उपेंद्र राय-
7 जून को मेरे लंदन प्रवास के दौरान अजीत जी मेरे कमरे में हिल्टन पार्क लेन में आए थे और ये तस्वीर मैंने खुद ली थी। वे भारत एक्सप्रेस परिवार का अभिन्न हिस्सा थे। वे कान्स फिल्म फेस्टिवल की जूरी में थे और हर साल इस दौरान वहां जाया करते थे।
लगभग दो महीने वहां रहकर वे मुंबई जाते थे, जहां वे हाल ही में दिल्ली से शिफ्ट हुए थे।उनका मन फिल्मों और उनकी बारीकियों में रमता था। फिल्म की आलोचना में उनकी गहरी पैठ थी। देश ने आज एक उम्दा फिल्म क्रिटिक खो दिया। मेरे और मेरे भारत एक्सप्रेस परिवार की ओर से उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि।
मेरे जीवन में अजीत जी का एक कोना हमेशा खाली रहेगा। आज मेरे लिए यह एक अत्यंत भावुक क्षण है, क्योंकि वे मुझसे करीब 24 वर्षों से जुड़े हुए थे।
अरुण शीतांश-
अभी – अभी सूचना मिल रही है, फेसबुक से कि अजीत राय नहीं रहे। मुझसे तो कई बार मुलाकात हुई।वे आरा से महज चालिस किलोमीटर दूर प्रख्यात शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्लाह खान साहब की नगरी और प्रसिद्ध साहित्यकार कुमार नयन का एक छोटे से शहर डुमरांव के रहने वाले थे।
हमारी पहली मुलाकात प्रसिद्ध साहित्यकार निलय उपाध्याय के घर पर हुई।वहीं पता चला कि निलय जी के यहां अजीत जी अपनी होने वाली पत्नी को ले आए,वही फेरे लिए।वह किस्सा पुराना और रोचक है।
वे साहित्यिक स्थिति पर बारिक नज़र रखते थे। साहित्यिक पत्रकारिता की शुरुआत अजीत राय ने की।जिसका बढ़वा हंस पत्रिका के पूर्व संपादक रहे राजेन्द्र यादव ने दी।वे लगातार लंबे -लंबे रिपोर्ताज लिखे। प्रमाण के तौर पर हंस के पुराने अंक को देखा जा सकता है। अंतिम मुलाकात आरा रेलवे स्टेशन के समीप रिक्शे पर बैठे हुई।
वे एक सहज इंसान थे। और वाणी के धनी। हमने बहुत करीब को आज खो दिया है।एक रिक्तता महसूस कर रहा हूं। मुझे बहुत मानते रहे। कोई भी कहीं बाहर चर्चा करता वे शेयर करते।
मैं ज्यादा लिख नहीं पा रहा हूं। Nilay Ji Upadhaya ने अभी लिखा अपने खास मित्र अजीत राय के लिए –
झरने लगे है फूल
वक्त से पहले श्रद्धांजलि
विशाल तिवारी-
Ajit Rai जी का जाना का आहत कर गया। अधिकारपूर्वक सिनेमा और कला पर कलम चलाने वाले हिंदी क्षेत्र के चुनिंदा लोगों में शुमार। विश्व सिनेमा को लेकर दुर्लभ समझ। राष्ट्रीय सहारा के संपादकीय दायित्व के दौरान अक्सर उनसे बातचीत होती थी। अपनी कृतियों के माध्यम से आप सामूहिक स्मृतियों में रहेंगे। आपने अपनी जन्मभूमि बक्सर (बिहार) का राष्ट्रीय पटल पर मान बढ़ाया। सादर नमन
गौरव पांडेय-
अजित राय देश के जाने-माने फ़िल्म एवं नाट्य समीक्षक, सांस्कृतिक पत्रकार और सम्पादक थे। वे पिछले 35 वर्षों से देश के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण राष्ट्रीय अख़बारों-पत्रिकाओं एवं रेडियो-टेलीविजन के लिए काम किया करते थे । उनके हिन्दी में अब तक प्रकाशित लगभग पाँच हज़ार आलेखों, रिपोर्ताज़ों, रपटों, समीक्षाओं, साक्षात्कारों एवं आवरण कथाओं में से अधिकतर देश की सांस्कृतिक पत्रकारिता में मील का पत्थर माने गये । उनकी कई रपटों पर भारतीय संसद में सवाल पूछे गये एवं बहस हुई थी।
वे दूरदर्शन की पत्रिका ‘दृश्यान्तर’ और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की पत्रिका ‘रंग प्रसंग’ के सम्पादक रह चुके थे। आज के समय में अजित राय हिन्दी के सम्भवतः अकेले ऐसे पत्रकार थे जिन्हें सच्चे अर्थों में अन्तरराष्ट्रीय कहा जा सकता था और उन्हें नोबेल पुरस्कार समारोह में भी आमन्त्रित किया जा चुका था
वे हिन्दी के पहले ऐसे पत्रकार हैं जिन्हें दुनिया के सबसे प्रतिष्ठित कॉन फ़िल्म समारोह ने विश्व के सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म समीक्षकों में शामिल किया गया था,और भारत के अन्तरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह (गोवा) की प्रतिष्ठित चयन समिति (ज्यूरी) में कई बार मनोनीत किया गया था।
उन्होंने हिन्दी पत्रकार के रूप में विश्व हिन्दी सम्मेलन (न्यूयॉर्क, 2007) में शिरकत की थी , मास्को में पहली बार उन्होंने भारतीय फ़िल्मों के फ़ेस्टिवल (2014) की शुरुआत की थी, वे ओस्लो (नार्वे) के बॉलीवुड फ़ेस्टिवल के सलाहकार थे और बर्लिन (जर्मनी) के भारतीय फ़िल्म समारोह (2012) के सह-निदेशक भी रहे उन्होंने स्वीडन के उपसाला विश्वविद्यालय में पहली बार भारतीय फ़िल्मों का फ़ेस्टिवल (2012) शुरू किया था। अजित राय को ब्रिटिश संसद के उच्च सदन हाउस ऑफ़ लार्ड्स में आयोजित हिन्दी समारोहों में व्याख्यान देने के लिए नियमित रूप से आमन्त्रित किया जाने लगा था। सितम्बर 2012 में ईरान के राष्ट्रपति ने अजित राय को विशेष अतिथि के रूप में न्यू होरिजन फ़िल्म फ़ेस्टिवल तेहरान में आमन्त्रित किया था। उन्हें सिनेमा और रंगमंच पर लेखन के लिए सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म एवं नाट्य समीक्षक के दर्जनों पुरस्कार एवं सम्मान मिल चुके थे। अजित राय को विनम्र श्रद्धांजलि –
फेसबुक से खबर मिली की लेखक एवं फिल्म समीक्षक अजित राय नहीं रहे। अजित राय का नाम हम सबने पहली बार राजेन्द्र यादव के हंस में पढ़ा था। दिल्ली आने के बाद जब वह पहली बार कहीं मिले तो मैं उन्हें पहचानता नहीं था। परिचय के बाद उन्होंने कहा कि आप बहुत अच्छा लिखते हैं। उन्हें मेरे कुछ ब्लॉग पसन्द आए थे। पहले मुझे यह औपचारिकता लगी मगर अन्य कई मुलाकातों के बाद लगा कि यह उनकी विनम्रता थी।
वे हिन्दी के ज्यादातर नामी लेखकों से निजी रूप से परिचित थे। मुझे लगता है कि “अच्छा लिखते हैं” कहना उनका तरीका था मुझ जैसे युवा का उत्साह बढ़ाने का। ऐसा इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि हिन्दी साहित्य के दायरे में ऐसे बयान देने वाले ज्यादातर लोगों की मंशा यही रहती है कि आप मेरे गैंग के पट्ठे बन जाओ। अजित जी ने ऐसा कोई प्रयास कभी नहीं किया। जब वे दूरदर्शन की पत्रिका के सम्पादक बने तो मुझसे सिनेमा पर लिखवाया। लिखवाया ही क्योंकि मैं असाइनमेंट राइटिंग के मामले में आलसी रहा हूँ। अपने मन से दिन भर लिख सकता हूँ। कोई और जिम्मा दे दो तो अंगुलियाँ जम जाती हैं फिर भी उनके लिए लिखा।
पिछले एक दशक से वे ज्यादातर दुनिया भर के चर्चित सिने पुरस्कारों में जाकर वहाँ आने वाली फिल्मों पर लिखने के लिए जाने जाते थे। मैंने एक बार पूछा था कि एक हिन्दी लेखक होकर आप यह सब कैसे मैनेज कर लेते हैं। उन्होंने छूटते ही कहा कि आप चाहें तो आप भी कर सकते हैं, आप तो बहुत अच्छा लिखते हैं! फिर उन्होंने बताया कि किस-किस जगह पर उनके कौन-कौन से मित्र हैं। वो अक्सर अपने वैश्विक सिने मित्रों की तस्वीरें भी शेयर किया करते थे। मुझे यह देखकर अच्छा लगता था कि हिन्दी का आदमी इतना खुलकर दुनिया में घूमता-फिरता है।
अजित जी, बेहद मनोरंजक बातें करते थे। उनसे ज्यादातर मुलाकात राह चलते ही हुई मगर वो जिंदादिल आदमी थे। हर बार उनकी कही बातों को बाद में मैं दोस्तों के शेयर करके हम लोग खूब हँसते थे। अजित जी की आत्मा जहाँ भी रहे, ऐसे ही जिन्दादिल और खुशदिल रहे, यही कामना है। अगर वहाँ कोई सिने फेस्टिवल हो रहा होगा तो उम्मीद है कि उसकी रिपोर्ट उनके माध्यम से हम तक जरूर आएगी…
आज इतना ही। शेष, फिर कभी। दिवंगत आत्मा हार्दिक नमन
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