अनिल कुमार-
उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य सिस्टम, जो कोविड काल में बेहद खराब था, वह मार्च 2022 के बाद बेहतरीन हो गया है। इसका उदाहरण है कि किसी बीमार का परिचित बड़ा आदमी मंत्री जी को फोन कर दे तो 10:11 पर उनके कैंप कार्यालय से अस्पताल को फोन चला जाता है, और 10:31 पर उसकी भर्ती हो जाती है, परंतु सौरभ सोमवंशी के साथ दिक्कत यही हो गई कि उन्होंने उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य सिस्टम पर भरोसा कर लिया तथा मंत्री जी को फोन नहीं किया। मंत्री जी को बिना फोन किये, सीधे अपनी 55 वर्षीय मां उर्मिला सिंह को लेकर इलाज के लिये प्रयागराज के मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज द्वारा संचालित स्वरूप रानी अस्पताल चले गये।
सौरभ अपनी माताजी को 3 दिसंबर 2024 को अपस्ताल लेकर इसलिये गये थे, ताकि वो ठीक होकर जल्द से घर वापस आ सकें, फिर से घर दुआर की जिम्मेदारी संभाल सकें, लेकिन उन्होंने सबसे बड़ी गलती की कि अस्पताल के डॉक्टरों एवं प्रदेश के स्वास्थ्य सिस्टम पर विश्वास कर लिया, और उसी गलतफहमी में उन्होंने मंत्रीजी को फोन करने की जरूरत ही नहीं समझी। उन्हें शायद भरोसा था कि इलाज तो डाक्टरों को ही करना है तो फिर मंत्रीजी को फोन करने की क्या ही जरूरत है? कौन सा मंत्री जी आकर ड्रिप चढ़ायेंगे या फिर ये भी हो सकता है कि एक आम नागरिक होने के चलते उनके पास मंत्री जी का मोबाइल नंबर नहीं रहा होगा!
खैर, जो भी कारण रहा हो, सौरभ मंत्री जी को फोन किये बिना ही अपनी माता जी की भर्ती अस्पताल में करा दिये। जांच के बाद डाक्टरों ने उन्हें बताया कि उनकी माता जी को न्यूरो की समस्या है। ऑपरेशन कराना पड़ेगा। सौरभ और उनके परिजन तैयार हो गये। 4 दिसंबर को उनका ठीक से ऑपरेशन हो गया। सौरभ और उनके परिजन भी बेहद खुश थे कि चलो मंत्रीजी को बिना फोन किये ही डॉक्टरों ने अच्छे से ऑपरेशन कर दिया है। उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य सिस्टम निश्चित ही 2022 के बाद से बेहद अच्छा एवं संवेदनशील हो गया है। परंतु सौरभ का मंत्री जी को फोन ना करना ही शायद सबसे बड़ी गलती साबित हुई, जो उनकी मां के लिये भी जानलेवा साबित हो गई।
रिटायरमेंट के बाद भी ब्लड बैंक को हेड कर रही डाक्टर वत्सला मिश्रा के निर्देशन में 4 दिसंबर की शाम को ही डाक्टरों ने सौरभ की माताजी को गलत ग्रुप का खून चढ़ा दिया। ओ पाजिटिव की जगह एबी पॉजिटिव। डाक्टरों ने ऐसा मंत्री जी का फोन नहीं आने के गुस्से में किया, या गलती से किया या फिर जानबूझकर किया, यह तो नहीं बताया जा सकता, लेकिन डाक्टरों की इस कारस्तानी से उर्मिला सिंह के हार्ट, लीवर एवं किडनी में दिक्कत पैदा हो गई। गलत खून का शरीर में प्रवाह होने के चलते उनके ऊपर एंटी बॉयोटिक दवाओं ने भी असर करना छोड़ दिया। हालात बेहद गंभीर हो गयी। इसका सबसे ज्यादा असर उनकी किडनी पर पड़ा। परिजन भागदौड़ और पैसा खर्च करते करते परेशान हो गये।
अब तमाशा देखिये कि जिन मरीज को न्यूरो की समस्या को लेकर भर्ती कराया गया था, केवल मंत्री को फोन नहीं करने की वजह से उन्हें नेफ्रोलॉजी डिपार्टमेंट में शिफ्ट करना पड़ गया। किडनी के डैमेज होने के चलते 8 दिसंबर को उनकी डॉयलसिस करनी पड़ गई। फिर हालत इतनी बिगड़ गई कि कई अंगों के काम नहीं करने की वजह से उनकी मौत हो गई। परिजन जिनको बेहतर इलाज के लिये स्वरूप रानी अस्पताल लेकर आये थे, वह डाक्टरों एवं अस्पताल की लापरवाही के चलते बिना बाल बच्चों का शादी विवाह देखे, इस दुनिया से विदा हो गईं। इस जानलेवा लापरवाही के बाद भी अस्पताल एवं प्रबंधन यह मानने को कतई तैयार नहीं था कि उसने लापरवाही की है।
अपनी गलती मानने के बजाय मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल बीके पांडेय एवं अस्पताल प्रबंधन लगातार यह जताने की कोशिश करता रहा कि उत्तर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवा मार्च 2022 के बाद से पूरी तरह शानदार हो चुकी है और मंत्री जी का फोन आते ही इलाज शुरू हो जाता है। जो भी घटना हुई है, उसमें सारी लापरवाही मरीज की है, उसने मंत्री जी से फोन नहीं कराया। डाक्टरों एवं अस्पताल की ओर से कोई लापरवाही नहीं की गई है। वह बीमार होकर अस्पताल आतीं ही नहीं तो इस तरह की कोई घटना होना संभव ही नहीं थी, लिहाजा पूरी की पूरी गलती केवल मरीज की है, डाक्टर या अस्पताल की नहीं। बीमार मरीज अपनी मौत का जिम्मेदार खुद ही है, गलत खून चढ़ाने वाला अस्पताल या डॉक्टर नहीं।
परंतु सौरभ सोमवंशी अस्पताल और प्रबंधन की बात पर भरोसा नहीं किये। कोर्ट में उन्होंने उत्तर प्रदेश के शानदार स्वास्थ्य सिस्टम के खिलाफ मुकदमा कर दिया। इसके बाद भी अस्पताल प्रबंधन कोर्ट में भी यह मानने को तैयार नहीं हुआ कि उससे गलती हुई है बल्कि अपने 43 पन्नों के जवाब में यह कहा कि उर्मिला सिंह नाम की किसी महिला को कोई ब्लॅड नहीं दिया गया है। जब सौरभ के मामले की पैरवी कर रही सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना एन सिंह एवं राणा सिंह ने अस्पताल के दस्तावेज पेश किये, तब कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए अस्पताल प्रबंधन को 28 जनवरी 2026 को सीलबंद लिफाफे में इलाज से जुड़े समस्त कागजात पेश करने का आदेश दिया।
अस्पताल की ओर आग यानी एएजी राहुल अग्रवाल ने जमकर पैरवी की, लेकिन इलाज के कागजों को देखने के बाद उन्होंने भी कोर्ट के समक्ष माना कि अस्पताल से गलती हुई है। कोर्ट ने दोनों पक्ष के अधिवक्ताओं को मुआवजा तय करने का निर्देश देने के साथ ही कॉलेज के प्राचार्य को ऐसे मामलों को देखने के लिये कमेटी बनाने का निर्देश दिया है। साथ इस मामले में आपसी सहमति के बाद हुई कार्रवाई को 23 मार्च को लिस्ट करने का आदेश दिया है। खैर, उत्तर प्रदेश के लोगों के लिये एक सबक भी है कि किसी भी सरकारी अस्पताल या मेडिकल कॉलेज जाने से पहले चिकित्सा मंत्री को फोन कर के सिफारिश कर लें, अन्यथा उत्तर प्रदेश का शानदार स्वास्थ्य सिस्टम आपकी जान ले सकता है।
आप सामान्य मरीज हैं, और बिना मंत्रीजी को फोन किये जाने की हिमाकत कर रहे हैं तो यह आपके लिये जानलेवा साबित हो सकता है, और मरने की पूरी जिम्मेदारी मरीज और उनके परिजन की होगी। मेरे द्वारा उत्तर प्रदेश के समस्त सर्वसाधारण को भी सूचित किया जा रहा है कि अगर आपको प्रदेश के किसी भी सरकारी अस्पताल में इलाज के लिये जाने की आवश्यकता पड़ रही है, तो भर्ती होने से पहले मंत्री जी को खुद फोन कर लें या फिर मेरे जैसे किसी व्यक्ति से मंत्री जी को फोन अवश्य करवा लें। अगर आप ऐसा नहीं करते या कराते हैं तो फिर आप अपनी जान से खुद ही खिलवाड़ कर रहे हैं। इसमें अस्पताल, मंत्रीजी, डाक्टर या फिर मेरी भी कोई जिम्मेदारी नहीं है।



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