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सुख-दुख

एक समय प्रभु चावला को भी लगने लगा था- ‘हमसे आजतक है हम आजतक से नहीं’

सचिन सिंह गौर-

एक समय था जब प्रभु चावला को भी लगने लगा था कि ‘हमसे आजतक है हम आजतक से नहीं’, फिर उनका भी आजतक से एग्जिट हुआ। आजतक, आज वहां से और आगे बढ़ गया और प्रभु चावला जहाँ थे वहां से बहुत बहुत पीछे चले गए।

राजदीप सरदेसाई को भी लगा था (cnn ibn) के दौरान… आज सौरभ द्विवेदी भी कमोवेश उसी जगह हैं। सौरभ को भी यही लगने लगा था , लेकिन फिर भी सौरभ द्विवेदी, प्रभु चावला से बहुत बेहतर पॉजिशन में हैं।

कारण, प्रभु चावला एक खांटी पत्रकार थे। वो पत्रकारिता के अलावा कुछ कर नहीं सकते थे और कुछ करना भी नहीं चाहते थे, लेकिन सौरभ प्रभु चावला से जुदा है, उनके सामने तीन राहें हैं (और उम्र भी)।

एक पत्रकारिता, दूसरा राजनीति और तीसरा फिल्मों में पटकथा एव लेखन क्यूंकि सौरभ द्विवेदी प्रभु चावला की तरह खांटी पत्रकार नहीं हैं और “अवसर” तलाशना उन्हें आता है।

खैर, इसमें दूसरी राह (राजनीती) फिलहाल दूर की ही कौड़ी है। यहाँ तो बड़े बड़े धुरंधर ढेर हो जाते हैं। लेकिन पहला और तीसरा रास्ता तो खुला ही है।

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