अश्विनी कुमार श्रीवास्तव-
अंबानी और अदानी पर युद्ध की गाज! 115 डॉलर का कच्चा तेल और 92 रुपये का डॉलर भारत के इन दो सबसे बड़े कुबेरों की बैलेंस शीट हिलाने वाला है। मुकेश अंबानी की रिलायंस का सबसे बड़ा मुनाफा उनके ऑयल-टू-केमिकल (O2C) यानी जामनगर रिफाइनरी से आता है।
अब तक खेल शानदार था—रूस से सस्ता तेल खरीदो, रिफाइन करो और यूरोप को महंगे दाम पर बेचकर तगड़ा मुनाफा (GRM) कमाओ। लेकिन ईरान और लाल सागर की नाकेबंदी ने इस पूरे खेल को पलट कर रख दिया है।
यूरोप तक रिफाइंड तेल पहुंचाने के लिए अब जहाजों को अफ्रीका के नीचे से लंबा चक्कर काटना पड़ रहा है। नतीजा यह है कि माल ढुलाई और मरीन इंश्योरेंस का खर्च इतना बढ़ गया है कि वह रिफाइनिंग के पूरे मुनाफे को सीधा निगल रहा है। ऊपर से 115 डॉलर के कच्चे तेल ने रिलायंस के पेट्रोकेमिकल बिजनेस की कमर तोड़ दी है।
कच्चे तेल से निकलने वाला नेफ्था बहुत महंगा हो गया है, लेकिन युद्ध की मंदी के कारण बाजार में प्लास्टिक और पैकेजिंग की मांग घट गई है। यानी कच्चा माल महंगा हो रहा है, लेकिन अंबानी अपने उत्पादों के दाम नहीं बढ़ा सकते, जिससे उनका मार्जिन बुरी तरह सिकुड़ रहा है।
दूसरी तरफ, गौतम अदानी के कारोबारी साम्राज्य की बुनियाद ही अंतरराष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स, बंदरगाहों और विदेशी कर्ज पर टिकी है। समंदर के मौजूदा हालात अदानी समूह के लिए कई मोर्चों पर सीधा और बहुत बड़ा खतरा हैं।
सबसे बड़ा रणनीतिक जोखिम इजरायल स्थित उनके ‘हाइफा पोर्ट’ पर है, जो इस वक्त सीधे युद्ध क्षेत्र के मुहाने पर खड़ा है। जब दुनिया भर का समुद्री व्यापार ब्लॉक होता है और जहाज कम चलते हैं, तो पोर्ट्स और लॉजिस्टिक्स नेटवर्क का राजस्व सीधा धड़ाम होता है। लेकिन अदानी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द है 92 रुपये के पार जा चुका अमेरिकी डॉलर।
अदानी समूह ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स के लिए बड़े पैमाने पर विदेशी डॉलर बॉन्ड और अंतरराष्ट्रीय कर्ज ले रखा है। बिना कोई नया कर्ज लिए ही, रुपया गिरने से उनके पुराने कर्ज को चुकाने की लागत (डेट सर्विसिंग कॉस्ट) अचानक से बेतहाशा बढ़ गई है।
यही नहीं, अदानी विल्मर की रसोई तक पहुंचने वाला पाम और सूरजमुखी का आयातित खाद्य तेल भी भारी मालभाड़े और महंगे डॉलर की भेंट चढ़ गया है। लैंडिंग कॉस्ट इतनी बढ़ गई है कि कंपनी को अपना प्रॉफिट मार्जिन बचाने के लिए रोज जूझना पड़ रहा है।
अंबानी और अदानी दोनों ही ग्रीन एनर्जी और भविष्य की तकनीक में लाखों करोड़ लगाने का सपना देख रहे हैं, जिसकी मशीनें विदेशों से ही आनी हैं। बाधित सप्लाई चेन और महंगे डॉलर ने इन सभी मेगा प्रोजेक्ट्स की लागत (कैपेक्स) को रातों-रात कई हजार करोड़ रुपये बढ़ा दिया है।
कुल मिलाकर, समंदर की इस नाकेबंदी ने भारत के इन सबसे ताकतवर कारोबारियों को भी एक ऐसे चक्रव्यूह में फंसा दिया है, जहां उन्हें अपना साम्राज्य चलाने से ज्यादा उसे युद्ध के असर से बचाने के लिए रोज नई जद्दोजहद करनी पड़ रही है।
फेल हो गया खाड़ी में मोदी का डबल गेम !!!
ट्रम्प की जिद और ईरान-रूस के पलटवार में कैसे खाक हुआ भारत का चाबहार और हाएफा का ‘डबल पोर्ट’ प्लान?
ईरान से अमेरिकी युद्ध शुरू होने से पहले भारत ने बेहद कूटनीतिक चालाकी से समंदर में व्यापार के दो वैकल्पिक रास्ते तैयार किए थे— एक सरकार के जरिए ईरान का चाबहार पोर्ट और दूसरा भारत के कॉरपोरेट जगत के दिग्गज अदानी के जरिए इजरायल का हाइफा पोर्ट।
इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की योजना यह थी कि ग्लोबल संकट में अगर एक दरवाजा बंद हो, तो दूसरे ‘प्लान बी’ से भारत का माल बिना रुके यूरोप पहुंचता रहे। मगर डोनाल्ड ट्रंप की ‘मेरे खेमे में आओ’ वाली सनक और रूस-चीन-ईरान के खूनी पलटवार ने भारत के इस शानदार मास्टरप्लान को उसी समंदर में गोते खिलवा दिए हैं.
इजरायल के हाइफा पोर्ट में अदानी का निवेश कोई आम कॉरपोरेट सौदा नहीं था, बल्कि यह भारत सरकार की एक बेहद सोची-समझी रणनीतिक चाल थी। दिल्ली के रणनीतिकार जानते थे कि ईरान के ‘चाबहार पोर्ट’ पर अमेरिकी प्रतिबंधों की तलवार हमेशा लटकी है, इसलिए अदानी के जरिए I2U2 और ‘IMEC’ (आर्थिक गलियारे) का एक सुरक्षित पश्चिमी गेट तैयार किया गया।
यह कूटनीति की वह शानदार बिसात थी जहां भारत ने ईरान और इजरायल जैसे दो कट्टर दुश्मनों के आंगन में अपना पैसा लगाकर अपना व्यापारिक रास्ता पक्का कर लिया था। लेकिन भारत के इस मास्टरप्लान की धज्जियां तब उड़ गईं, जब ट्रंप ने सत्ता में आते ही डॉलर और ट्रेड की धौंस दिखाकर दुनिया को अपने पाले में खड़ा होने का अल्टीमेटम दे दिया।
ट्रम्प की इस जिद ने मिडिल ईस्ट के उस नाजुक संतुलन को पूरी तरह खत्म कर दिया, जिस पर भारत की यह ‘डबल रूट’ कूटनीति टिकी हुई थी। ट्रंप इसी दबाव के जवाब में जब रूस, चीन और ईरान की तिकड़ी ने लाल सागर और मिडिल ईस्ट में बारूदी पलटवार किया, तो भारत के दोनों व्यापारिक दरवाजे एक साथ बंद हो गए।
चाबहार का बुनियादी ढांचा भले ही सलामत हो, लेकिन अमेरिकी ‘सेकेंडरी सैंक्शंस’ और ‘स्विफ्ट’ (SWIFT) सिस्टम से बाहर होने के खौफ ने वहां से होने वाले व्यापार को आर्थिक रूप से नामुमकिन बना दिया है। दूसरी तरफ, हाइफा पोर्ट और ‘IMEC’ का पूरा जमीनी हाईवे इस इकलौती शर्त पर टिका था कि सऊदी अरब और इजरायल के बीच कूटनीतिक समझौता हो जाएगा।
लेकिन ईरान और उसके मोहरों (हमास-हिजबुल्लाह) ने युद्ध भड़काकर अरब देशों और इजरायल की उस व्यापारिक दोस्ती को दशकों के लिए ध्वस्त कर दिया। आज हिजबुल्लाह के रॉकेटों के डर से इजरायल का वह अरबों डॉलर वाला हाइफा पोर्ट पूरी तरह वीरान पड़ा है, और कोई भी शिपिंग कंपनी वहां अपना जहाज नहीं ले जा रही है।
ट्रंप का ‘ट्रेड वेपन’ बना अमेरिका के लिए भस्मासुर !!!
ईरान ने खुद की बलि देकर अमेरिका को उसी के जाल में कैसे फंसा दिया? डोनाल्ड ट्रंप ने जिस ‘ट्रेड’ और ‘डॉलर’ को हथियार बनाकर पूरी दुनिया की आर्थिक नसें दबाने की शुरुआत की थी, आज वही हथियार अमेरिका के गले की फांस बन चुका है।
ट्रंप की रणनीति बहुत साफ थी—टैरिफ, प्रतिबंध (Sanctions) और डॉलर की धौंस दिखाकर भारत, यूरोप और चीन समेत पूरी दुनिया को अपने घुटनों पर ला देना।
अमेरिका को गुमान था कि वह किसी भी देश का स्विफ्ट (SWIFT) सिस्टम और बैंक खाता ब्लॉक करके बिना खून बहाए ही युद्ध जीत लेगा। लेकिन ईरान ने अपनी डूबती अर्थव्यवस्था की परवाह किए बिना, खुद की बलि देकर ट्रंप को उन्हीं के खेल में ऐसा धोबी पछाड़ दिया है जो अर्थशास्त्र के इतिहास में दर्ज होगा।
ईरान ने समझ लिया था कि अमेरिकी डॉलर और कागजी प्रतिबंधों का जवाब कागजों से नहीं, बल्कि दुनिया की भौतिक ‘सप्लाई लाइन’ (Physical Supply Chain) को काटकर ही दिया जा सकता है।
उसने लाल सागर और होर्मुज जलडमरूमध्य जैसे समुद्री ‘चोक पॉइंट्स’ पर 20 हजार डॉलर के सस्ते ड्रोन्स और मिसाइलों से अरबों डॉलर के ग्लोबल ट्रेड की धज्जियां उड़ा दीं। कूटनीति का यह कड़वा सच है कि आप दुश्मन का बैंक अकाउंट फ्रीज कर सकते हैं, लेकिन जब समंदर में मालवाहक जहाजों का चलना ही बंद हो जाए, तो डॉलर का वह हथियार पूरी तरह खोखला साबित हो जाता है।
आज समंदर में मिसाइलें तो अमेरिका की चल रही हैं, लेकिन जिस ग्लोबल ट्रेड के दम पर अमेरिका दुनिया का चौधरी बना बैठा था, वह ट्रेड ही कोमा में जा चुका है। इस नाकेबंदी का सीधा असर यह है कि अमेरिका के भीतर जो कारखाने चीन, ताइवान और एशिया के सस्ते कच्चे माल या इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों पर टिके थे, उनका चक्का जाम हो रहा है।
कंटेनर का किराया 400 प्रतिशत बढ़ने से अमेरिका में एक बार फिर भयंकर मुद्रास्फीति (Inflation) आउट ऑफ कंट्रोल हो रही है और वहां का फेडरल रिजर्व चाहकर भी ब्याज दरें नहीं घटा पा रहा है।
ट्रंप की इस आक्रामक ‘अमेरिका फर्स्ट’ सनक का सबसे बड़ा और बेकसूर शिकार भारत और यूरोप हुए हैं। भारत के लिए यह भयानक दोहरी मार है; एक तरफ महंगा क्रूड और 92 रुपये का डॉलर हमारा आयात बिल फाड़ रहा है, तो दूसरी तरफ ट्रंप के लगाए भारी टैरिफ हमारे निर्यात का दम घोंट रहे हैं।
यूरोप का हाल तो और भी खौफनाक है, जहां रूस की गैस और समंदर की रसद कटने से उनकी सदियों पुरानी इंडस्ट्रियल बेल्ट हमेशा के लिए कब्र में जा रही है। ट्रम्प ने जिसे अपनी शर्तों पर लड़ा जाने वाला एकतरफा ‘ट्रेड वॉर’ समझा था, ईरान ने उसे दुनिया के सबसे भयानक ‘लॉजिस्टिक्स वॉर’ में बदल दिया है जिसका रायता अब खुद ट्रंप नहीं समेट पा रहे।
अगर कल अमेरिका अपनी पूरी सैन्य ताकत झोंक कर ईरान और उसके मोहरों को खाक में मिला भी दे, तो भी यह अमेरिका के इतिहास की सबसे बड़ी कूटनीतिक और आर्थिक पराजय होगी।
क्योंकि जब तक यह युद्ध खत्म होगा, तब तक दुनिया डॉलर और अमेरिकी ट्रेड सिस्टम पर अपना भरोसा पूरी तरह खो चुकी होगी और अमेरिका खुद उस भयंकर मंदी के मलबे पर खड़ा होगा, जिसकी आग उसने खुद लगाई थी।



