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गाज़ीपुर लिटरेचर फेस्टिवल बना अहंकार का मंच, मंटू प्रधान से खाने की थाली छीनने पर गहराया विवाद

गाज़ीपुर में आयोजित लिटरेचर फेस्टिवल इस बार साहित्य से ज्यादा अहंकार और अपमान का प्रतीक बन गया। नंद रेज़िडेंसी, बंशी बाजार में हुए इस आयोजन में जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मुख्य अतिथि के रूप में मौजूद थे, लेकिन चर्चा का केंद्र बन गया कार्यक्रम में स्थानीय जनप्रतिनिधि और फेस्टिवल एक्टिविस्ट संजय राय ‘मंटू’ (ग्राम प्रधान) के साथ किया गया अपमानजनक व्यवहार।

बताया जा रहा है कि भारत डायलॉग इस कार्यक्रम का मुख्य आयोजक था, लेकिन शुरू होने से पहले ही दिल्ली से आई एक टीम ने पूरे कार्यक्रम को अपने नियंत्रण में ले लिया। सूत्रों के मुताबिक, आयोजन में स्थानीय सहयोगियों को पूरी तरह किनारे कर दिया गया। मंच पर साहित्य की जगह दिखा भेदभाव, अहंकार और वीआईपी कल्चर का प्रदर्शन।

सबसे शर्मनाक वाकया तब हुआ जब संजय राय मंटू, जिन्होंने हफ्तों तक मेहनत कर कार्यक्रम की तैयारी में हाथ बंटाया था, भोजन स्थल पहुंचे। वहां दिल्ली की आयोजक पूजा प्रियंवद ने उनके हाथ से प्लेट छीनते हुए कहा —

यह सुनकर मंटू प्रधान अपमानित होकर वहां से चले गए। बाद में उन्होंने सोशल मीडिया पर लिखा —

“मैंने इस कार्यक्रम के लिए अपनी पूरी मेहनत दी, गाज़ीपुर में लोगों से संपर्क किया, निमंत्रण दिए। लेकिन जिस कार्यक्रम में अपने ही जिले के लोगों को अपमानित किया जाए, वहां खड़ा रहना मुश्किल है।”

उनकी यह पोस्ट सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हो गई। गाज़ीपुर के लोगों में आयोजक टीम और पूजा प्रियंवद के खिलाफ गहरा रोष देखने को मिला। कई लोगों ने लिखा —

“भारत डायलॉग के नाम पर चल रहे इस फेस्टिवल को कुछ लोगों ने हाइजैक कर अहंकार का अड्डा बना दिया है।”

स्थानीय लोगों का कहना है कि यह अपमान सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि गाज़ीपुर की उस मिट्टी का भी है जिसने हमेशा साहित्य और संस्कृति को सम्मान दिया है।

अब सवाल यह उठता है — क्या करोड़ों के बजट में आयोजित इस तथाकथित ‘साहित्यिक’ उत्सव में संवेदनशीलता और इंसानियत की थाली इतनी छोटी हो गई कि उसमें स्थानीय लोगों के लिए जगह ही नहीं बची?

अगर साहित्य के नाम पर संवेदना ही कुचल दी जाए, तो ऐसे फेस्टिवल समाज पर कलंक ही कहे जाएंगे, न कि सांस्कृतिक उत्सव।

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