प्रभाकर मणि तिवारी-
बचपन से यह कहावत सुनता रहा हूं कि चोर औऱ पुलिस से न तो दोस्ती अच्छी औऱ न ही दुश्मनी. लेकिन अब हाल में लंदन में महंगे इलाज की वजह से अजित राय नामक फिल्म समीक्षक की मौत से मुझे लगता है कि इस सूची में अमीर शब्द को भी जोड़ देना चाहिए.
अजित राय से मैं कभी मिला नहीं था. जनसत्ता में उनकी समीक्षाएं जरूर देखता था. लेकिन फिल्म समारोहों और समीक्षा वगैरह में ज्यादा रुचि नहीं होने की वजह से उनको सरसरी निगाह से देख कर आगे बढ़ जाता था. वैसे भी जनसत्ता जैसे अखबार में किसी दौर में किसी स्ट्रिंगर की रिपोर्ट छपने के बाद उसकी भाषा इतनी बेहतर हो जाती थी कि खुद स्ट्रिंगर भी अपना लिखा पहचान नहीं पाता होगा. यह उस दौर की बात है जब संपादन बेहद चुस्त था, अब की नहीं. इसलिए मुझे यह भी नहीं पता कि उनकी भाषा या लिखावट कैसे थी.
अजित राय के निधन के बाद सोशल मीडिया पर जो मर्सिया लिखी जा रही है उन सबमें एक बात कॉमन है. वो यह कि वो दुनिया के शीर्ष दौलतमंद लोगों में शुमार हिंदुजा बंधुओं के बेहद करीबी थे. ऐसे में उसी लंदन में महज कुछ लाख रुपए के लिए दिल की बीमारी से उनकी मौत गले से नीचे नहीं उतरती. इससे यह बात भी साबित होती है कि अमीरों का कोई मित्र नहीं होता.

वो हिंदुजा बंधुओं के इतने करीबी कैसे बने, यह तो मुझे पता नहीं है. लेकिन एक बात जानता हूं कि हिंदुजा, मित्तल, अंबानी या अडानी जैसे दौलतमंदों का करीबी बनने के लिए खासकर पत्रकारों को स्वाभिमान को तिलांजलि देना ही पहली शर्त होती है. हर सुबह हिंदुजा बंधुओं के साथ सैर करने के बावजूद उनके दिल में पेसमेकर लगाने का खर्च उठाने के लिए कोई आगे नहीं आया.
दो लाख का बिल चुकाने के बाद अजित भारत लौटकर इलाज कराने की सोच रहे थे. मुझे यह सवाल भी साल रहा है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर का समीक्षक-पत्रकार होने और साल में कई महीने विदेश में रहने के बावजूद क्या उनके पास इतने पैसे नहीं थे कि वो वहीं दिल का इलाज करा सकें? पता नहीं हकीकत क्या थी? यह बात तो उनके बेहद करीबी लोग ही बता सकते हैं. लेकिन इलाज में कमी या लापरवाही की वजह से होने वाली कोई भी मौत बेहद दुखद होती है.
अमीरों से अपनी दोस्ती तो कभी नहीं रही. लेकिन उनसे दुश्मनी का एक किस्सा मुझे याद है. मैंने जिस जनपथ समाचार से अपने करियर की शुरुआत की थी उसके मालिक स्व. राजेंद्र बैद के एक करीबी रिश्तेदार गुवाहाटी में रहते थे. साल 1997 में जनसत्ता में सिलीगुड़ी से तबादला होकर गुवाहाटी जाने से पहले राजेंद्र जी ने कहा कि अमुक मेरे भाई हैं, कभी मौका निकाल कर मिल लेना. गुवाहाटी पहुंचने के दो या तीन महीने बाद मैं उनसे मिलने गया था. उन्होंने काफी खातिरदारी की.
उसके बाद एक लंबा किस्सा सुनाया कि कैसे एक बिजनेस पार्टनर से उनकी मोटी रकम दबा ली है और अब कनाडा के मांट्रियल में रहता है. उसके बाद कई महीनों तक वो मुझ पर दबाव डालते रहे कि मैं कनाडा जाकर इस कथित बेईमानी की रिपोर्ट लिखूं. वो आने-जाने का पूरा खर्च उठाने को तैयार थे.
मैंने साफ कहा कि अव्वल तो मैं जाऊंगा नहीं. दूसरी अगर गया भी तो ऐसी रिपोर्ट जनसत्ता में भेजूंगा नहीं. तीसरी कि भेजा भी तो छपेगी नहीं. इसलिए बेहतर है कि हम इस बात को भूल जाएं. करीब एक साल तक वो मेरे पीछे पड़े रहे. आखिर एक दिन जब मैंने दो-टूक जवाब दे दिया तो उन्होंने खुन्नस पाल ली. मेरा नुकसान एकमात्र यह हुआ कि हर साल अपनी कंपनी की जो नई डायरी और कैलेंडर मेरे दफ्तर में भेजते थे वह बंद कर दिया. मैं बच गया.
दफ्तर में मार्केटिंग वालों के सौजन्य से एकाध डायरी मिल ही जाती थी. बाकी लेकर करना क्या था? डायरी मैं लिखता नहीं था और रिपोर्टिंग के लिए छोटे पैड ही काफी थे. उसके बाद नौकरी करने तक अमीर लोगों से एक दूरी बना कर ही रहा. कोलकाता में भी कई लोग पंचतारा होटल में कॉकटेल और डिनर पर बुलाते रहे. मुझे याद नहीं कभी गया होऊं. कोलकाता प्रेस क्लब का बीते 25 साल से सदस्य हूं. लेकिन वहां साल सिर्फ एक दिन अपना वोट डालने ही जाता हूं. जबकि वहां अल्कोहल बेहद सस्ती है और अध्यक्ष से सचिव तक अपने तीन दशक पुराने मित्र ही हैं.
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जय प्रकाश सिंह
July 27, 2025 at 3:26 am
परिचय होना और दोस्ती होना दो अलग अलग बातें हैँ, अक्सर बड़े लोगों, अधिकारियों के साथ फोटो क्लिक करा के सोशल मीडिया पर आये दिन डालने वाले पत्रकारों का इसी तरह हश्र होता है क्योंकि जिसे वे दोस्ती का स्वांग भरते हैँ दरअसल वो मामूली परिचय होता है.