प्रीति अज्ञात जैन-
आज चार दिन बाद यहाँ आई हूँ तो एक अलग ही तमाशा देखने को मिल रहा है। नाम जाना तो आश्चर्य नहीं हुआ। मुझे समझ नहीं आता, कृष्ण कल्पित जी की भाषा और व्यवहार से पूरी तरह परिचित होते हुए भी साहित्य बिरादरी का एक बड़ा वर्ग बार-बार उनके सामने क्यों नतमस्तक हो जाता है? क्या किसी कवि का बड़ा होना, उसके मनुष्य बने रहने से अधिक महत्वपूर्ण है? एक व्यक्ति जिसकी असभ्यता और अशिष्टता का भरा-पूरा इतिहास रहा है, उसका बहिष्कार न करने के पीछे क्या मजबूरी है?
सोशल मीडिया पर सक्रिय हुए 12-13 वर्ष हो गए हैं और उसी के आधार पर पूरे विश्वास और दुख के साथ कह रही हूँ कि कुछ दिनों बाद ये पुनः किसी मंच की शोभा बढ़ाते नज़र आएंगे। कारण यही कि लेखन जगत में इन जैसी मानसिकता लिए कई लोग हैं और सभी पीठ पीछे इनके साथ खड़े हैं। किसी का कुछ नहीं बिगड़ा। यहाँ तक कि जिन स्त्रियों के लिए उन्होंने बुरा-भला कहा; उनमें से कुछ ने चुप्पी साध ली और कुछ बाद में उनके दरबार में हाजिरी लगाती नज़र आईं।
इन सभी की हिम्मत बढ़ती ही इसलिए है। एक बात और है कि अगर स्त्री स्वयं अपने पक्ष में नहीं खड़ी होगी तो दूसरे भी क्यों ही आएंगे। आजकल सब यही सोच चुप रह जाते हैं कि समय बीत जाने पर इन्हें फिर साथ हो जाना है, मैं ही क्यों बुरा/बुरी बनूँ!
यह मेरा व्यक्तिगत अनुभव भी है कि जब भी अन्याय का पुरजोर विरोध किया तो फोन या संदेश द्वारा तो सब पीठ ठोकते हैं कि बहुत बढ़िया लिखा लेकिन कुछ समय बाद वही लोग उस व्यक्ति के साथ खड़े नज़र आते हैं। इतनी खीज होती है कि क्या कहूँ! सबको खुश रखने का वायरस, हिन्दी लेखकों में अरसे से देखती आ रही हूँ पर “क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?”
‘साहित्य’ का प्रयोजन समाज के सभ्य, हितकारी, सकारात्मक रूप में है अतः फिलहाल तो यही उम्मीद रखती हूँ कि इसका अहित करने वालों की मानसिकता में सुधार हो और उन्हें अपने कृत्य पर शर्मिंदगी का अनुभव हो। दंड मिलेगा नहीं, यह मैं जानती हूँ।
2017 में इन्हीं से संबंधित एक पोस्ट लिखी थी। FB timeline पर दिख नहीं रही पर मेरे ब्लॉग पर मौजूद है। पढ़ना चाहें तो लिंक comment box में दे रही हूँ। निजी व्यस्तता के चलते यहाँ कुछ दिन सक्रिय नहीं हूँ। पुराना शेयर करती रहती हूँ। इस विषय पर लिखना जरूरी लगा सो लिखा।



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