यशवंत सिंह-
मानव सभ्यता की लगभग हर आध्यात्मिक परंपरा ने मृत्यु को केवल एक अंत नहीं माना, बल्कि जीवन की एक गहरी और अनिवार्य सच्चाई के रूप में समझने की कोशिश की है। सामान्यतः मनुष्य मृत्यु को भय, अंधकार और विछोह से जोड़कर देखता है, लेकिन भारतीय और विश्व की कई आध्यात्मिक परंपराएँ इसे एक सजग घटना के रूप में देखने का आग्रह करती हैं। यदि मृत्यु को समझने की दृष्टि बदल जाए तो जीवन को देखने का तरीका भी बदल जाता है। मृत्यु का स्मरण तब निराशा नहीं पैदा करता, बल्कि जीवन को अधिक गहरा, अधिक सजीव और अधिक अर्थपूर्ण बना देता है।
भारतीय परंपरा में मृत्यु को लेकर एक प्राचीन अवधारणा मिलती है जिसे प्रायोपवेशन कहा गया है। प्रायोपवेशन का अर्थ है स्वेच्छा से धीरे-धीरे भोजन और जल का त्याग करते हुए शरीर का परित्याग करना। इसे सामान्य आत्महत्या की तरह नहीं देखा गया, बल्कि कुछ विशेष परिस्थितियों में संयम, वैराग्य और आध्यात्मिक तैयारी के साथ मृत्यु को स्वीकार करने का मार्ग माना गया। धर्मग्रंथों में कहा गया है कि यह निर्णय तभी उचित माना गया जब व्यक्ति अत्यधिक वृद्ध हो चुका हो, जीवन के प्रमुख कर्तव्य पूरे कर चुका हो या असाध्य रोग और शारीरिक असमर्थता के कारण जीवन का स्वाभाविक अंत निकट हो। यह निर्णय भी आवेग या दुख में नहीं, बल्कि शांत और जागरूक मन से लिया जाता था। इस प्रक्रिया में व्यक्ति धीरे-धीरे भोजन कम करता है, फिर केवल जल पर रहता है और अंततः पूर्ण उपवास में प्रवेश करता है। साथ-साथ ध्यान, जप और ईश्वर-स्मरण चलता रहता है ताकि मृत्यु भय या पीड़ा की घटना न रहकर एक सजग विदाई बन सके।
भारतीय चिंतन में ऐसी ही एक परंपरा जैन धर्म में भी मिलती है जिसे संथारा या सल्लेखना कहा जाता है। इसमें साधु या गृहस्थ जीवन के अंतिम चरण में अत्यंत संयम और जागरूकता के साथ धीरे-धीरे भोजन का त्याग करते हैं और ध्यान तथा आत्मचिंतन में रहते हुए मृत्यु का स्वागत करते हैं। जैन परंपरा इसे शरीर से नहीं, बल्कि आसक्ति से मुक्त होने का अभ्यास मानती है। इसका उद्देश्य मृत्यु को जल्दी बुलाना नहीं, बल्कि जीवन के अंत को शांत और सजग तरीके से स्वीकार करना होता है।
लेकिन भारतीय चिंतन में मृत्यु को लेकर एक और महत्वपूर्ण दृष्टिकोण भी मिलता है, जिसे गौतम बुद्ध ने स्पष्ट रूप से सामने रखा। ज्ञान की खोज में बुद्ध ने कई वर्षों तक कठोर तपस्या की। वे इतना कम भोजन करते थे कि उनका शरीर हड्डियों का ढाँचा बन गया था। अंततः उन्हें अनुभव हुआ कि शरीर को अत्यधिक कष्ट देना भी उतनी ही अति है जितना भोग में डूब जाना। तभी उन्होंने मध्य मार्ग का सिद्धांत दिया। इसका अर्थ था कि आध्यात्मिकता का रास्ता न तो अंधे भोग का है और न ही शरीर को नष्ट कर देने वाली तपस्या का, बल्कि संतुलन का है।
बुद्ध ने शरीर को एक साधन की तरह देखने की बात कही। जैसे नदी पार करने के लिए नाव जरूरी होती है, वैसे ही जागरूकता की यात्रा के लिए शरीर जरूरी है। यदि नाव को बीच नदी में ही तोड़ दिया जाए तो पार पहुँचना संभव नहीं होगा। इसलिए बुद्ध का आग्रह था कि शरीर की उपेक्षा नहीं, बल्कि सजग देखभाल की जाए।
बुद्ध ने मृत्यु के बारे में एक महत्वपूर्ण ध्यान अभ्यास भी बताया जिसे मरणसति कहा जाता है। इसमें साधक बार-बार यह स्मरण करता है कि मृत्यु निश्चित है, लेकिन उसका समय अनिश्चित है। इस स्मरण से जीवन के प्रति गहरी जागरूकता पैदा होती है। व्यक्ति समझने लगता है कि हर क्षण अनमोल है और हर अनुभव अस्थायी है। यही समझ धीरे-धीरे मन को हल्का करती है और अनावश्यक इच्छाओं तथा संघर्षों से मुक्ति दिलाती है।
दूसरी धार्मिक परंपराओं में भी मृत्यु को सजगता से स्वीकार करने की बातें मिलती हैं। सिख परंपरा में गुरु ग्रंथ साहिब में जीवन और मृत्यु को एक ही दिव्य व्यवस्था का हिस्सा माना गया है और यह कहा गया है कि जो व्यक्ति नाम और सत्य के मार्ग पर चलता है, उसके लिए मृत्यु भय का कारण नहीं रह जाती।
ईसाई परंपरा में भी मृत्यु को अंत नहीं बल्कि ईश्वर के साथ एक नए जीवन की शुरुआत के रूप में देखा गया है। इस्लाम में मृत्यु को दुनिया की अस्थायी यात्रा का स्वाभाविक पड़ाव माना गया है और यह विश्वास रखा गया है कि हर कोई अंततः ईश्वर की ओर ही लौटता है। इन सभी दृष्टियों में एक समान तत्व दिखाई देता है कि मृत्यु को केवल भय की घटना नहीं माना गया, बल्कि जीवन की निरंतरता के एक पड़ाव के रूप में समझने की कोशिश की गई है।
आंतरिक यात्रा का अर्थ भी यही है कि मनुष्य जीवन की घटनाओं से भागे नहीं, बल्कि उन्हें समझते हुए अपने भीतर जागे। ध्यान की गहराई में धीरे-धीरे यह स्पष्ट होने लगता है कि सुख और दुख दोनों अस्थायी हैं, इच्छाएँ आती-जाती हैं और मन ही संसार की अधिकांश उलझनों को रचता है। इस समझ से जो वैराग्य पैदा होता है वह निराशा या ऊब का नहीं, बल्कि शांति का वैराग्य होता है।
इस दृष्टि से देखा जाए तो मृत्यु असल में जीवन विरोधी नहीं है, बल्कि उसका स्वाभाविक साथी है। मृत्यु का स्मरण यदि भय से नहीं बल्कि जागरूकता से किया जाए तो वही स्मरण जीवन को और अधिक सजीव बना देता है। शायद मृत्यु को जीवंत तरीके से देखने का अर्थ यही है कि हम उसे जीवन के अंत के रूप में नहीं, बल्कि जीवन के विकास क्रम की अनिवार्य सच्चाई के रूप में स्वीकार करें और इस स्वीकृति के साथ हर क्षण को अधिक सजगता, अधिक संवेदनशीलता और अधिक समझ के साथ जीने का प्रयास करें।
(सबसे ऊपर वाली तस्वीर ब्रिज घाट (गढ़ मुक्तेश्वर) के उस पार की है)
लेखक यशवंत भड़ास के एडिटर हैं.


