अरुण अस्थाना-
पत्रकार, फिल्म समीक्षक और एक शानदार दोस्त अजित राय नहीं रहे, यकीन नहीं हो रहा. उनसे 8 जून को मुलाकात हुई थी. हैरो के एक पब में हमने लंबी शाम गुज़ारी. फिर मैं भारत चला गया तीन हफ्तों के लिए.
इस बीच कम से कम दो बार उनका संदेश आया – आ गए वापस… जब मैं 1२ जुलाई को वापस आया और फिर मिलने की सोच ही रहा था कि 15 को अजित जी का एक और संदेश आया – EMCU, Hillingdon Hospital, Bed no-21. मैंने अगले दिन उन्हें देखने जाने का तय किया पर अगले दिन उन्होंने बताया कि अस्पताल से छुट्टी करा के वो ज़किया ज़ुबैरी जी के घर चले गए हैं. मुझे ताज्जुब हुआ – इतनी जल्दी? और खुशी भी हुई कि चलो जल्दी ठीक हो गए.
फिर उन्होंने बताया कि अस्पताल तंग कर रहा था – महज़ एक दिन का 1800 पाउंड यानी करीब दो लाख का बिल बना दिया था. वो भी तब जब अजित जी इमरजेंसी में भर्ती हुए थे.
यूं तो NHS का कायदा है कि विदेशी लोगों को अगर इलाज कराना हो तो पैसे देने पड़ते हैं लेकिन अगर कोई इमरजेंसी में आता है तो कोई पैसा नहीं लिया जाता. अजित जी ने बिल मुझसे साझा किया और हमने तय किया कि बिल चुका दिया जाए वरना आगे उन्हें यूके आने में दिक्कत आ सकती है.
मैंने कुछ सहयोग ऑफ़र किया तो वो टाल गए. ज़ोर दिया तो कहने लगे – हो गया है, अरुणजी, परेशान मत होइए. मुझे लगा उनके पास तो हिंदुजा जैसे लोग हैं, तो शायद पैसे चुकाने का इंतज़ाम हो ही गया होगा.
अब लगता है अगर अस्पताल ने उन्हें पैसे के लिए परेशान नहीं किया होता तो वो शायद वहां थोड़ा और रुकते. थोड़ा और रुकते तो शायद पूरा इलाज मिल जाता और मुझे और उनके तमाम दूसरे दोस्तों को इस तरह उन्हें याद नहीं करना पड़ता.
हमेशा रंगीन गमछे या मफ़लर में सजे रहने वाले अजित भाई को सफ़ेद कपड़े में देखने की हिम्मत जुटाने की कोशिश कर रहा हूं, बस.
ओम थानवी-
अजित राय कभी जनसत्ता के सांस्कृतिक संवाददाता थे। मैंने अख़बार सम्हाला, उससे पहले उन्हें यह ज़िम्मा मिल गया था। राहुलजी के प्रिय थे। अच्युताजी को अपना गुरु मानते थे। सरकारी नौकरी में थे, फिर भी राजधानी की रंगमंच और साहित्य आदि की गतिविधियों में बराबर जाते। ख़ूब लिखते। देर रात तक सक्रिय रहते थे।
पर हिंदी उनकी बीहड़ थी। वर्तनी के मामले में भी मनमौजी थे। सांस्कृतिक रिपोर्टिंग का वह ज़िम्मा बाद में राकेश तिवारी ने निभाया। अजित मुझसे ख़फ़ा हो गए। मगर मिलने पर ज़ाहिर नहीं करते थे। मुकेश संपादक हुए तब वे वापस जनसत्ता से जुड़ गए।
इधर जब भी मिलते, लंदन या यूरोप के किसी देश की यात्रा का ज़िक्र करते। जयपुर में थे तो घर भी आए। हिंदुजा व्यापारियों पर लिखी अपनी किताब मुझे दी। उससे उनके बढ़ते दायरे की जानकारी मिली।
यह भी पढ़ा कि उनके पाँच हज़ार आलेख छप चुके हैं, कई रपटों पर संसद में बहस हुई है। वे हिंदी के संभवतः अकेले अंतरराष्ट्रीय पत्रकार हैं। उन्हें नोबेल पुरस्कार समारोह में भी आमंत्रित किया जा चुका है। कान समारोह ने विश्व के सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म समीक्षकों में शामिल किया है।
बातचीत में उन्होंने बताया कि लंदन में रोज़ तड़के चार बजे उठ कर आठ बजे ब्रिटेन के सबसे अमीर आदमी गोपीचंद हिंदुजा के साथ सेंट जेम्स पार्क में सैर करते हैं। उनके भाई प्रकाश फ़्रांस के कान फ़िल्म समारोह में दो बार निजी हिंदुजा याट पर उनके सम्मान में भोज दे चुके हैं। प्रकाश सबको उनका परिचय भारत के सबसे महत्त्वपूर्ण फ़िल्म पत्रकार के रूप में देते हैं।
उनके जाने पर मैंने किताब (“बॉलीवुड की बुनियाद”) को ठीक से पलटा। मेरी प्रशंसा में हाथ से जो लिखा, उसमें तथ्य नहीं था। कोई सौ पृष्ठों की किताब हिंदुजा परिवार के हिंदी फ़िल्म व्यवसाय (1954-1978) को बॉलीवुड के विकास का आधार और संसार में भारतीय संस्कृति व जीवन मूल्यों का प्रसार बताती थी। हिंदुजा भाइयों की तीस तसवीरों के साथ पचास फ़ोटो उसमें लोकप्रिय हिंदी फ़िल्मों के भी थे।
मुझे सदा हैरानी रही कि मुंबई से दूर भागने वाले अजित वहाँ जा कर बस कैसे गए। किताब से मालूम हुआ कि हिंदुजा बंधुओं की सोहबत में उन्हें शहर से “इश्क़” हो गया था। वहाँ भी वे हिंदुजाओं के साथ जुहू तट पर सुबह की सैर करते थे। एक बार तो गोपीचंद हिंदुजा जुहू से उनके साथ ऑटो में घर आए।
मुझे अजित राय की वैश्विक रुचि, इतिहास लेखन के इस आयाम और व्यापक संपर्कों की इतनी जानकारी पहले नहीं थी। कितने अफ़सोस की बात है कि लंदन के अस्पताल में वे इमरजेंसी में भरती हुए। जो इलाज सुझाया, उसे करवा नहीं सके क्योंकि दो रोज़ का बिल 1800 पाउंड (दो लाख रुपए से ज़्यादा) हो चुका था। किसी हिंदुजा को नहीं पुकारा। मित्रों को संदेश भेजे, पर वे कुछ कर पाते इससे पहले अस्पताल से छुट्टी ले ली।
लंदन में उनके “बड़े भाई” कथाकार तेजेंद्र शर्मा ने जो मार्मिक पोस्ट लिखी है, उसे आप दो बार नहीं पढ़ पाएँगे। परदेस में मृत्यु हो तो पुलिस भी कैसा बरताव करती है।
अजित असमय चले गए, अन्यथा फ़िल्म समीक्षा और इतिहास को कितने आयाम देते। बहुत दुखद हुआ। अनहोनी और क्या होती है?
शंभुनाथ शुक्ला-
अच्युतानंद जी और राहुल देव जी के समय वे प्रकट हुए। उनका लेखन किसी भी स्ट्रिंगर से बेहतर नहीं था। उनकी तुलना में रवींद्र मिश्र और रवींद्र त्रिपाठी लाख गुना बेहतर कला, संगीत और सिनेमा के जानकार थे और लिखते भी थे। प्रताप सिंह की सिने दुनिया की समझ बहुत अच्छी थी। पर अजीत राय जैसी चतुराई हर किसी में नहीं होती। वे ऑफिस में आते ही राम बहादुर राय, अच्युतानंद जी के पैर छूते। हो सकता है राहुल जी के भी छूते रहे हों।
प्रभाष जी के समय उनकी घुसने की हिम्मत नहीं पड़ी। पर वे तेजेन्द्र शर्मा की वजह से हिंदुजा परिवार में घुस गए। सवाल है कि लंदन में हिंदुजा परिवार ने उनके इलाज़ का खर्च क्यों नहीं उठाया? एक समारोह में उनको अंग्रेजी बोलते सुना। मोदी से होड़ में थे। परंतु मृत्यु के बाद सब महान हैं। उनकी महानता को नमन!
उमेश चतुर्वेदी-
Shambhunath Shukla अजित मेरे शुरूआती दिनों के दोस्त रहे. हालांकि बाद में उनसे मेरी दोस्ती कमजोर होती चली गई और मैं उनके परिवार के नजदीक होता चला गया. उनके माता-पिता, उनकी बहनें, उनकी पत्नी और उनका बेटा मेरे परिवार के अभिन्न अंग टाइप होते गए और उनकी मां, उनके पिता, उनकी छोटी बहन, उनके बेटे के लिए मेरा परिवार भी उनका ही परिवार हो गया. यह कहना कि अजित को लिखना नहीं आता था. कुछ ज्यादा ही हो जाता है. रही बात किसी के लेखन की संपादन की तो बड़े से बड़े लेखक का लिखा संपादित किया जा सकता है. वैसे एक्सप्रेस बिल्डिंग में कभी मैंने अच्युता जी का पैर छूते अजित को नहीं देखा. राहुल देव का भी पैर छूते नहीं देखा. रही बात प्नभाष जी की तो वे भी अजित को अपने कमरे में उस दौर में बहुत बैठाते थे, जब वे सन्यस्तें मया संन्यस्तं मया लिखकर अपने बड़े से कमरे में बैठा करते थे. लेकिन उस समय अखबार पर राहुल देव और अच्युता जी जोड़ी का नियंत्रण था. दुनिया हर किसी का मूल्यांकन करती है. लेकिन मूल्यांकन में भी संयत रहा जा सकता है. कम से कम, तब तो ज्यादा, जब शोक का वक्त भी ना गुजरा हो…

संजय कुमार सिंह-
Shambhunath Shukla जी, Sanjay Sinha कहता रहा है कि पानी की तरह मनुष्य भी अपना सतह स्वयं ढूढ़ लेता है। पैसे वालों पर किताब लिखने की पेशकश मुझे कई बार, कई लोगों से मिली पर जिसके बारे में लिखना चाहता रहा उसपर पूरी कोशिश करके भी मौका नहीं मिला। ऐसे में हिन्दुजा पर किताब लिखकर उनसे दोस्ती का दावा करने का सच यही है कि मौत इलाज के पैसे नहीं होने से हुई। इससे लगता है कि मनुष्य अपना सतह ढूंढ़ता नहीं है, उसी पर रहता है और वह ऊपर नीचे होता रह सकता है।
इलाज के बिना मौत तो फिर भी स्वर्ग का रास्ता हो सकता है पर तमाम पत्रकार इलाज के बिना जी रहे हैं। अपनी तमाम मित्रताओं और संपर्कों के बावजूद। यही हिन्दी पत्रकारिता का सच है और अक्सर दिख जाता है। मैं हर्षद मेहता के लिए काम करके भी (परिचय होने के बावजूद पढ़ा जा सकता है) पैसे नहीं कमा पाया या वे असमय चले गये तो मैं यही समझता था कि मैं अपनी सतह पर रह गया। अगर थानवी जी ने यह सब नहीं लिखा होता तो अजीत राय के बारे में जो सब पढ़ रहा था उसे पढ़कर यही सोच रहा था कि यह सब कैसे संभव हुआ होगा।
अजित जी का अस्पताल बिल देखें…

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हृदय के डॉक्टर की बात मान लेते अजित राय तो आज हम सबके बीच होते!



जे पी सिंह
July 27, 2025 at 3:06 am
दूर के ढ़ोल सुहावने तभी तक हैँ जबतक आप बीमार नहीं पड़ते, यदि बीमार पड़े तो बीमा हो या आपके पास काफ़ी पैसे हों, ये कड़वी हक़ीक़त है.