अरशद जमाल-
मैं अरशद जमाल, पिछले 21 वर्षों से एनडीटीवी का हिस्सा रहा। इटावा कार्यक्षेत्र रहा। पत्रकारिता को न सिर्फ पेशा बल्कि अपना धर्म माना। चंबल के डाकू निर्भय गुर्जर का इंटरव्यू हो, पुलिस-डाकू मुठभेड़ की लाइव कवरेज हो, या फिर सैफई मेडिकल कॉलेज में नकली पेसमेकर घोटाले का खुलासा — हर रिपोर्ट से मैंने चैनल की साख और विश्वसनीयता को मजबूत किया।
लेकिन 21 साल की ईमानदारी का इनाम क्या मिला?
यूपी हेड रणवीर सिंह ने बिना कोई गलती बताए, एक झटके में मेरा करियर खत्म कर दिया। मेरी जगह इटावा की कमान एक ऑटोमोबाइल दुकान चलाने वाले व्यक्ति को सौंप दी गई। क्या यही एक समर्पित स्ट्रिंगर की कीमत है?
हम जैसे पत्रकार दशकों तक एक संस्थान से जुड़े रहते हैं, समाज में एक पहचान बनाते हैं — लेकिन एक खबर में थोड़ी देर हो जाए तो हमें जलालत और बेइज्जती के साथ बाहर निकाल दिया जाता है। आज भी दिल से यही सवाल उठता है — क्या यही न्याय है?
2014 से हमें नियमित भुगतान नहीं मिला, फिर भी हम चैनल के साथ डटे रहे। अडानी समूह के अधिग्रहण के बाद हमारी स्टोरीज़ की कीमतें आधी कर दी गईं, फिर भी हम चुपचाप काम करते रहे।
अब हाल यह है कि स्ट्रिंगरों की आवाज न कहीं सुनी जा रही है, न उनकी पीड़ा महसूस की जा रही है। जो ब्यूरो प्रमुख अपने लोगों को पैसे लेकर नियुक्त कर रहे हैं, वे हम जैसे ईमानदार पत्रकारों को बिना मौका दिए बाहर कर रहे हैं।
यशवंत जी, आपसे विनम्र निवेदन है कि आपके माध्यम से हमारी आवाज राहुल कंवल जी तक पहुंचाएं। आप जैसे निष्पक्ष और निडर पत्रकार ही हम जैसे जमीनी स्तर पर काम करने वाले रिपोर्टर्स की आखिरी उम्मीद हैं।
हम कोई बड़ा ओहदा नहीं चाहते, बस न्याय चाहते हैं।
— अरशद जमाल
(पूर्व संवाददाता, एनडीटीवी — इटावा, उत्तर प्रदेश)
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