मज्कुर आलम-
अलविदा कैसे कहूँ सर (1)… अवधेश (प्रीत) सर का जाना मेरे लिए निजी क्षति है। वह बीमार चल रहे थे ऐसा हाल ही में Arun Narayan ने बताया था, लेकिन इतना ये नहीं पता था।
संभवतः 2005 की बात है। मैंने देवघर प्रभात खबर की नौकरी छोड़ दी थी। कुछ ही दिन पहले कैंसर से जिनका निधन हुआ है, वह रवि प्रकाश संपादक बनकर देवघर आए थे। अपने साथ राजीव नयन नाम के एक लड़के को भी लाए थे, जिसे कुछ नहीं आता-जाता था, मगर वह संपादक का चहेता था। हां, मगर वह जिसके कमरे पर जाता था, वहां से कुछ गायब हो जाता था।
इक दिन दफ्तर से हमारे आईटी डिपार्टमेंट के साथी चंदन सिंह का मोबाइल गायब हो गया। काफी खोज बीन के बाद भी वह नहीं मिली तो संपादक रवि प्रकाश ने सीधे फरमान सुनाया कि सभी एडिटोरियल वालों को मिलकर चंदन की मोबाइल का पैसा देना होगा।
मैंने कहा- नहीं दूंगा, क्योंकि देने का मतलब है कि ये स्वीकार करना कि एडिटोरियल के साथियों ने चोरी की है, ये मानना। और आपको अपनी टीम पर भरोसा नहीं है। कम से कम ऐसा मैं हरगिज नहीं मान सकता था।
रवि प्रकाश ने कहा- तो फिर नौकरी छोड़कर उन सबको जाना होगा, जो अंशदान नहीं करेगा। इसके बाद मेरे साथ कई (लगभग आधे से ज्यादा) एडिटोरियल साथियों ने एक साथ नौकरी से इस्तीफा देने का मन बना लिया। इसकी एक वजह यह भी थी कि देवघर यूनिट में कई मेरे रिकमंडेशन पर नौकरी में थे। इतना ही नहीं किसी को भी कोई परेशानी संकट हो तो वह मेरे पास ही आता था।
रुपये-पैसे तो अलग बात है, यूं भी देवघर के लोग मुझ से इतना प्यार करते थे कि ऐसे भी मेरे परिचित भर होने से उनके कई काम आसान हो जाते थे उन दिनों।
मैंने और दो-तीन और साथियों ने किसी तरह उन सबको समझाकर रोका। कहा- घर-परिवार है। तुमलोग नौकरी करो। एक साथ इतने लोगों का छोड़ना ठीक नहीं। इसकी एक वजह यह भी थी कि जो मेरी वजह से नौकरी छोड़ते, उनकी नौकरी के इंतजाम करने का मेरे ऊपर नैतिक दबाव तो बन ही जाता।
फिर भी मेरे साथ कुछ और साथियों ने नोटिस दे दिया। और एक महीने बाद हमने देवघर प्रभात खबर छोड़ दिया, जिसकी लॉन्चिंग यूनिट से हम जुड़े थे। हालांकि संपादक रवि प्रकाश ने आखिरी दिन भी मुझे रोकने की काफी कोशिश की। लेकिन मैंने इस अमानवीय व्यवहार के विरोध में नौकरी छोड़ने का मन बना लिया था।
इसकी एक वजह और थी। वह थी- एक सीनियर साथी, जिन्होंने कुछ ही दिन पहले नौकरी छोड़ी और वह देवघर छोड़ चुके थे। उनके घर में इस घटना के एक-दो दिन पहले ही मेडिकल इमरजेंसी थी, जिन्होंने तब तक देवघर नहीं छोड़ा था, तो वहां चला गया था। महज आधे घण्टे देर से मैं अपने दफ्तर पहुंचा था। इससे काम का कोई नुकसान भी नहीं होना था। रवि प्रकाश को बताया कि ऐसी-ऐसी बात हो गई थी। बस उनका नाम सुनते ही ये आग-बबूला हो गए। शायद उनसे उनका पर्सनल खुन्नस था- कुछ आपत्तिजनक लहजे में उन्होंने मुझे कहा। तभी मैं समझ गया था कि इस व्यक्ति के साथ मेरा गुजारा नहीं होना है। मैंने उन्हें तत्काल ताकीद की- मेरे बारे में अगर बोलते तब भी बर्दाश्त नहीं करता, मगर किसी और के बारे में तो हरगिज नहीं चलेगा।
इसके बाद रवि प्रकाश ने इस लहजे में मुझसे तो कभी बात नहीं की, लेकिन संपादक की कुर्सी पर बैठकर वह अक्सर किसी न किसी को बोलते रहते थे- ‘जूत्ता से मारूंगा।’ शायद ये उनका तकिया कलाम था।
ये मेरी पहली नौकरी थी। इसके बाद देवघर छोड़ कुछ दिन घर बैठा। फिर अचानक एक दिन राघवेंद्र भैया का फोन आया। नौकरी करनी है तो आ जाओ। इस तरह नवबिहार पटना में मैंने नौकरी शुरू की। पहले पन्ने की ज़िम्मेदारी मेरे पास थी। सबकुछ ठीक चल रहा था। संपादक बेहद सुलझे इंसान और कवि अमिताभ बच्चन साहब थे। उस दौरान बेरोजगारी के दौर से गुजर रहे पत्रकार बिनोद बंधु अक्सर वहां आते थे। एक दिन दारू के नशे में वह मेरे पास आए और ऐसे कर लो, वैसे कर लो- निर्देश देने लगे। मैंने कहा- आप दारू के नशे में हैं। मैं दारू नहीं पीता आप कृपया चले जाएं। मुझे इस बदबू से परेशानी हो रही है। और कुछ कहना है तो संपादक जी को कहिए- वह मुझे निर्देश दे देंगे। आप न तो मेरे संपादक हैं और न सीनियर।
बस क्या था- साहब के इगो पर लग गया। उन्होंने भनभनाना शुरू किया- तुम मुझे जानते नहीं हो। मैं तुम्हारा करियर बरबाद कर दूंगा। कहीं नौकरी नहीं कर पाओगे।
मैंने कहा- वो बाद की बात है। फिलहाल आप यहां से जाएं। जिस दफ्तर में बेरोकटोक ऐसे लोग घुसकर निर्देश देते हैं, वहां यूं भी मुझे काम नहीं करना। मैं जा रहा हूँ। लेकिन आज पूरा अखबार मैं निकालकर ही जाऊंगा।
छह महीने के भीतर मैं फिर बेरोजगार था। ये मेरी दूसरी नौकरी थी। इसके बाद Devendra Gautam और संपादक अमिताभ जी समेत कइयों ने मुझे वापस बुलाया। मगर मैं उस राह से आगे बढ़ चुका था।

इसके दो-तीन महीने बाद मैं भाई के लिए लड़की देखने सासाराम गया था। वहीं अचानक Avadhesh Preet सर का फोन आया। मज़्कूर कहाँ हो तुम। मैंने बताया- सासाराम।
उन्होंने कहा- क्या तुम आज आ सकते हो? मैंने उनसे यह भी नहीं पूछा क्यों? उनसे तब कुछ पूछता नहीं था, जो वो कहते थे, मैं करने को तैयार हो जाता था। कहा- आज नहीं पहुंच पाऊंगा सासाराम से। यहां से ट्रेन का सीधा रास्ता नहीं है। शाम को बस पकड़कर कल सुबह आ जाऊंगा।
उन्होंने कहा- आ जाओ। जितनी जल्दी आ सकते हो।
वहां पहुंचा तो पता चला कि दो बार धक्के खाकर डगमग-डगमग कर रहे मेरे करियर को उनकी सरपरस्ती हासिल होने वाली है। उन्होंने मुझे हिंदुस्तान में नौकरी ऑफर की।
शेष फिर… अलविदा नहीं
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