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आज के अखबार : लद्दाख हिन्सा के लिए भाजपा जिम्मेदार है – खरगे का आरोप पहले पन्ने पर नहीं है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में पहले पन्ने पर तमिलनाडु की एक रैली में भगदड़ से 39 (दि एशियन एज) लोगों की मौत की खबर तो प्रमुखता से है लेकिन लेह का सच गायब हैं। तमिलनाडु की इस खबर से अखबारों ने सरकार की सेवा भी की है पर वह बाद में। सेवा तो लेह मामले में सोनम वांगचुक को बदनाम करने की सरकारी खबरों से भी की गई है। कुल मिलाकर, लेह मामले में सरकार की कार्रवाई, गिरफ्तार किये गये सोनम वांगचुक की हस्ती, भाजपा से उनकी ‘दोस्ती’ और अब उनके खिलाफ एफसीआरए की कार्रवाई तथा एनएसए लगा दिया जाना महत्वपूर्ण है। इसलिए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने अगर यह आरोप लगाया है कि, लद्दाख हिन्सा के लिए भाजपा जिम्मेदार है तो यह बड़ी बात है। लेकिन यह खबर पूरी तरह गोल है और सोनम वांगचुक या लेह की खबर है भी तो वह सरकार की सेवा करने वाली। आइये, पहले लेह की खबरों को देखते हैं और फिर तमिलनाडु की रैली और उसकी खबर को समझेंगे। इसके साथ जानेंगे कि इस एक खबर से कैसे दो तीर साधे गये हैं। सीमाई लेह का मामला गंभीर है और सोनम वांगचुक जैसी हस्ती को बदनाम व परेशान करने की कोशिशें भी खबर हैं। खबर तो यह भी है कि लेह और बैंगलोर के बीच उत्तर प्रदेश में भी तनाव है। लेकिन लेह और सोनम वांगचुक की खबर सबसे पहले। नवोदय टाइम्स में सोनम वांगचुक की खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यही स्थिति अमर उजाला की है। हिन्दी के मेरे तीन अखबारों में एक देशबन्धु में खरगे का आरोप लीड है। उपशीर्षक है, कांग्रेस अध्यक्ष ने कहा – भाजपा ने लद्दाख के लोगों के साथ विश्वासघात किया। ये ऐसे मामले हैं जिनकी पुष्टि की जरूरत नहीं है और पुरानी खबरों से ही सही लगता है। फिर भी इस खबर का पहले पन्ने पर नहीं होना मायने रखता है। खासकर तब जब कांग्रेस के खिलाफ भाजपा के आरोपों को अक्सर प्राथमिकता मिलती है।

इसके मुकाबले अंग्रेजी अखबारों में द हिन्दू का शीर्षक हिन्दी में, हिन्सा प्रभावित लेह के कर्फ्यू में  ढील चरणों में दी जायेगी। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, लद्दाख के डीजीपी ने कहा, गिरफ्तार पाकिस्तानी वांगचुक के संपर्क में था, सूचनाएं भेजा था। दि एशियन एज का शीर्षक भी डीजीपी के हवाले से है, सोनम वांगचुक के बांग्लादेश, पाकिस्तान के संपर्कों की जांच हो रही है। उपशीर्षक में सरकार और पुलिस का पक्ष प्रचारित किया गया है। विदेशी धन मिलने की जांच जारी है और फायरिंग आत्मरक्षा में हुई। इसमें दिलचस्प यह है कि जांच पूरी नहीं हुई है और एनएसए पहले ही लगाया जा चुका है ऐसे जैसे सब पता था और अगर पता था तो यह सब कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई या हिंसा का इंतजार किया जा रहा था। पर यह सब अब खबरों में नहीं होता है। हिन्दुस्तान टाइम्स में इस खबर का शीर्षक है, लद्दाख पुलिस को विरोध प्रदर्शन में पाकिस्तानी कनेक्शन नजर आ रहा है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर नहीं है और द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है और मुख्य शीर्षक है, वांगचुक पर ‘पाकिस्तानी लिंक’ का लेंस। फ्लैग शीर्षक है, लद्दाख के डीजीपी ने कहा, उनपर बड़ा सवालिया निशान। यहां या पूछा जाना चाहिये कि बड़ा सवालिया निशान अब क्यों दिखा या हिन्सा होने तक क्यों नहीं दिखा। छोटा नहीं दिखता तो फिर भी समझा जा सकता था। लेकिन जिस सरकार का मुखिया प्रेस कांफ्रेंस ही नहीं करता उसके मातहतों से सवाल करने का क्या मतलब? वह भी तब जब सब कुछ शीशे की तरह साफ है।

आज खबरों का खेल तमिलनाडु के करुर में भगदड़ से मौत का है। मुझे लगता है कि यह खब चाहे जितनी दुखद और हृदय विदारक हो दिल्ली के हिन्दी अखबार में पहले पन्ने पर बतौर लीड छपी है तो भाजपा की राजनीति के कारण। यही नहीं, उत्तर प्रदेश के अखबार में उत्तर प्रदेश की हिन्सा छोड़कर तमिलनाडु के हादसे की खबर को महत्व दिया जाये तो कारण सिर्फ मरने वालों की संख्या नहीं हो सकती है। इसे समझने के लिए खबर को देखना-समझना होगा। नवोदय टाइम्स में लीड का शीर्षक है, अभिनेता विजय की रैली में भगदड़, 36 की मौत। न्यायिक आयोग मामले की जांच करेगा, केंद्रीय गृहमंत्रालय ने रिपोर्ट तलब की। आमतौर पर ऐसे हादसों की खबर को प्रमुखता तब दी जाती है जब लगता है कि सरकार गंभीर नहीं है। यहां खबर है कि न्यायिक आयोग बना दिया गया है, मुख्य मंत्री ने मुआवजे का एलान कर दिया है और केंद्रीय गृहमंत्रालय ने रिपोर्ट तलब कर ली है। जाहिर है, खबर में घटना की सूचना कम सरकार के काम की ज्यादा है और वैसे भी दिल्ली में करूर की सूचना जिसे चाहिये होगी वह अखबार में ढूंढ़ कर पढ़ेगा सबको जबरन पढ़वाने या बताने की क्या जरूरत। अमर उजाला में भी यही स्थिति है। यहां मरने वालों की संख्या 38 है। यहां शीर्षक में मरने वालों का ब्यौरा है और घटनास्थल से दूर, अलग भाषा वाले क्षेत्र में यह तब महत्वपूर्ण होता है जब मामला अपराध का हो। जान तो हर किसी की महत्वपूर्ण है और किसकी कैसे गई इसी अनुसार खबर की गंभीरता तय होती है। 

जारी…

इसके आगे पढ़ें – तमिलनाडु की रैली में भगदड़ की खबर का राजनीतिक ‘उपयोग’ और उससे जुड़ा ‘राज’ https://www.bhadas4media.com/tamilnadu-rally-mein-bahagdar-kee-khabar/

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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