
संजय कुमार सिंह-
आज के अखबार : पार्ट-2
नरेन्द्र मोदी भले वोट चोर के आरोपी हैं पर भारत के पहले गैर कांग्रेसी प्रधानमंत्री हैं जो इतने लंबे समय से सत्ता में हैं फिर भी अब तक की सबसे अनैतिक और घटिया राजनीति कर रहे हैं। राहुल गांधी चाहे जितने कमजोर और अकेले हों, वंशवादी होने से वे न तो अनैतिक हैं ना (निराधार) अपमानजनक बातें करते हैं। अगर कांग्रेस को वंशवादी राहुल गांधी के नेतृत्व में मान लिया जाये तो उनकी बहन प्रियंका गांधी ने इस नीच राजनीति की बहुत ही संयत आलोचना की जिसकी तारीफ होनी चाहिये। हालांकि वह अलग मुद्दा है और प्रियंका गांधी यह अपील कर चुकी हैं कि पैसे तो रख लो लेकिन वोट सोच समझ कर देना। उन्होंने यह नहीं कहा या मैंने नहीं सुना कि भाजपा को वोट नहीं देना, कांग्रेस या कांग्रेस, गठबंधन को वोट देना। मुझे लगता है कि मीडिया को इसकी तारीफ भी करनी चाहिये। मुझे नहीं पता किसी ने की है या नहीं लेकिन देशबन्धु का शीर्षक मुझे प्रियंका गांधी के इस कथन से प्रभावित लगता है, बिहार में महिलाओं के खाते में आये 10 लाख रुपये।
आइये, अब इससे जुड़ी राजनीति की भी चर्चा कर लें। मैं इसे प्रचार और प्रचारकों का खेल सामने आने के बाद की राजनीति, प्रचार और प्रचारकों के नये खेल के रूप में देखता हूं। तथ्य यह है कि 2014 से पहले कांग्रेस पर आरोप, स्विस बैंक में काला धन, 100 दिन में वापस लाने का सपना और वोट के लिए नागरिकों को 15 लाख का लालच या जुमला इतना मजबूत था कि नोटबंदी, जीएसटी से नहीं डरने वाले प्रधानमंत्री को मणिपुर जाने की जरूरत ही नहीं लगी। इस तरह, मणिपुर को ‘गुस्सा निकालने देने के लिए’ गुजरात से आगे जाने दिया गया। ‘गुस्सा निकालने देने’ के लिए कहा गया था, कहने वाले संजीव भट्ट अभी भी जेल में हैं इसलिए यह बता देना जरूरी है कि एसआईटी को इसके सबूत नहीं मिले थे। दूसरी ओर, प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय स्तर पर नाम, ईनाम और कद पाने की कोशिशें और उसके लिए दोस्ती चलाते रहे। इंदिरा, नेहरू, गांधी सबसे बराबरी की कोशिशें हुईं।
चौकीदार चोर है का असर जरूर हुआ था। तब पार्टी, परिवार और गोरक्षक सब चौकीदार हो गये थे और बात बन गई, संकट टल गया। हालांकि, इसके बाद (यह अब) वोट खरीदने की कोशिशें सार्वजनिक हो गईं। केजरीवाल की रेवड़ी के मुकाबले अपना डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर होने लगा। तुम करो तो कैरेक्टर ढीला, हम करें तो रास लीला वाले अंदाज में। मुजरा तक पहुंच ही गये थे। फिर भी आज ऐसी खबर और शीर्षक मेरे अखबारों में सिर्फ टेलीग्राफ की है। टेलीग्राफ जैसी खबर भी आजकल आमतौर पर अखबारों में नहीं होती है और यह कम पैसों में रखे गये रंगरूटों के कारण भी हो सकता है और अलग मुद्दा है।
द टेलीग्राफ की खबर इस प्रकार है – प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को दिल्ली से एक बटन दबाकर बिहार की 75 लाख महिलाओं के बैंक खातों में ₹10,000 की राशि प्रत्येक के खातों में ट्रांसफर की। यह राशि बिहार सरकार की “मुख्यमंत्री महिला रोजगार योजना” के तहत दी गई है, जो अक्टूबर-नवंबर में होने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले शुरू की गई है। (कल सितंबर की 27 तारीख थी) ₹7,500 करोड़ की यह पूरी रकम चुनाव से पहले दी गई अब तक की सबसे बड़ी नकद सौगातों में से एक मानी जा रही है। यह विडंबना ही है कि प्रधानमंत्री मोदी ने कुछ साल पहले विपक्षी दलों द्वारा दी जा रही मुफ्त सौगातों की आलोचना करते हुए इसे “रेवड़ी संस्कृति” बताया था।
यह जीएसटी कम करने और उसके धुंआधार प्रचार के अलावा है। जब लोकप्रियता के शिखर पर थे तो जीएसटी लगाया था। इसे गब्बर सिंह टैक्स कहा जाता था अब उसी में छूट देकर, उसका प्रचार करके वोट लेने की कोशिश की जा रही है और इसमें स्थिति ऐसी हो गई है कि बिहार में पैसे एडवांस देने पड़े। इससे पहले दिल्ली में आधी आबादी को 2500 रुपये महीने की घोषणा (अमल का पता नहीं) करके दिल्ली की आम आदमी पार्टी की सरकार को सफलता पूर्वक उखाड़ा जा चुका है। इससे पहले मध्य प्रदेश में “लाड़ली बहना योजना” की शुरुआत 2023 में हुई थी। पहले महिलाओं को ₹1,000 प्रति माह की नकद सहायता दी गई। बाद में इस राशि को बढ़ाकर ₹1,250 और फिर ₹1,500 तक किया गया। 140 करोड़ की आबादी में 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त राशन की योजना अपने आप में कई तरह के भ्रष्टाचार को समेटे हुए हो सकती है।
बांटने वालों से लेकर थैले और केंद्र पर फोटो व पात्रों के चयन तक में गड़बड़ी और घोटाले की आशंका व गुंजाइश है। पात्रता का पता नहीं। आयुष्मान योजना में घपले की शिकायतें आती रही हैं। मोहल्ला क्लिनिक में 65,000 फर्जी मरीजों पर शोर मचा लेकिन लाखों फर्जी मतदाताओं की चिन्ता नहीं है। आज अखबारों में खबर है, (ढूंढ़ने पर मिलेगी) सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड चुनाव आयोग पर दो लाख का जुर्माना लगाया। किसान तो कमजोर नस हैं। उसे रहने देता हूं। फिर भी संविधान बचा हुआ है, लागू रहेगा, उस पर भरोसा है, उसकी रक्षा करनी है, 400 पार तो बदल दूंगा का संघर्ष चल रहा है। जेन जी की चिन्ता नहीं है उससे जरा नहीं डरते। सोनम वांगचुक का साथ दिया तो जेनजी पर नहीं, सोनम पर एफसीआरए का गोला दाग दिया गया है। जेनजी वालों को जन्नत भेज दिया सो अलग। गिरफ्तारी तो होनी ही थी। क्योंकि सारा खेल पैसों का ही है।
स्विस बैंक के काले धन से शुरू हुआ गुजरात की अनाम पार्टियों को 4300 करोड़ के चंदे की खबरों के बाद चुनाव आयोग ने 474 गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों का पंजीकरण रद्द कर दिया है। इसलिये ऐसा भी नहीं है कि काम नहीं हो रहा है। कहानी गढ़ने और खबरों से ध्यान घुमाने की कोशिशें जारी हैं। दुनिया के सबसे बड़े (और पुराने) एनजीओ की सेवा देश को मिल रही है। उसका ना पंजीकरण ना खाता ना बही तो क्या एफसीआरए। स्विस बैंक के काले धन से शुरू हुई यात्रा गुजरात के चुनावी दलों के 4300 करोड़ पर रुक गई है। लेकिन नरेन्द्र मोदी की हार यही है कि एडवांस पेमेंट करना पड़ रहा है। आप कह सकते हैं, हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है। भक्तों की जीत यही है कि सब खुलेआम है। हे राम!
समाप्त
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लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के ज़रिए किया जा सकता है.


