मैनजमेंट पर कितना जोर है। इसमें सरकारी सेठ से एनडीटीवी को खरीदवा लिया जाना और नेशनल हेरल्ड मामले में परेशान किया जाना शामिल है।
खबरों में पक्षपात का ही मामला है कि आज उपराष्ट्रपति धनखड़ के खिलाफ खबर पहले पन्ने पर प्रमुखता से नहीं है। कल मैंने यहां लिखा था, सरकार के पक्ष में और संविधान के खिलाफ बैटिंग करने के लिए उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ स्वयं उतर आये हैं। उनके इस प्रयास की खूब आलोचना हुई है। आज छपी खबरों के अनुसार उपराष्ट्रपति के बयान के बाद बहस छिड़ गई है। लेकिन खबर पहले पन्ने पर नहीं है जबकि धनखड़ के आरोप या उनका पक्ष कल ज्यादातर पहले पन्ने पर था। टाइम्स ऑफ इंडिया ने तीखा संपादकीय लिखा था लेकिन खबर पहले पन्ने पर नहीं थी। आज भी नहीं है। द हिन्दू की एक खबर कल शाम ही चर्चा में थी। इसके अनुसार, विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ धनखड़ की टिप्पणी की आलोचना की। खबर के अनुसार, निर्दलीय सांसद कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने कभी किसी राज्यसभा अध्यक्ष को इस तरह का ‘राजनीतिक बयान’ देते नहीं देखा; डीएमके सदस्य विल्सन ने पूछा कि राम जन्मभूमि मामले में राहत प्रदान करने के लिए जिस अनुच्छेद 142 का इस्तेमाल किया गया था, उसे अब ‘परमाणु मिसाइल’ क्यों कहा जा रहा है। द हिन्दू ने आज पहले पन्ने पर बताया है कि विपक्ष की आलोचना की यह खबर अंदर है। हालांकि, हिन्दू ने राज्यपाल के दौरे की खबर भी अंदर छापी है और पहले पन्ने पर सूचना भर है। लेकिन इंडियन एक्सप्रेस में धनखड़ बाबू पहले पन्ने पर नहीं हैं। सिंगल कॉलम का उन्नी का कार्टून आज जरूर धनखड़ पर है। हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम की खबर धनखड़ की फोटो के साथ टॉप पर है। शीर्षक है, विपक्ष ने न्यायपालिका पर टिप्पणी के लिए धनखड़ पर निशाना साधा। इस खबर के साथ बताया गया है कि विस्तार अंदर है। यह द हिन्दू में आज अंदर के पन्नों पर छपी खबरों की पट्टी से अलग है। हिन्दुस्तान टाइम्स में ऐसी पट्टी नहीं है और इंडियन एक्सप्रेस में पट्टी जैसा विज्ञापन है। द टेलीग्राफ में भी यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन यहां लीड एक स्कूल में फंसी 300 बच्चियों की कहानी है और इसमें मुस्लिम बच्चियां भी थीं। मुर्शिदाबाद की खबर को अलग तूल देना ही है तो इस तरह की खबरें भी होनी चाहिये वरना मुख्यमंत्री के आरोपों तथा अपील के बाद कम से कम राज्यपाल का दौरा नहीं होना चाहिये था। राजनीति न भी हो तो पैसे की बर्बादी है ही।



