एडवोकेट आयुष सिंह-
सड़ा हुआ सिस्टम, सड़े हुए लोग.. यह विश्वगुरु भारत की तस्वीर है..मरना नियति है इस मुल्क में आप जिंदा है तो अपने रिस्क पर..
हाईकोर्ट के अधिवक्ता और स्वतंत्र पत्रकार हम सब के प्रिय साथी Saurabh Somvansi जी के माता जी को गलत खून चढ़ाने की बात आखिरकार भारी जद्दोजहद और कानूनी लड़ाई के बाद स्वरूप रानी नेहरू अस्पताल ने मान ली है। सोचिए इसे भयंकर लापरवाही के बजाय मेडिकल सिस्टम द्वारा की गई हत्या नहीं तो और क्या कहेंगे? अस्पतालों में बाउंसर लगाकर गुंडे बिठाकर के सीधे मुंह तीमारदारों से बात न करने देने वाले ऐसे मेडिकल कॉलेज के जिम्मेदारों पर आखिर कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए? किसी की जान चली गई उसकी जिम्मेदारी किसकी है?
बताते चलें कि अधिवक्ता सौरभ सोमवंशी सक्षम व्यक्ति हैं। उन्होंने SRN हॉस्पिटल की इस अक्षम्य अपराध के चलते अपनी माँ को खोया तो सुप्रीम कोर्ट की चर्चित अधिवक्ता रीना सिंह जी के सहयोग से याचिका दाखिल करके हाई कोर्ट में अपने मां को न्याय दिलाने की लड़ाई लड़ी और उसे अब लॉजिकल एंड तक वह ले जा रहे हैं पर सवाल यह है कि मेडिकल टेररिज्म के इस युग में ऐसा कितने लोग कर पाते होंगे? सिस्टम सड़ गया है। न जाने कितने लोग मर जाते होंगे कोर्ट छोड़िए थाने तक नहीं जा पाते होंगे। अस्पतालों में बैठे हुए मठाधीश और सिंडिकेट सब कुछ मैनेज कर ले जाते हैं। प्राइवेट अस्पतालों की गुंडागर्दी से पूरा देश त्रस्त था और है लेकिन सरकारी अस्पताल भी लोगों के लिए कब्रगाह बन जाएंगे तो क्या होगा।
इस सरकार में मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल डीएम और पुलिस कप्तान की तरह प्रोटोकॉल लेकर चल रहे हैं और सत्ता पक्ष के मातृ संगठन को गुरु दक्षिणा देकर अपने कुकर्म छुपा रहें हैं।दया ,करुणा, जिम्मेदारी और संवैधानिक दायित्व जैसे शब्द गए गुजरे जमाने की बात हो गए हैं। मेडिकल कॉलेज और अस्पताल राजनीति के अड्डे हो गए हैं।
इलाहाबाद की यह घटना पूरे उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य सिस्टम की पोल खोलने वाली है। इलाहाबाद हाईकोर्ट का आभार कि उन्होंने मानव जीवन से जुड़े हुए अति महत्वपूर्ण विषय को प्राथमिकता दी। मैं सौरभ सोमवंशी जी के भी साहस और हिम्मत की सराहना करता हूं कि उन्होंने इस सरकारी सिस्टम से लड़ने का फैसला किया और सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता रीना सिंह जी को भी साधुवाद देता हूं की उनके शानदार वकालत एवं सही साक्ष्यों, तथ्यों के प्रस्तुतीकरण के चलते यह जरूरी मुद्दा प्रादेशिक स्तर पर प्रकाश में आया।
उम्मीद करता हूं कि माननीय हाईकोर्ट के सशक्त दखल के बाद कुछ सुधार होगा और जो भी दोषी लोग होंगे उन पर कठोर कार्रवाई होगी सिर्फ मुआवजे मात्र दिलवा देने से न्याय सुनिश्चित नहीं होगा।
उत्तर प्रदेश सरकार और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी इस मामले का संज्ञान लेकर उस समय के तत्कालीन अस्पताल प्रशासन के खिलाफ कठोर कार्रवाई करनी चाहिए ,मुकदमा दर्ज किया जाना चाहिए। जिम्मेदारी फिक्स होनी चाहिए। पूरे प्रदेश के अस्पतालों को कठोर दिशा निर्देश जारी किए जाने चाहिए और उसका अनुपालन सुनिश्चित होना चाहिए। मैंने व्यक्तिगत स्तर पर बहुत सक्षम होते हुए भी अस्पतालों में अपने आप को बहुत बेबस पाया है। इसलिए मैं अस्पतालों का माहौल वहां की गंदगी वहां का सड़ा गला सिस्टम अच्छे से समझ सकता हूं।
उत्तर भारत के प्रमुख अखबारों की यह हेडलाइन अटल बिहारी वाजपेई की जयंती मनाने वाले उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री बृजेश पाठक को तो जरूर पढ़नी चाहिए।वह दौरा मंत्री मात्र हैं या उनका कुछ इकबाल भी बचा है। उनके विभाग की हालत सबसे खराब है। लेकिन फिर भी किसी को ना तो शर्म आती है और ना कोई जिम्मेदारी लेना चाहता है।
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